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ISSN 2292-9754

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08.28.2017


स्वप्न और आत्म संघर्ष की आत्माभिव्यक्ति : "अँधेरे में"

यह निर्विवाद सत्य है कि मुक्तिबोध निराला के बाद हिंदी के सबसे महत्त्वपूर्ण कवि हैं, यद्यपि कवि के रूप में उन्हें स्वीकृति बहुत देर से मिली। वे "तार सप्तक" के कवि के रूप में काव्य जगत में आए किन्तु यह भी सच है कि "तार सप्तक" की परिकल्पना आरंभ में माचवे, नेमिचन्द्र जैन और मुक्तिबोध की ही थी। लेकिन बावजूद इसके मुक्तिबोध अपने समय में एक अन्यमनस्क कवि ही रहे। अपनी सतत रचनाशीलता के बावजूद वे लगभग, अपने समय में उपेक्षित ही रहे। "अँधेरे में" मुक्तिबोध की सर्वश्रेष्ठ कविता है। पहले इसका नाम उन्होंने "आशंका के द्वीप, अँधेरे में" रखा था। इस शीर्षक से संभवत: वे कविता की अंतर्वस्तु का निकट संकेत करना चाहते थे क्योंकि पूरी कविता में आज़ादी के बाद की विकसित होने वाली स्थितियों पर शंका प्रकट की गई है। बाद में उनके कहने पर श्रीकांत वर्मा ने शीर्षक से "आशंका के द्वीप" हटा दिया। इस कविता के तीन प्रारूप प्रकाशित हुए। पहला "कल्पना" (हैदराबाद) पत्रिका में, दूसरा "चाँद का मुँह टेढ़ा है" में और तीसरा "रचनावली" में। नेमीचन्द्र जैन का मानना है कि "रचनावली" में छपा पाठ ही अंतिम है। "कल्पना" और "चाँद का मुँह टेढ़ा है" पाठों को मिलाकर उन्होंने यह तीसरा पाठ तैयार किया था। "रचनावली" में छपा प्रारूप ही सबसे अच्छा और सम्पूर्ण है। वास्तव में मुक्तिबोध अपनी प्रत्येक कविता अनेकों बार लिखते रहते थे। उनको काटते-छाँटते, सजाते-सँवारते रहते थे। इस तरह अनेक कविताओं के कई-कई प्रारूप उनकी फ़ाइलों में मिले हैं। वास्तव में मुक्तिबोध एक ही कविता, अनेक कविताओं के रूप में बार-बार लिख रहे थे। उनकी सारी कविताएँ "अँधेरे में" तक पहुँचने की कड़ी हैं। इसीलिए"अँधेरे में" के अनेक बिंब दूसरी कविताओं में भी दृष्टि गोचर होते हैं। इसी तरह दूसरी अधिकांश कविताओं में है। वे परस्पर अंतर्गुंफित हैं – कुछ इस तरह जैसे कि एक ही कविता की अलग अलग कड़ियाँ हों। "अँधेरे में" मुक्तिबोध के रचना कर्म और श्रम दोनों का अंतिम योग है। विचार और शिल्प, बिंब–प्रतीक, और वातावरण– विवरण को मिलाकर यह उनकी सबसे सुगठित और परिपूर्ण रचना है। विवरण और घटनाओं को मुक्तिबोध एक सघन बिंब विधान के भीतर प्रस्तुत करते हैं। जहाँ बिंब नहीं होते वहाँ विवरण या घटनाएँ एक वातावरण–चित्रण का रूप ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह कुछ भी नीरस नहीं रह जाता है। -

"यह सिविल लाईन्स है। मैं अपने कमरे में
यहाँ पड़ा हुआ हूँ।
आँखें खुली हुई हैं।
पीटे गए बालक-सा मार खाया चेहरा
उदास, इकहरा
स्लेट-पट्टी पर खींची गई तस्वीर
भूत जैसी आकृति-
क्या वह मैं हूँ?
मैं हूँ?

"अँधेरे में" भी यहाँ से वहाँ तक एक कथा है और और उस कथा के विकास क्रम में आने वाली अनेक घटनाएँ हैं। कहा जा सकता है कि यह कविता एक श्रेष्ठ कथा-काव्य का नमूना है। लेकिन यह कथा कहीं इतिहास या पुराण से नहीं ली गई है। इसके लिए कोई पूर्व आधार नहीं है। बल्कि यह स्वरचित, सर्वथा नई और अति मौलिक है। कथा-काव्य होने के कारण कहीं घटनाएँ और विवरण नीरस न हो जाएँ, कवि उन्हें एक स्वप्न–फैंटेसी में बुनता है। पूरी कविता में दो तहें हैं। जो अघटित, अविश्वसनीय और चमत्कारिक है वह सपने में घटित होता है और फिर उसे यथार्थ –वर्तमान से से जोड़ने, उसकी व्याख्या करने, उसका महत्त्व प्रतिपादित करने के लिए कवि बार-बार जाग्रत अवस्था का सहारा लेता है। इस तरह स्वप्न और जागरण बारी-बारी से चलते रहते हैं और उन्हीं के भीतर से कविता का एक अनहोना विकास होता है । इस तरह "अँधेरे में" एक स्वप्न फैंटेसी है। एक ऐसी स्वप्न फैंटेसी जो आज़ादी के बाद की सारी कथा-व्यथा को अपने भीतर समेटे हुए है और जो आज़ादी के बाद की भारतीय जीवन-शैली का संपूर्ण सार-तत्त्व प्रस्तुत करती है। "अँधेरे में" आज़ादी के बाद के भारतीय जीवन के कुहरे में एक"रक्तालोक स्नात पुरुष" की खोज की कविता है। एक ऐसा व्यक्तित्व, जो भारतीय जीवन और समाज और राजनीति के अंतर्विरोधों को सही और सकारात्मक दिशा में मोड सके। वह व्यक्ति हम सबके भीतर मौजूद है। वह बार-बार तरह-तरह से हमारे सामने प्रकट होता है और हमारी अपनी ही भीतरी कमज़ोरियों की वजह से ओझल हो जाता है। उसी की खोज इस कविता का लक्ष्य है। कवि मुक्तिबोध के लिए यह खोज उनकी परम "अनिवार आत्म संभवा अभिव्यक्ति" की खोज भी है। इसके लिए कवि कहता है –

यह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह निज संभावनाओं, निहित प्रभाओं, प्रतिमाओं की
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव
हृदय में रिस रहे ज्ञान
का तनाव वह
आत्मा की प्रतिमा।

मुक्तिबोध की कविता संघर्ष और स्वप्न की कविता है। वह निराशा और मोहभंग की मूल्यांध एकरसता को तोड़ती है। मुक्तिबोध की कविताओं की "नवता" ऐतिहासिक है। "अँधरे में" का नायक मूलत: स्वप्न और संघर्ष का प्रतीक और इतिहास वाहक संघर्ष पुरुष है। वह एक साथ अनेक व्यक्तित्वों का संश्लेष है। कविता में वह रक्तालोक-स्नात है। इस कविता में द्वंद्व अंतर और बाह्य दोनों है। वह समाज के इतिहास में है और नायक के मन में भी है। जिस प्रकार समाज बँटा हुआ है उसी प्रकार मन भी। यह पूर्णता जिसे कविता में अभिव्यक्ति कहा गया है, स्वप्न के यथार्थ होने पर होगी। इस द्वंद्व की प्रकृति जटिल है। द्वंद्व वस्तुत: प्रकृति और संस्कृति का भी है। मुक्तिबोध की कविताएँ इतनी बहुआयामी हैं कि उनकी व्याख्या करने या उन्हें समझने के लिए पाठक को थोड़े धैर्य की जरूरत पड़ती है।

"अँधेरे में" का अँधेरा प्रकृति की विवेकहीनता का प्रतीक है। यह विवेकहीनता दो स्तरों पर है –सामाजिक व्यवस्था के स्तर पर और व्यक्ति के अवचेतन में। लेकिन यहाँ भी द्वंद्वात्मकता है। प्रकृति में अच्छे बुरे दोनों उपादान हैं। इसी प्रकार सामाजिक व्यवस्था में अंतर्विरोध हैं। अवचेतन में भय, कायरता, द्वेष के साथ साथ विवेक भी है। अँधेरा बाहर भी है, अंदर भी है, लेकिन अंतर्विरोधों के साथ, द्वंद्वात्मकता के साथ। इसी अँधेरे में "रक्तालोक-स्नात पुरुष" एक तरफ़ तो ज़िंदगी के कमरों के अँधेरे में चक्कर लगाता है, तिलस्मी खोह में गिरफ़्तार है, दूसरी ओर बाहर शहर के पार तालाब में उसका चेहरा फैला है, वह कमरे में प्रवेश करने के लिए सांकल बजाता है। यह रक्तालोक-स्नात पुरुष अंदर भी है, बाहर भी है –

"पहचानता हूँ
बाहर जो खड़ा है
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ
जो मुझे तिलस्मी खोह में दिखा था।"

यह रक्तालोक-स्नात पुरुष कौन है? मुक्तिनबोध ने उसकी पहचान बताई है। यद्यपि वह दिखाई देने पर भी जाना नहीं जाता, फिर भी उसकी नुकीली नाक और भव्य ललाट और दृढ़ हनु को देखने से उस पर मनु होने का संदेह होता है। उसकी एक और पहचान दी गई है ; वह मुक्तिबोध की "अब तक न पाई गई अभिव्यक्ति है, निज संभावनाओं में निहित प्रभावों, प्रतिभाओं की पूर्ण अवस्था है, परिपूर्ण का आविर्भाव है, हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव है, आत्मा की प्रतिमा" है। यानी मुक्तिबोध के अनुसार वह मनु है, पूर्ण अभिव्यक्ति है ।

"कल्पना" (नवंबर 1964) में प्रकाशित इसी कविता की कुछ पंक्तियों में कवि ने उस व्यक्ति की और पहचान बताई है – "किन्तु वह फटे वस्त्र क्यों पहने है। उसका स्वर्ण मुख मैला क्यों है? वक्ष पर इतना बड़ा घाव कैसे हो गया। उसने कारावास दुःख क्यों झेला? उसकी भयानक स्थिति क्यों है? रोटी उसे कौन पहुंचाता है? कौन पानी देता है?

पता यह चला है कि वह रक्तालोक-स्नात पुरुष जो तिलस्मी खोह में गिरफ़्तार है, अँधेरी रात में कमरे के अंदर आने के लिए आतुर, मनु है जो कि मुक्तिबोध की पूर्ण अभिव्यक्ति है। मुक्तिबोध का यह मनु "कामायनी" के मनु से कितना भिन्न है, यद्यपि "अवयव की दृढ़ मांसपेशियाँ" वाला व्यक्तित्व यहाँ भी है। "तेजोप्रभावमय उसका ललाट, गौरवर्ण दीप्त-दृग, सौम्य मुख, भव्य आजानुबाहु।" किन्तु इसके वक्ष पर घाव है। रोटी – कपड़े की समस्या से ग्रस्त है। यह विचित्र मनु है, जो "कामायनी" के मनु के समान स्वयं ही शिखरासीन नहीं है बल्कि वाचक को भी –

"बिठा देता है तुंग शिखर के
खतरनाक खुरदरे कगार तट पर
कहता है – पार करो
पर्वत-संधि के गह्वर
रस्सी के पुल पर चलकर
दूर उस शिखर –कगार तक
स्वयं पहुँचो /"

यह रक्तालोक-स्नात पुरुष वाचक (कवि ) को बहुत प्रिय है। वह उससे मिलकर एकमेक हो जाना चाहता है, किन्तु उसे अपनी कमज़ोरियों से लगाव है, इसलिए उससे मिल नहीं सकता। रक्तालोक-स्नात पुरुष का "विवेक-विक्षोभ" सहना वाचक के वश की बात नहीं। वह पूर्ण संभावनाओं का प्रतीक है तो उसके पास भविष्य का द्युतिमान नक़्शा है। जिसे अँधेरे में पड़ा हुआ अँधेरे का अभ्यस्त वाचक सह नहीं सकता।

यह फटेहाल मनु इसके बाद कविता में अंत में आता है –

"तिलस्मी खोह में देखा था एक बार
आखिरी बार ही
पर वह जगत की गलियों में
घूमता है प्रतिफल
वह फटेहाल रूप
तड़ीतरंगीय वही गतिमयता
अत्यंत उद्विग्न ज्ञान-तनाव वह सकर्मक प्रेम की वह अतिशयता
वही फटेहाल रूप।"

अब वह रक्तालोक-स्नात पुरुष मनु तिलस्मी खोह में नहीं, जगत की गलियों में घूमता है प्रतिपल। फटेहाल अब भी है। लेकिन यहाँ उसे "सकर्मक प्रेम की अतिशयता" कहा गया है। उस रहस्यमय व्यक्ति को अवचेतन के अँधेरे से निकालकर जगत की गलियों मे, सड़कों पर लोगों की भीड़ में ले आना ही इस कविता की सिद्धि है। यह सिद्धि केवल मानसिक जगत में घटती है और यह संपूर्ण कविता एक लंबी स्वप्न कथा है।

"रक्तालोक-स्नात पुरुष" मनु मानवीय संस्कृति के विकास के लिए निरंतर संघर्ष करते रहने वाले संस्कृति-पुरुष का प्रतीक है। वह हम सबके अन्तर्मन में विद्यमान है। वह बाहर भी है। बाहर से यानी समाज से हमारे मन में आकर वह हमें सक्रिय सकर्मक बनाना चाहता है। अन्तर्मन में बैठा हुआ वह पुरुष सकर्मक हो बाहर अभिव्यक्ति पाता है। वह संघर्षरत है। इसीलिए उसके पीठ पर नहीं वक्ष पर घाव है। वह सकर्मक है, शक्ति-पुंज है, किन्तु फटेहाल है क्योंकि वह करुणा से मुक्त होकर समाज के शोषित जनों का प्रतिनिधि बनता है। ख़ुद उसे रोटी-पानी का अभाव रहता है। वह साधारण जन होकर साधारण जन का साथ देता है।

आज के देश काल की परिस्थितियों को देखते हुए यह संस्कृति पुरुष मध्य वर्ग के आदर्शवादी दृढ़ चरित्र और जीवन की सुविधाओं से समझौता न करने वाले व्यक्ति का प्रतीक है। वह हम सबके अन्तर्मन में विद्यमान है। वह बाहर भी है यानी की समाज से हमारे मन में आकर वह हमें सक्रिय सकर्मक बनाना चाहता है। अन्तर्मन में बैठा हुआ यह पुरुष सकर्मक होकर बाहर अभिव्यक्ति पाता है। वह संघर्षरत है, इसीलिए उसके पीठ पर नहीं वक्ष पर घाव है। वह सकर्मक है शक्तिपुंज है, किन्तु फटेहाल है क्योंकि वह करुणा से मुक्त होकर समाज के शोषित जनों का प्रतिनिधि बनता है। ख़ुद उसे रोटी-पानी का अभाव रहता है। वह साधारण जन होकर साधारण जन का साथ देता है।

हमारे अपने देश काल को देखते हुए यह संस्कृति पुरुष मध्य वर्ग के आदर्शवादी दृढ़ चरित्र और जीवन की सुविधाओं से समझौता न करने वाले व्यक्ति का प्रतीक है। "कामायनी" का मनु देव संस्कृति से आकर पुन: आनंद लोक में चला जाता है। इस लोक में भी वह स्वच्छंद विहार करता है। "अँधेरे में" का मनु मन के कारावास, तिलस्मी खोह से बाहर निकलकर जनता में घुल-मिल जाता है। बाहर से आकर कमज़ोरियों से लगाव रखने वाले व्यक्ति को दुर्गम पर्वत संधि पार करने का निमंत्रण देता है। वह सुविधावादी मन को दुविधा में डालता है, फिर झटके पर झटके देता है, धिक्कारता है, उसे अपने कमज़ोर घुटनों को सहलाकर पैरों से धरती का फैलाव महसूस करने पर विवश करता है। तिलक और गाँधी की मूर्तियाँ वस्तुत: इसी पक्के आदर्शों वाले संघर्षरत व्यक्ति के प्रतीक हैं। संस्कृति पुरुष रक्तलोक-स्नात है तो तिलक का अंगरखा भी खून में डूबा है और गाँधी सर्दी में बोरा ओढ़े हैं। वाचक (कवि ) उनके पास सत्संकल्प लेकर गया है। लेकिन गाँधी अपनी व्यंग्यपूर्ण तीखी शैली में मानो उसकी कमज़ोरियों को जानकर कहते हैं –

"दुनिया न कचरे का ढेर
जिस पर दानों को चुगने चढ़ा हुआ
कोई भी कुक्कुट,
कोई भी मुर्गा
यदि बांग दे उठे ज़ोरदार
तो बन जाए मसीहा।"

यानी संकल्प मात्र से कुछ नहीं होता। वाचक को गाँधी जी की डाँट खाकर पता चलता है कि गाँधी और तिलक की लोकप्रियता के पीछे उनकी कितनी कर्मनिष्ठा रही होगी।

वह रक्तलोक-स्नात पुरुष संस्कृति पुरुष होने के साथ-साथ काव्य-पुरुष भी है। वह रहस्यमय व्यक्ति अब तक न पायी गई अभिव्यक्ति है। कवि अनवस्था को सृजन के द्वारा अवस्था प्रदान करता है, मन के अँधेरे से अभिव्यक्ति बाहर आने के लिए छटपटाती है, आकर रहती है। काव्य-पुरुष के इस रूपक का निर्वाह पूरी कविता में हुआ है। मुक्तिबोध ने काव्याभिव्यक्ति को सामाजिक विकास की प्राप्ति के साथ घुला-मिला दिया है। जैसे–जैसे वाचक संस्कृति-पुरुष की आहट से विचलित होकर इधर से उधर दौड़ता है, उसी प्रकार काव्य-पुरुष की आहट से कवि भी पता नहीं, कहाँ-कहाँ दौड़ता है और क्या-क्या सोचता है। अभिव्यक्ति दोनों को द्वंद्व के समाधान के साथ ही प्राप्त होती है। काव्य का उत्कर्ष और समाज का उत्कर्ष, दोनों ही जनता में घुल-मिल जाने में है। कोरे बुद्धि-विलास के जरिये जो लोग अपने को साधारण जन से आगे बढ़ा हुआ समझते हैं उन्हें ये पंक्तियाँ चेतना प्रदान कर सकती हैं -

"विचित्र अनुभव !
जितना मैं लोगों की
पांतों को पार कर
बढ़ता हूँ आगे
उतना ही पीछे मैं रहता हूँ अकेला।
पश्चात पद हूँ।"

संस्कृति-पुरुष और काव्य –पुरुष यानी रक्तालोक-स्नात मनु के दोनों रूपों के लिए श्रेयस्कर यही है कि वह लोगों की पांतों को पार करके आगे निकल जाने की कोशिश न करें।

नि:संदेह मुक्तिबोध वामपंथी विचारों के कवि हैं। विचारधारा की दृष्टि से वे नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन,केदारनाथ अग्रवाल की पंक्ति के कवि हैं। मुक्तिबोध दो बातों में अलग हैं, आत्म-संघर्ष उनकी विशेषता है। वर्ग संघर्ष में आत्मसंघर्ष का समावेश उनकी कविता और उनके विचारों की बहुत महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इसका प्रभाव उनके शिल्प पर पड़ा है। वे सिर्फ वर्ग-शत्रु की ही आलोचना नहीं करते, आत्म-समीक्षा भी करते हैं। उनके व्यक्तित्व का एक अंग व्यक्तित्व के दूसरे अंगों से जवाब तलब करता है –

"होने लगी बहस
लगाने लगे परस्पर तमाचे
और सवाल यह है कि मैं
क्या करता रहा अब तक /"

और

"अरे जीवित रह गए तुम
और मर गया देश।"

मुक्तिबोध अपने आप को "तुम" कहकर भी यानी विपक्ष के रूप में भी संबोधित कर सकते हैं। यह विशेषता मुक्तिबोध को अन्य प्रगतिशील कवियों से अलग करती है। इसी कारण मुक्तिबोध अपराध-बोध के भी कवि बन जाते हैं। रामविलास शर्मा मुक्तिबोध के अपराध-बोध को अस्तित्ववाद से जोड़ते हैं। किन्तु विश्वनाथ त्रिपाठी का मानना है कि मुक्तिबोध के अपराध-बोध का संबंध अस्तित्ववाद से नहीं है। यह अपराध-बोध मध्यकालीन भक्त कवियों की कोटि का है।

भक्त कवि जब – "मो सम कौन कुटिल खल कामी" या "ममता तू न गई मेरे मन से" कहते हैं तो वे अपनी दृष्टि में अपनी समीक्षा करते हैं। अपने सिद्धान्त (भक्ति) और अपने आचरण की तुलना करते हैं और अपनी कथनी–करनी में अंतर पाकर अपराध– बोध से ग्रसित होते हैं।

मुक्तिबोध असुरक्षा के कवि कहे जाते हैं। यह असुरक्षा अराजकता से उत्पन्न होती है। वस्तुत: अस्तित्ववादी विसंगति और अलगाव भ्रष्ट व्यवस्था की अराजकता की उपज हैं। जो होना चाहिए वह नहीं होता और जो नहीं होना चाहिए वह होता है। अच्छे कार्यों का फल बुरा और अपराध का परिणाम अच्छा। भ्रष्ट व्यवस्था कार्य-कारण की नैतिक परंपरा तोड़ देती है। तब आदर्शवादी मन उद्वेलित होता है –

"निजत्व मात्र है बेचैन
कहाँ जाऊँ दिल्ली या उज्जैन"

फैंटेसी शिल्प कार्य-कारण की व्यवस्था को तोड़कर एक प्रच्छन्न परंपरा को स्थापित करती है। मुक्तिबोध के शब्दों में फैंटेसी अपना पृथक दिक् काल स्थापित करती है। इस शिल्प से फैंटेसी थोड़े में बहुत कुछ कह जाती है। "अँधेरे में" कविता के जुलूस में मन्त्री, उद्योगपति, सेना, पुलिस, अध्यापक, आलोचक, कवि-गण और शहर का कुख्यात गुंडा डोमाजी उस्ताद सब शामिल हैं। यह विसंगति राजनीति के अपराधीकरण के यथार्थ का बिंब है। यह फैंटेसी शिल्प से ही संभव थी। इस तरह "अँधेरे में" की फैंटेसी का उपयोग कवि ने काव्य की रचना-प्रक्रिया और उसकी सक्रिय वस्तुनिष्ठ भूमिका की अभिव्यक्ति के रूप में किया है। जब अभिव्यक्ति सांकल बजाती है, तब उससे मिलने की उत्सुकता के बावजूद आत्म-व्यक्तित्व उससे बचाने या निरपेक्ष होने की कोशिश करता है –

अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा,
मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से
बजने दो सांकल ।

"अँधेरे में" की स्वप्न कथा जहाँ समाप्त हो जाती है वहीं सुबह हो जाती है। यह एक तरह से संघर्ष की समाप्ति और संतोष का प्रतीक है जिसकी अभिव्यक्ति अंतिम पंक्तियों में हुई है। "हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव" यहाँ पूर्णत: शमित हो जाता है । मुक्तिबोध ने कविता को"आत्म संघर्ष" कहा है। "अँधेरे में" कविता इसे नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करती है।


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