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ISSN 2292-9754

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01.30.2015


दासप्रथा का प्रथम क्रांतिकारी विद्रोही - ‘स्पार्टाकस’

‘स्पार्टाकस’ रोम साम्राज्य के विरुद्ध बगावत का बिगुल बजाने वाले प्रथम गुलाम योद्धा स्पार्टाकस के जीवन पर आधारित एक रोचक ऐतिहासिक उपन्यास है। इस उपन्यास की रचना अमेरिका के सुप्रसिद्ध लेखक ‘होवर्ड फॉस्ट’ (1914-2003) ने सन् 1951 में की थी। ई.पू. 73 से 71 के मध्य घटित इस विद्रोह से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज़ों का अध्ययन करके ‘होवर्ड फॉस्ट’ ने इस उपन्यास की रचना की। द्वितीय विश्वयुद्ध काल में सन् 1943 में ‘फॉस्ट’ अमेरिका के कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए जिससे अमेरिकी सरकार उनसे नाराज़ हो गई। सन् 1950 में अमेरिका विरोधी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में उनसे पूछताछ की गई। उसी प्रक्रिया में स्पेनी गृहयुद्ध में मारे गए अमेरीकी शहीदों के अनाथों के लिए धन जुटाने वाले लोगों का विवरण देने से इनकार करने के जुर्म में ‘फॉस्ट’ को अमेरिकी कानून के उल्लंघन के लिए तीन महीनों की सज़ा हुई। इस सज़ा को उन्होंने ‘मिल पॉइंट फेडरल प्रिज़न’ में ‘स्पार्टाकस’ उपन्यास के लेखन में बिताया। उन्हें अमेरिका के अश्वेत नागरिकों का रंगभेद आंदोलन व्याकुल कर रहा था। मार्टिन लूथर किंग आदि के आन्दोलनों की पृष्ठभूमि और स्पेन एवं रूस में व्याप्त साम्यवादी विचारधारा से वे प्रेरित हो रहे थे, जिस कारण उन्हें अमेरिका में उपेक्षा सूची (ब्लैक लिस्ट) में डाल दिया गया। उनके उपन्यास ‘स्पार्टाकस’ के प्रकाशन पर रोक लगा दी गयी। ऐसे बड़े प्रकाशक जो ‘स्पार्टाकस’ की पाण्डुलिपि को पढ़कर देखकर प्रकाशित करने के लिए लालायित हो रहे थे, वे सभी पीछे हट गए। इस उपन्यास को प्रकाशित करने के लिए लेखक को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ‘होवर्ड फॉस्ट’ ने घोर आर्थिक विपन्नता में इस उपन्यास को मित्रों की आर्थिक मदद से प्रकाशित करवाया। प्रकाशन के चार महीनों में ही इस उपन्यास के सात संस्करण छापे गए पचास हज़ार प्रतियाँ हाथों-हाथ बिक गईं। सन् 1958 में इस पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। इसके बाद विश्वभर में यह उपन्यास रोम के इतिहास और स्पार्टाकस के रोमांचक चरित्र के लिए लोकप्रिय हुआ। पचास के दशक में होवर्ड फॉस्ट, कम्युनिस्ट समाचार पत्र ‘डेली वर्कर’ के लिए काम करते थे। उन्हें 1953 में ‘स्टालिन शांति पुरस्कार’ (Stalin Peace Prize) से सम्मानित किया गया। कुछ वर्षों बाद सोवियत रूस और पूर्वी यूरोप के देशों की बदहाली और अराजकता से दुःखी होकर उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी से नाता तोड़ लिया। उन्होंने अपने जीवन काल में पचास से अधिक उपन्यासों के अतिरिक्त अन्य चिंतनपरक साहित्य का भी लेखन विपुल मात्रा में किया। उनकी आत्मकथा ‘द नेकेड गॉड-द राइटर एण्ड द कम्युनिस्ट पार्टी’ (1957) चर्चित काफी हुई। होवर्ड फॉस्ट का यह उपन्यास सन् 1960 में ‘स्पार्टाकस’ के ही नाम से जब एक फिल्म के रूप में दर्शकों के सम्मुख आया तो इसने सिनेमा के इतिहास में एक और सुनहरा पन्ना जोड़ दिया। होवर्ड फॉस्ट के अलावा ‘स्पार्टाकस’ के जीवन पर आधारित दो और उपन्यास प्रकाश में आए जो कि होवर्ड फॉस्ट से पहले ही लिखे गए। सन् 1931 में स्कॉट लेखक ‘ल्यू ग्रसिक गिब्बन’ द्वारा रचित ‘स्पार्टाकस’ और सन् 1939 में ‘ऑर्थर कोस्लर’ द्वारा रचित ‘द ग्लेडिएटर्स’।

रोम के वैभवशाली संस्कृति की पृष्ठभूमि पर रचित यह उपन्यास कल्पना और इतिहास का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है। रोम साम्राज्य के सुदूर प्रांत में एक गुलाम शिविर से उठी विद्रोह की एक हल्की सी चिनगारी विस्फोटक ज्वालामुखी का रूप धारण कर लेती है और रोम की शक्तिशाली सत्ता को हिलाकर रख देती है। रोम की नस्लवादी दासता से मुक्ति के लिए स्पार्टाकस नामक एक थ्रेशियन मूल के कद्दावर गुलाम योद्धा के नायकत्व में बंधक गुलामों का एक छोटा सा दस्ता रोम साम्राज्य को ललकारता है। दास प्रथा रोम की वैभवशाली सभ्यता के लिए एक कलंक था। रोम के लिए यह कहा जाता था कि इसके के ऐश्वर्य, वैभव और विलासिता से देवता भी ईर्ष्या करते हैं। रोम की भव्य कलात्मक संस्कृति का दंभ प्रत्येक रोमन के चरित्र में समाया रहता था।

‘स्पार्टाकस’ उपन्यास की मूल कथा योद्धा और ग्लेडिएटर स्पार्टाकस के द्वारा रोम साम्राज्य की सीमाओं में बंधक गुलामों के मुक्ति के अभियान की साहसपूर्ण गाथा है। स्पार्टाकस ही इस उपन्यास का कथानायक है। वह एक सुदृढ़ चरित्रवान योद्धा था जिसमें संगठन की अपार क्षमता थी। वह एक छोटे से विद्रोही बंधक गुलामों के जत्थे को लेकर रोम की शक्तिशाली अपराजेय सैन्य वाहिनियों से लड़कर हज़ारों गुलाम स्त्री, पुरुष और बच्चों को रोम के नरमेधीय दमनकारी उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने का संकल्प लेता है। इसके लिए वह रोम से भीषण संग्राम छेड़ता है। उसकी सोच में एक गुलाम के लिए युद्ध में हार या जीत से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है गुलामी से उसकी मुक्ति और आज़ादी थी। उसके लिए गुलाम की मृत्यु भी एक तरह की आज़ादी थी। इसलिए उस मुक्ति को प्राप्त करने के लिए संघर्ष और मृत्युपर्यंत युद्ध अनिवार्य था। इसी सोच को वह अपने हज़ारों विश्वस्त अनुचरों और बंधक बाल-बच्चों और स्त्री-पुरुषों में भर देता है। मानव का स्वतंत्र अस्तित्व ही मनुष्य सभ्यता की पहली शर्त है। इस मानवाधिकार को अनेकों दंभी निरंकुश शासकों ने अपमानित कर मनुष्य को पशुओं की तरह खरीदने, बेचने और बंधक बनाकर नस्लवादी सभ्यता को जन्म दिया। किन्तु कालांतर में ऐसी सारी सभ्यताएँ नष्ट हो गईं और काल के गर्त में समाकर विलीन हो गईं। ‘स्पार्टाकस’ मनुष्य के अस्तित्व की स्वतन्त्रता की लड़ाई का इतिहास रचने वाला प्रथम इतिहास पुरुष था।

लीबिया के सोने की खदानों में बंधक गुलामों की पीढ़ियाँ जर्जर और रुग्ण हालत में रोमन सैनिकों के अत्याचार तले नारकीय जीवन बिताती रहीं थीं। इन्हीं असंख्य बेज़ुबान नर कंकालों में ‘स्पार्टाकस’ नामक एक बलिष्ठ युवक था जो इन अत्याचारों के बीच उत्कट जिजीविषा धारण किए, कोड़ों की मार से धराशाई बंधकों की सहायता के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर रोमन सैनिकों पर पलटवार करता है। यह उस साहसी युवक के भीतर अन्याय के विरुद्ध जलती हुई प्रतिहिंसा की निशानी थी। उन दिनों रोम के क्रीड़ांगनों (एरीना) में द्वंद्व युद्ध कला में प्रशिक्षित गुलाम लड़ाकों (ग्लेडिएटर) को आपस में लड़वाने का हिंसक खेल मशहूर था। हज़ारों की संख्या में रोम के नागरिक, राजवंश तथा सीनेट के सदस्य एरीना में इस मौत के खूनी खेल को देखकर किलकारियाँ भरते हुए लुत्फ उठाते थे। बंधक गुलामों को हिंसक जानवरों (सिंह, शेर) से लड़ने के लिए भी छोड़ दिया जाता था। इसके लिए गुलामों को तरह तरह के अस्त्र-शस्त्रों से युद्ध करने की कला सिखाई जाती थी। ‘लेन्टुलस बेटियाटस’ नामक गुलामों का एक व्यापारी ‘स्पार्टाकस’ को लीबिया की सोने की खदानों से खरीदकर रोम साम्राज्य के अधीन ‘कैपुआ’ नामक छोटे से सुंदर गाँव मे स्थित अपने गुलाम बाड़े में ले आता है। वहाँ वह खरीदे हुए अन्य बंधकों के संग उसे भी रोम के एरीना में मौत के खेलों के लिए युद्ध कला में प्रशिक्षित करता है। इन्हीं दिनों अकस्मात रोम से सीनेटर ‘मार्कस लिसिनियस क्रेशस’ अपने परिवार सहित ‘कैपुआ’ आ पहुँचता है। वह दुर्व्यसनी ‘बेटियाटस’ का मेहमान बनकर मन बहलाने के साधन तलाशता है। ‘क्रेशस’ रोम के सिनेट का एक अति महत्त्वपूर्ण शक्तिशाली सदस्य तो था ही और साथ में वह एक असाधारण योद्धा और रोम की सेनाओं (लीजिएन्स) का सेनाध्यक्ष भी था। वह एक सौंदर्यप्रिय रसिक कला प्रेमी हृदय का कठोर अनुशासनप्रिय साहसी और निर्मम व्यक्तित्व वाला घमंडी रोमन था। वह रोम साम्राज्य का अधिपति बनने का सपना सँजोए हुए था। ‘क्रेशस’ उपन्यास का महत्त्वपूर्ण पात्र है जो स्पार्टाकस और उसके ‘मिथ’ को रोम के इतिहास से ख़त्म कर देने की शपथ लेता है। उपन्यास में स्पार्टाकस और क्रेशस दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं।

क्रेशस और उसके साथ की विलासी स्त्रियाँ उस गुलाम बाड़े में अपने मन पसंद गुलामों को चुनकर मरते दम तक लड़वाकर मजे लूटना चाहती हैं। इसके लिए वे ‘बेटियाटस’ को मुँह माँगी राशि देते हैं। इस द्वंद्व के लिए वे ‘स्पार्टाकस’ के बलिष्ठ शारीरिक सौष्ठव से आकर्षित होकर उसका चयन करती हैं। लकड़ी के गोल क्रीड़ांगन में में ‘क्रेशस’ और अन्य राज परिवार के सदस्यों के सम्मुख स्पार्टाकस और ड्राबा नामक एक ताकतवर नीग्रो के मध्य रोमांचक मुक़ाबला होता है। स्पार्टाकस परास्त होकर ड्राबा के त्रिशूल के निशाने पर आ जाता है। दर्शक दीर्घा से ड्राबा के लिए स्पार्टाकस को मार डालने का इशारा कर दिया जाता है। लेकिन नीग्रो गुलाम स्पार्टाकस को छोड़कर अपना त्रिशूल सीधे क्रेशस को निशाना बनाकर फेंककर उन पर हमला करने के लिए लपकता है पर उसे वहाँ तैनात सैनिक अपने भाले का निशाना बनाकर मार डालते हैं। क्रेशस भी उसका गला काट डालता है।

स्पार्टाकस इस आकस्मिक घटना से हतप्रभ होकर उसे जीवनदान देने वाले नीग्रो के अन्तर्मन की भावना को समझने लगता है। यही वह क्षण था जब उसमें रोम की सत्ता के खिलाफ ऐसे ही पलटवार करने का साहस जन्म लेता है। उसी गुलाम बाड़ी में ‘वेरीनिया’ नामक एक सुंदर गुलाम औरत भी बंधक थी। स्पार्टाकस वेरीनिया की ओर आकर्षित होकर मन ही मन उससे प्रेम करने लगता है। वेरीनिया के मन में भी स्पार्टाकस के प्रति सहानुभूति और प्रेम की भावना अंकुरित होने लगती है। बेटियाटस के उस ऐशगाह में क्रेशस की नज़र वेरीनिया पर पड़ती है। वह उस गुलाम औरत की सादगी भारी सुंदरता पर मोहित होकर बेटियाटस से वेरीनिया को खरीद लेता है और उसे फौरन रोम स्थित उसके राजप्रासाद को रवाना करने का आदेश दे देता है।

‘कैपुआ’ से क्रेशस और उसके परिवार के लौटने के दूसरे दिन ही बेटियाटस वेरीनिया को साथ लेकर रोम की ओर चल पड़ता है। लेकिन उसी समय कैपुआ के उस गुलाम बाड़े में स्पार्टाकस और गुलामों का प्रशिक्षक ‘मार्सिलस’ के बीच छोटी सी झड़प भीषण रक्तरंजित बगावत बादल जाती है। देखते ही देखते स्पार्टाकस और उसके सभी बंधक साथी बेटियाटस के उस समूचे गुलाम बाड़े और भवनों को ध्वस्त करके वहाँ तैनात सैनिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। वहाँ की सारी संपत्ति लूटकर वे घोड़ों पर सवार होकर भाग निकलते हैं। ‘कैपुआ’ का यह विद्रोह रोम के शासकों के लिए बहुत महँगा साबित होता है। स्पार्टाकस के नायकत्व में एकत्रित एक छोटा सा बागी गुलामों का यह समूह गाँवों और शहरों से गुलाम स्त्री-पुरुषों को रोम के रक्षक सैनिकों और मालिकों से मुक्त कराने लगता है। इसी घटनाचक्र में बेटियाटस के संग निकली वेरीनिया भी रास्ते में बेटियाटस के चंगुल से निकलकर अन्य साथियों के साथ स्पार्टाकस के समूह में शामिल हो जाती है। वह स्पार्टाकस की जीवन संगिनी बन जाती है। स्पार्टाकस अपनी इस जन वाहिनी को रोम की सेनाओं से लड़ने के लिए हथियार चलाने का सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू कर देता है। उसे मालूम था कि एक दिन उनका सामना रोम की सेनाओं से होगा। धीरे धीरे गुलामों का यह काफिला एक विशाल जनवाहिनी का रूप धारण कर लेता है। स्पार्टाकस अपनी इस जनवाहिनी को लेकर पहाड़ो और वन्य प्रदेशों में अस्थाई पड़ाव बनाकर आसन्न युद्ध के लिए व्यूह रचना में मग्न हो जाता है। इस सैन्य अभियान के लिए नगरों और गाँवों से स्पार्टाकस के समर्थक सोना चाँदी और बहुमूल्य वस्तुएँ दान करते जाते हैं। इस धन से स्पार्टाकस एक विशाल गुलाम जन समूह को आज़ादी के घमासान के लिए तैयार करता जाता है।

रोम में स्पार्टाकस के बगावत की खबर से खलबली मच जाती है। प्रारम्भ में रोम के शासक और सिनेट इसे केवल छुटपुट घटना मानकर अधिक ध्यान नहीं देते किन्तु जैसे ही उन्हें स्पार्टाकस के द्वारा रोम साम्राज्य के नगरों और ग्रामों को लूटने और उसकी बढ़ती के सैन्य शक्ति एवं संगठन का समाचार मिलता है तो रोम के सिनेट में गंभीरतापूर्वक इस समस्या पर विचार किया जाता है।

रोम के सिनेट में ‘ग्रेचस’ नामक एक प्रभावशाली वयोवृद्ध चतुर रणनीतिकार उपस्थित रहता है। उसे क्रेशस फूटी आँख नहीं सुहाता। वह क्रेशस से रोम को बचाना चाहता है और उसे रोम की राजनीति से दूर रखना चाहता है। किन्तु जब रोम की सेनाएँ स्पार्टाकस पर काबू पाने में असफल होने लगती हैं तो अंत में सिनेट ‘क्रेशस’ को ही रोम के सारे लीजियन्स (रोमन सैन्य शक्ति) का सेनाध्यक्ष नियुक्त कर देती है। वह स्पार्टाकस और उसकी विशाल गुलाम सेना का ख़ात्मा कर देने का आदेश देती है। दूसरी ओर स्पार्टाकस रोम की सेनाओं से टकराए बिना ही समुद्र मार्ग से रोमन साम्राज्य की सीमाओं से पार अन्यत्र लोगों को मुक्त रूप में बसाने की योजना बनाने लगता है। समुद्र मार्ग से रोम से बाहर निकलने के लिए वह ‘सिलीशियन ‘नामक समुद्री लुटेरों से उनकी नौकाओं को खरीदने के लिए गुप्त रूप से प्रयास करता है। नौकाओं को प्राप्त करने के लिए वह सैन्य अभियान के लिए संचित कोष से सौदा करना चाहता है। इस सौदे की शर्तों के अनुसार स्पार्टाकस को निश्चित अवधि में अपने जनसमूह के साथ सागर तट पर उसे पहुँचाना होता है। किन्तु क्रेशस को स्पार्टाकस की इस गुप्त योजना की सूचना उसके गुप्तचर उसे पहुँचा देते हैं। क्रेशस कुटिलता से उन समुद्री लुटेरों को अधिक धन राशि देकर अपने पक्ष में कर लेता है जिससे वे स्पार्टाकस को नौकाओं को मुहैया कराने के अपने वादे से मुकर जाते हैं। इस तरह स्पार्टाकस बुरी तरह विश्वासघात का शिकार होकर छला जाता है। वह रोम की सेनाओं से युद्ध टालना चाहता था किन्तु अब उसके पास युद्ध करने के कोई दूसरा उपाय नहीं था। उसे मालूम था कि गुलामी की पीड़ा और यातना से मुक्ति पाने के लिए उसके पीछे एक जन सैलाब उसके प्रति अपनी सम्पूर्ण निष्ठा को समर्पित कर आज़ादी की कल्पना में डूबा हुआ था। क्रेशस अपनी विशाल रोमन सेना को लेकर स्पार्टाकस को कुचल डालने के लिए कूच करता है।

स्पार्टाकस अब रोमन सेना का मुक़ाबला करने के लिए व्यूह रचना में लग जाता है। स्पार्टाकस के नायकत्व में एकत्रित निरीह गुलाम स्त्री-पुरुषों का जन-सैलाब अपने अपने हथियारों से क्रेशस की सेना से लड़ते लड़ते कटकर मर जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। भीषण युद्ध होता है। उस घमासान में स्पार्टाकस के हज़ारों लोग मारे जाते हैं। जीवित बचे हुए गुलामों को बंदी बना लिया जाता है। क्रेशस स्पार्टाकस को जीवित देखना चाहता था। उसकी समस्या स्पार्टाकस को पहचानने की थी। स्पार्टाकस भी बंदी गुलामों के समूह में मौजूद रहता है किन्तु क्रेशस उसे नहीं पहचानता। इसलिए वह बंदी गुलामों से स्पार्टाकस की पहचान करने का आदेश देता है। सारा बंदी गुलाम समूह- ‘मैं हूँ स्पार्टाकस, मैं हूँ स्पार्टाकस’ के नारे लगाता है। स्पार्टाकस के प्रति गुलामों की इस समर्पण की भावना को देखकर क्रेशस चकित हो जाता है। घायलों में स्पार्टाकस की पत्नी वेरीनिया अपने नवजात शिशु के साथ दिखाई देती है। क्रेशस उसे तत्काल राजभवन भेजकर अपने अधीन कर लेता है।

क्रेशस ने बहुत पहले ‘कैपुआ’ के गुलाम बाड़े में स्पार्टाकस को नीग्रो ड्राबा से द्वंद्व युद्ध में देखा था किन्तु उसे वह याद नहीं आ रहा था। वहाँ बंधकों में से हर कोई अपने को ही स्पार्टाकस कहता है। अंत में क्रेशस अनुमान से स्पार्टाकस और एंटोनायनस नामक उसके अत्यंत प्रीति पात्र गुलाम को एक साथ अपने राज भवन के प्रांगण में जंजीरों में जकड़कर बंधक बना लेता है। क्रेशस इन दोनों को रोमवासियों के सम्मुख दूसरे दिन क्रीड़ाप्रांगण में लड़वाकर ख़त्म कर देना चाहता था। दोनों में से विजयी गुलाम को वह रोम के राजमार्ग पर सूली से लटका देने की घोषणा कर देता है। उन दिनों बागी गुलामों के लिए यही सज़ा निर्धारित थी।

उस रात क्रेशस वेरीनिया को अपने राजप्रासाद में राजसी वेषभूषा से अलंकृत कर उसके सौन्दर्य का भरपूर आनंद लेने के लिए उद्यत होता है किन्तु वेरीनिया स्वयं को स्पार्टाकस की वफादार पत्नी कहकर उसे ठुकरा देती है। क्रेशस इस अपमान से आग बबूला हो जाता है। वह उसी समय आधी रात को बाहर निकलकर स्पार्टाकस और एंटोनायनस को मृत्यु के लिए लड़ने के लिए उनके हाथों में तलवार दे देता है। इस द्वंद्व में जीवित गुलाम को सूली पर लटकाने की सज़ा सुना देता है। एंटोनायनस नहीं चाहता था कि उसका स्वामी जिसे वह पुत्रवत प्रेम करता था उसे सूली पर कीलों से वेधकर मारा जाये। इसलिए वह स्पार्टाकस को द्वंद्व में मारने की आज्ञा माँगता है। लेकिन स्पार्टाकस भी एंटोनयनस को वह पीड़ादायक मृत्यु नहीं देना चाहता इसलिए वह स्वयं एंटोनायनस को द्वंद्व युद्ध में क्रेशस के सम्मुख मार डालता है। स्पार्टाकस को राजमार्ग पर सूली पर लटका दिया जाता है। स्पार्टाकस पर विजय प्राप्त कर उसे बंदी बनाकर रोम को सौंपने से क्रेशस को असीम राजनीतिक शक्ति प्राप्त हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप उसके प्रतिद्वंद्वियों पर प्राणों का ख़तरा मंडराने लगता है। वेरीनिया को क्रेशस की गुलामी से बचाने के लिए वृद्ध सिनेटर ग्रेचस, व्यापारी बेटियाटस को बड़ी धन राशि देकर उसका इस्तेमाल करता है। वह बेटियाटस में माध्यम से वेरीनिया को राजप्रासाद से निकलवाकर उसे आज़ाद कर रोम से बाहर निकलने के लिए अनुमति पत्र तैयार कर बेटियाटस को देता है। इस तरह ग्रेचस अंत में वेरीनिया और स्पार्टकस के नवजात शिशु को रोम की दासता से मुक्त कर देता है। वेरीनिया और उसके शिशु को लेकर बेटियाटस, रोम नगर की प्राचीरों से बाहर निकल आता है। वेरीनिया राजमार्ग पर स्पार्टाकस को सूली से लटका हुआ देखती है। रोम के सैनिकों की नजरों से बचते हुए वह सूली के पास जाकर अपने नन्हें शिशु को स्पार्टाकस को दिखाती हुई कहती है कि ‘देखो तुम्हारा पुत्र आज़ाद है’। स्पार्टाकस की खुली आँखें अपने नन्हें से शिशु को निहारती हैं। उसकी आँखों में एक चमक विद्यमान थी। उपन्यास की इस पाठकीय संवेदना को फिल्म के पर्दे पर जीवंत कर दिया गया है जिसे देखते हुए हर दर्शकों की आँखें भीग उठती हैं।

1959 में ‘बेन हर’ जैसी महान ऐतिहासिक फिल्म ने दुनिया भर के सिनेमा प्रेमियों को आपनी भव्यता और अद्वितीयता से सम्मोहित कर दिया था। इसी क्रम में ‘स्पार्टाकस’ का फिल्मी पर्दे पर प्रकट होना एक और युगांतरकारी घटना के रूप में आज तक याद किया जाता है। इस फिल्म ने उपन्यास की लोकप्रिययता में चार चाँद लगा दिए। इस वृहत कथा को फिल्मी पर्दे पर उतारने के लिए हॉलीवुड के निर्माताओं में होड़ लग गई। अंत में इस उपन्यास को हॉलीवुड के महान अभिनेता ‘कर्क डगलस’ ने ‘एडवर्ड ल्यूइस’ नामक निर्माता के साथ साझे में फिल्म में रूपांतरित किया। ‘कर्क डगलस’ का व्यक्तित्व रोमन योद्धाओं की भूमिका के लिए उपायुक्त माना जाता था। उनकी उत्कट अभिलाषा ‘विलियम वाइलर’ द्वारा निर्देशित ‘बेन हर’ में नायक बेन हर की भूमिका निभाने की थी। किन्तु वह भूमिका ‘चारल्टन हेस्टन’ को चली गई तो वे निराश हुए। तभी उनके मस्तिष्क में ‘स्पार्टाकस’ के अभिनय का विचार आया। उन्होंने इस लक्ष्य को पूरा कर लिया। सन् 1960 में होवर्ड फॉस्ट के ऐतिहासिक उपन्यास ‘स्पार्टाकस’ को इसी नाम से कर्क डगलस ने ‘स्टैनली क्यूब्रिक’ के निर्देशन में निर्मित करने का निश्चय किया। फिल्म की पटकथा के लिए मशहूर पटकथा लेखक ‘डाल्टन ट्रंबो’ को चुना गया। स्पार्टाकस के विरुद्ध प्रतिद्वंद्वी क्रेशस की भूमिका में ब्रिटिश अभिनेता ‘लारेंस ऑलिवियर’ प्रकट हुए जिन्हें आगे चलकर ब्रिटेन में ‘नाईट’ की उपाधि से सम्मानित किया गया जिससे वे ‘सर लॉरेंस ऑलिवियर’ कहलाए। कर्क डगलस और लॉरेंस ऑलिवियर की टकराहट युद्ध भूमि में रोमांचक होती है वैसे ही फिल्म के अंत में स्पार्टाकस के प्रति क्रेशस की घृणा और शत्रुत्व को व्यक्त करने में अपने रौबीले संवादों से ‘लॉरेंस’ फिल्म में छा जाते हैं। रोमन सेनाध्यक्ष के रूप में उनका व्यक्तित्व रोम के साम्राज्यवादी वैभव को प्रतिबिंबित करता है। स्पार्टाकस की किंवदंती को धरती से, रोमवासियों की सोच से हमेशा हमेशा के लिए मिटाने का क्रेशस के संकल्प को ‘लॉरेंस ऑलिवियर’ अपनी विशिष्ट अभिनय शैली से कर्क डगलस को परास्त कर देते हैं। फिल्म का कारुणिक अंत स्पार्टाकस के प्रति समूचे सभ्य समाज को दासता की यंत्रणा और आज़ादी की सार्थकता को आत्मसात कराने में सफल होता है।

संवेदनशील और ख़ूबसूरत वेरीनिया के पात्र को अभिनेत्री ‘जीन सिमन्स’ ने गरिमा और सार्थकता प्रदान की। स्पार्टाकस के वफादार सेवक और सलाहकार ‘एंटोनायनस’ के लिए उस समय के मशहूर चरित्र अभिनेता ‘टोनी कर्टिस’ ने दर्शकों को प्रभावित किया। फिल्म का अंत स्पार्टाकस और एंटोनायन्स के द्वंद्व-युद्ध से होता है जिसमें एंटोनायनस स्पार्टाकस के हाथों मारा जाता है। कैपुआ का लोभी व्यापारी बेटियाटस के रूप में हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ‘पीटर यूस्टनेव’ थे जो ऐसे रोमन पात्रों के लिए पहचाने जाते थे। उनकी पहचान रोमन सम्राट ‘नीरो’ के रूप में हॉलीवुड की फिल्मों में आज भी चर्चित है। इस फिल्म में स्पार्टाकस और क्रेशस की सेनाओं के मध्य युद्ध का दृश्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। स्पार्टाकस की सैन्य व्यूह रचना फिल्म के पर्दे पर अद्भुत दिखाई देती है। फिल्म का कलात्मक पक्ष बहुत ही सुदृढ़ और आकर्षक है। फिल्म में संवाद बहुत ही आकर्षक और उच्च कोटी के साहित्यिक मूल्यों को स्थापित करते हैं। क्रेशस (लॉरेंस ऑलिवियर) का एंटोनायनस को रोम के संबंध में यह कहना की रोम एक सोच है, परंपरा है, एक अद्भुत अनुभव है, यह इतनी खूबसूरत है कि इससे केवल प्यार किया जा सकता है, दर्शकों में रोमांच पैदा करता है।रोम की सेनाओं से युद्ध से पहली रात को स्पार्टाकस द्वारा अपने गुलाम सहचरों को किया गया संबोधन मार्मिकता और संवेदनशीलता का चरम है। वह अपने साथियों में आत्मविश्वास भर्ता है। मृत्यु के प्रति उसके विचार गुलामों के लिए प्रेयणादायक हो जाते हैं। स्पार्टाकस के शब्दों में ‘आज़ादी की लड़ाई में मृत्यु भी गुलामों के लिए मुक्ति का मार्ग ही है।’

जब यह फिल्म अमेरिका में 1960 में रिलीज़ हुई तो तत्कालीन राष्ट्रपति ‘जॉन एफ केनेडी’ अपने व्हाइट हाउस से निकलकर तमाम सुरक्षा संबंधी औपचारिकताओं को लांघकर वाशिंगटन डी सी के एक सिनेमा हॉल में जाकर बैठ गए। 196 मिनट की इस महाकाव्यात्मक फिल्म को देखकर वे भाव विभोर हो उठे। उन्होंने फिल्म के नायक कर्क डगलस, और निर्देशक स्टेनली क्यूब्रिक को मुक्त कंठ से सराहा। वैचारिक दृष्टि से यह फिल्म लिंकन, मार्टिन लूथर किंग और स्वयं केनेडी के रंगभेद नीति के अनुकूल थी।

इस फिल्म की निर्माण लागत लगभग 120 लाख डॉलर है। आज भी यह फिल्म उतनी ही प्रासंगिक और लोकप्रिय है जितनी सन् 1960 में थी। स्पार्टाकस फिल्म और उपन्यास एक दूसरे के बहुत निकट हैं। ऐसे ऐतिहासिक महत्त्व के उपन्यास का फिल्मी रूपान्तरण निश्चित ही चुनौतीपूर्ण है।
इतिहास के सूत्रों से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि वास्तव में स्पार्टाकस रोम का ही एक सैनिक था। वह रोम की सेना से निकाल जाता है तो उसे बंदी बनाकर गुलाम के रूप में बेच दिया जाता है। स्पार्टाकस उपन्यासों के लेखकों ने इतिहास से ही इस पात्र को चुनकर दासप्रथा के अमानवीय पक्ष को उजागर किया। इसके साथ ही गुलामों की आज़ादी के लिए एक सशक्त मुहिम की शुरुआत हुई। उपन्यास और फिल्मी प्रस्तुति में कहीं कहीं पर भिन्नता स्पष्ट दिखाई देती है किन्तु यह फिल्मी प्रस्तुति के लिए आवश्यक है। स्पार्टाकस फिल्म का रोमांच आज भी फिल्म प्रेमियों के लिए ख़त्म नहीं हुआ है। यह अनिवार्यत: देखने योग्य युगाँतरकारी फिल्म है।


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