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ISSN 2292-9754

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08.15.2016


हिंदी सिनेमा के विकास में फ़िल्म निर्माण संस्थाओं की भूमिका

 भाग - 2

बॉम्बे टाकीज़

सन् 1934 में हिमांशु रॉय द्वारा स्थापित "बाम्बे टाकीज़" फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भारत की प्रथम पब्लिक लिमिटेड कंपनी है। इस कंपनी की सबसे बड़ी अभिनेत्री "देविका रानी" थीं। "बॉम्बे टाकीज़" में हिमांशु रॉय के तकनीकी दल में भारतीय और यूरोपीय दोनों थे। ये सभी अपने अपने क्षेत्र में अनुभवी और असाधारण प्रतिभावान थे। "बॉम्बे टाकीज़" में फ़िल्म निर्देशक के रूप में "फ़्रांज ऑस्टेन" एक प्रमुख नाम था जिसके साथ हिमांशु रॉय ने कई फ़िल्में बनाईं। हिमांशु रॉय ने बॉम्बे टाकीज़ की स्थापना से पूर्व लंदन में कानून की पढ़ाई की थी। इसी दौरान उन्होंने देविका रानी से विवाह कर लिया। देविका रानी उन दिनों वास्तुकला की पढ़ाई कर रहीं थीं, वह एक कुशल वास्तु शिल्पकार बनाना चाहतीं थीं। बॉम्बे टाकीज़ के शुरू होने के बाद हिमांशु रॉय को एक अत्यंत सुंदर और भारतीयता लिए हुए चेहरे की तलाश थी। उनकी नज़र में वैसी सुंदर नायिका उनकी पत्नी देविका रानी ही थी लेकिन देविका रानी के जीवन का लक्ष्य फ़िल्मों में अभिनय कदापि नहीं था। फिर हिमांशु रॉय ने पत्नी को काफ़ी समझाया और उन्हें अभिनय में आने के लिए प्रेरित किया। काफ़ी प्रयासों के बाद देविका रानी तैयार हुईं। देविका रानी को लेकर हिमांशु रॉय ने बॉम्बे टाकीज़ के बैनर तले जो पहली फ़िल्म बनाई वह अंग्रेजी और हिंदी दोनों में थी। उनके कैमरा मैन और निर्देशक दोनों विदेशी थे क्योंकि वे यूरोपीय फ़िल्म बाज़ार को नहीं छोड़ना चाहते थे। उस फ़िल्म का अंग्रेज़ी नाम "कर्मा" और हिंदी में वह "नागिन की रागिनी" नाम से बनी थी। इन दोनों फ़िल्मों में तकनीकी दल और नायक-नायिका और अन्य कलाकार सब एक ही थे। देविका रानी को नायिका के रूप में अभिनय करने में कोई संकोच न हो इसलिए हिमांशु रॉय ने स्वयं नायक के रूप में अभिनय किया था। इस फ़िल्म का अंग्रेज़ी संस्करण इंग्लैंड में रिलीज़ किया गया और हिंदी संस्कारण भारत में। भारत में यह फ़िल्म विफल हुई जब कि इंग्लैंड में यह सफल रही। यह फ़िल्म लंदन में लगातार आठ महीने तक चली जो एक कीर्तिमान है। इस फ़िल्म में देविका रानी ने विदेशी दर्शकों को ज़्यादा प्रभावित किया। उनकी सुंदरता की प्रशंसा लंदन की पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपती रही। दूसरी ओर हिमांशु रॉय के अभिनय की ओर किसी का ध्यान नहीं गया जिसके परिणाम स्वरूप हिमांशु रॉय ने अभिनय से संन्यास ले लिया और वे अपना पूरा ध्यान बॉम्बे टाकीज़ के कार्यकलापों में लगाया। "बॉम्बे टाकीज़" में मुख्यत: सामाजिक विषयों पर ही फ़िल्मों का निर्माण हुआ। हिमांशु रॉय ने हमेशा समाज की रूढ़िवादी संस्कारों और नियमों को आधार बनाकर ही फ़िल्मों का निर्माण किया। इनकी फ़िल्में संदेशात्मक होतीं थीं, और इनकी हर फ़िल्म में कोई न कोई नया संदेश होता था। इस संस्था ने फ़िल्म निर्माण में नए कीर्तिमान स्थापित किए। फ़्रांज ऑस्टेन के निर्देशन में सन् 1935 में बनी "जवानी की हवा" बॉम्बे टाकीज़ की पहली फ़िल्म थी। यह एक अपराध कथा पर आधारित प्रेमकथा थी जिसमें मुख्य भूमिका देविका रानी और नजमूल हसन ने की थी। हिमांशु रॉय ने भारतीय सिनेमा को दो महान अभिनेता दिए - अशोक कुमार और दिलीप कुमार। सन् 1936 बॉम्बे टाकीज़ के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष रहा। इस वर्ष हिमांशु रॉय ने फ़्रांज ऑस्टेन के निर्देशन में तीन फ़िल्मों का निर्माण किया, "जीवन नैया", "अछूत कन्या" और "जन्मभूमि"। इन तीनों में नायक अशोक कुमार और नायिका देविका रानी थीं। "जीवन नैया" अशोक कुमार की पहली फ़िल्म थी। "अछूत कन्या" उस दौर की एक क्रांतिकारी सुधारवादी फ़िल्म थी। यह फ़िल्म समाज में फैली जाति भेद और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों पर प्रहार करती है। यह अपने समय की चंद अति-लोकप्रिय फ़िल्मों में से एक थी। बॉम्बे टाकीज़ से प्रमुख फ़िल्म लेखक के रूप में निरंजन पाल शुरू से ही जुड़े हुए थे। फ़िल्म "अछूत कन्या" की कहानी भी निरंजन पाल की अंग्रेज़ी में लिखी गई कहानी "द लेवल क्रासिंग" पर आधारित थी।

आगे के वर्षों में फ़्रांज ऑस्टेन के निर्देशन में कई फ़िल्में बनीं। "दुर्गा" में देविका रानी के साथ रामा शुक्ल और हंसा वाडेकर ने काम किया था। ऑस्टेन ने केवल इन्हीं दोनों के लिए "नवजीवन" नामक एक फ़िल्म बनाई। हंसा वाडेकर के जीवन पर आधारित फ़िल्म "भूमिका" बहुत आगे चलकर निर्देशक श्याम बेनेगल ने बनायी जिसमें हंसा वाडेकर की भूमिका "स्मिता पाटील" ने की थी। सन् 1939 में निर्मित "कंगन" में अपने समय की चर्चित और सुंदर नायिका "लीला चिटनिस" ने अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू किया था जिसमें नायक "अशोक कुमार" थे। बॉम्बे टाकीज़ में निर्मित फ़िल्मों में "बंधन" का स्थान महत्वपूर्ण है, इसके निर्माता सुबोध मुखर्जी थे। इस फ़िल्म में लीला चिटनिस और अशोक कुमार ने अपने अभिनय की अनूठी छाप छोड़ी। इस फ़िल्म में अशोक कुमार का गाया हुआ गीत "चल-चल रे नौजवान..." काफ़ी लोकप्रिय हुआ।

इसके बाद के वर्षों मे फ़्रांज ऑस्टेन ने बॉम्बे टाकीज़ छोड़ दिया, जिसके बाद बॉम्बे टाकीज़ के साथ सुबोध मुखर्जी और अमिय चक्रवर्ती, दो नए फ़िल्मकार जुड़ गए। सन् 1940 में हिमांशु रॉय की असामयिक मृत्यु हो गई। हिमांशु रॉय की मृत्यु के बाद बॉम्बे टाकीज़ का सारा काम-काज देविका रानी की देख-रेख में होने लगा किन्तु दो वर्षों में यह कंपनी दो हिस्सों में बँट गई। कंपनी एक हिस्सा अमिय चक्रवर्ती के देखरेख में और दूसरा हिस्सा सुबोध मुखर्जी और राय बहादुर चुन्नीलाल की देख-रेख में चला गया। सन् 1941 में ज्ञान मुखर्जी के निर्देशन में "झूला" और सन् 1945 में "किस्मत" फ़िल्में बनाईं। "किस्मत" के निर्माण के साथ साथ सुबोध मुखर्जी ने अपनी अलग फ़िल्म कंपनी खोल ली जिसका नाम "फिल्मिस्तान" रखा गया। उधर अमिय चक्रवर्ती ने सन् 1944 में "ज्वारभाटा" नामक फ़िल्म बनाई। यह फ़िल्म महत्वपूर्ण फ़िल्म इसलिए मानी जाती है क्योंकि भारतीय सिनेमा के महान अभिनेता दिलीप कुमार का फ़िल्मों में प्रवेश इसी फ़िल्म से हुआ था। इसके बाद बॉम्बे फ़िल्म कंपनी भी धीरे-धीरे बंद होने के कगार पहुँचने लगी। उधर "फिल्मिस्तान" से जुड़कर आज के जाने-माने कलाकार और नायक-नायिकाएँ अपना फिल्मी जीवन शुरू कर रहे थे। इनमें देवानंद, श्यामा, कमाल अमरोही, बिमल रॉय, नितिन बोस, और फणी मजुमदार प्रमुख हैं। सन् 1954 तक फिल्मिस्तान भी बंद हो गई।

पारसी समुदाय और भारतीय सिनेमा

भारतीय सिनेमा की प्रगति में देश में बसे हुए पारसी समुदाय का अप्रतिम योगदान है। हिंदी रंगमंच जिस तरह पारसी रंगमंच का ही विस्तार है उसी तरह सिनेमा के क्षेत्र में भी पारसी रंगमंच एवं थियेटर का महत्वपूर्ण प्रभाव है। पारसी निर्माताओं ने हिंदी फ़िल्म निर्माण में अभूतपूर्ण योगदान किया है। भारत के विभिन्न प्रान्तों मे सिनेमा घरों के निर्माण और उनके संचालन में भी इस समुदाय के धनी और समृद्ध लोगों की भागीदारी सराहनीय है। सन् 1918 में जे.एफ. मदन कलकत्ता में सिनेमा के प्रचार और प्रसार के पुरोधा थे। उस समय कलकत्ता में मौजूद तीन सौ सिनेमा घरों में से एक तिहाई सिनेमा घर इन्हीं के थे। ये अपने सिनेमा घरों में प्रदर्शन के लिए अमेरिका और इंग्लैंड से फ़िल्में आयातित करते थे। इनके दर्शकों में प्रमुख रूप से ब्रिटिश फौजी और अन्य अधिकारी हुआ करते थे।

भारतीय सिनेमा की प्रथम महिला संगीतकार "खुर्शीद मंचेर्षा मिनोशेर–होमजी" बनीं जो एक पारसी महिला थीं जिन्होंने हिंदी फ़िल्मों मे "सरस्वती देवी" के नाम से संगीत दिया था। बॉम्बे टाकीज़ की सभी हिट फ़िल्मों के गीतों और फ़िल्म में पार्श्व संगीत सरस्वती देवी ने ही दिया था। "जवानी की हवा, अछूत कन्या, जनमभूमि, जीवन नैया, दुर्गा, कंगन, बंधन और झूला" में सरस्वती देवी ने संगीत निर्देशन किया था। हिंदी सिनेमा में सर्वप्रथम प्रवेश करने वाली महिला कलाकार पारसी समुदाय से ही थीं। सरस्वती देवी ने सोहराब मोदी द्वारा निर्मित "पृथ्वीवल्लभ और परख" फ़िल्मों में भी संगीत दिया था। भारत में प्रथम सवाक फ़िल्म "आलम आरा" के निर्माता "आर्देशिर एम ईरानी" भी पारसी ही थे। इन्हें भारतीय सवाक फ़िल्मों का जनक कहा जाता है। सोहराब मोदी, जे.बी.एच. वाडिया और होमी वाडिया (वाडिया मूवीटोन) अन्य पारसी लोग थे जिनका भारतीय सिनेमा के विकास में महत्वपूर्ण स्थान है।

मिनर्वा मूवीटोन

भारतीय सिनेमा में सोहराब मोदी (1897–1984) एक इतिहास पुरुष के नाम से प्रख्यात हैं। अस्त होते हुए पारसी थियेटर (रंगमंच) को बचाने के लिए सोहराब मोदी ने "स्टेज फ़िल्म कंपनी" का निर्माण किया। वे पारसी रंगमंच के बड़े कलाकार थे। सोहराब मोदी ने सिनेमा के बढ़ते हुए प्रभाव और मांग को देखते हुए सन् 1936 में स्टेज फ़िल्म कंपनी को मिनर्वा मूवीटोन नामक फ़िल्म कंपनी में रूपांतरित कर दिया। इस तरह सोहराब मोदी द्वारा एक सशक्त आधुनिक तकनीक से लैस फ़िल्म कंपनी का निर्माण हुआ। सोहराब मोदी स्वयं एक कद्दावर अभिनेता थे। पृथ्वीराज कपूर और सोहराब मोदी में काफ़ी समानताएँ थीं। दोनों का व्यक्तित्व विशाल, गंभीर और पुरुष से युक्त असाधारण था। संवाद कला में दोनों कुशल थे। दोनों की आवाज़ में रौब भरा एक जादू समाया था। भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक फ़िल्मों को भव्यता के साथ प्रथम प्रदर्शित करने का श्रेय सोहराब मोदी को ही जाता है। वे एक सशक्त निर्देश और निर्माता थे। वे अपने तकनीकी दल को विदेश भेजकर वहाँ से नवीनतम सिनेमा तकनीक को आयातित करते और उसका उपयोग अपने फ़िल्म निर्माण में करते थे। सोहराब मोदी को फ़िल्म निर्माण के प्रारम्भिक प्रयासों में बहुत अधिक सफलता नहीं मिली। उन्होंने 1937 में "आत्मतरंग" नामक एक सामाजिक फ़िल्म बनाई। यह फ़िल्म बुरी तरह असफल हुई। उन्होंने फ़िल्म निर्माण से संन्यास लेने का निर्णय ले लिया। लेकिन एक दिन दर्शकों में से कोई चार दर्शकों ने उन्हें फ़िल्म के लिए बधाई दी और उन्हें ऐसी ही फ़िल्में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। वे चकित थे। सोहराब मोदी ने उनके बारे में जब पता लगाया तो उन्हें पता चला कि वे चारों बंबई हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे। उनका खोया हुआ मनोबल लौट आया। मिनर्वा मूवीटोन हिंदी सिनेमा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हुआ। यहीं से "जेलर, तलाक और मीठा जहर" जैसी लोकप्रिय फ़िल्में आईं। सन् 1940 में "भरोसा, सिकंदर और फिरदौसी" के निर्माण की घोषणा की गई। मोदी हिंदी सिनेमा को पारंपरिक पारसी थियेटर के प्रभाव से मुक्त कर एक नया रूप देना चाहते थे किन्तु उनकी फ़िल्मों मे यह प्रभाव बना रहा। साहित्यिक उर्दू में पात्रों के मुखर संवाद की शैली उनके फ़िल्मों की विशेषता हुआ करती थी। 1938 में बनी "जेलर" को उन्होंने 1958 में दुबारा बनाया। यह एक मनोवैज्ञानिक प्रेम कथा थी। इस फ़िल्म की कहानी और गीत अमीर हैदर कमाल (कमाल अमरोही) ने लिखे थे। मोदी ने इस फ़िल्म में एक क्रूर जेलर का अभिनय किया था। इस फ़िल्म की नायिका "लीला चिटनिस" थी। इस फ़िल्म का प्रीमियर लाहौर में 1938 में हुआ था। मिनर्वा मूवीटोन की फ़िल्में ज़्यादातर सामाजिक बुराइयों और समस्याओं पर ही आधारित हैं। शराब के दुर्व्यसन पर आधारित "मीठा जहर", तलाक के अधिकार आधारित "तलाक"। स्त्री-पुरुष संबंधों पर एक नई पहल सोहराब मोदी ने की थी। "भरोसा" मोदी की सामाजिक फ़िल्मों में विशेष स्थान रखती है। पति, पत्नी और प्रेमी के त्रिकोण को प्रस्तुत करने वाली यह फ़िल्म चर्चित हुई। इसे एक क्रांतिकारी सामाजिक फ़िल्म माना गया।

मिनर्वा मूवीटोन में सोहराब मोदी द्वारा निर्मित ऐतिहासिक फ़िल्में हर युग में याद की जाती हैं। भारतीय इतिहास के कुछ ख़ास प्रसंगों को जिस भव्यता और महानता के साथ सोहराब मोदी ने फिल्मी पर्दे पर प्रस्तुत किया वह बेजोड़ और अभूतपूर्व है। उनकी "पुकार (1939), सिकंदर (1941), पृथ्वी वल्लभ (1943) और झांसी की रानी (1953)" ऐसी ही कालजयी फ़िल्में हैं जो सोहराब मोदी के कलात्मक रौबदार अभिनय के लिए याद की जाएँगी। साथ ही इन फ़िल्मों के भव्य, सेट, राजसी पोशाक (कास्ट्यूम), वैभवशाली राजप्रासादों के दृश्य और पात्रों के सम्मोहक संवादों को नहीं भुलाया जा सकता। ये पाँचों फ़िल्में बड़े बजट की मोदी की फ़िल्में थीं। "झांसी की रानी" भारत की पहली 35 एम एम टेक्नीकलर फ़िल्म थी जिसे बनाने का श्रेय सोहराब मोदी को ही है। मिनर्वा मूवीटोन में निर्मित अन्य चर्चित व लोकप्रिय फ़िल्में हैं – मिर्ज़ा गालिब, वारिस (1954), कुन्दन (1955), राजहठ (1956), नौशेरवाने आदिल (1957) और जेलर (1958)। सोहराब मोदी एक महान अभिनेता, निर्देशक और निर्माता थे जिन्होंने भारतीय सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई और हिंदी सिनेमा को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाया।

वाडिया मूवीटोन

सन् 1933 में जमशेड बोमन होमी वाडिया अपने छोटे भाई होमी बामन वाडिया, बी बिल्मोरिया और टाटा के रिशतेदारों के साथ मिलकर, उस समय अपने ढंग की अलग फ़िल्म निर्माण कंपनी के स्थापना की थी, जिसका नाम था "वाडिया मूवीटोन"। इस फ़िल्म कंपनी को स्टंट फ़िल्में बनाने में विशिष्टता हासिल थी। इनकी अधिकतर फ़िल्मों का निर्देशन होमी वाडिया किया करते थे और इन फ़िल्मों की नायिका, "नादिया" हुआ करती थीं जो "फियरलेस नाडिया" के नाम से सिनेमा जगत में आज तक मशहूर है। निर्देशक होमी वाडिया में बाद में नादिया से शादी भी कर ली थी इस कंपनी ने स्टंट फ़िल्मों के अलावा दूसरे विश्वयुद्ध से जुड़े कई वृत्तचित्रों और न्यूज़ रीलों का निर्माण भी किया था।

इस कंपनी की प्रथम फ़िल्म "लाल-ए-यमन" थी। जिसकी कथा जादुई करिश्मों पर आधारित थी जो पारसी थिएटर के लिए लिखी गई थी। सन् 1935 में निर्मित "देश-दीपक" फ़िल्म एक राजा-रानी की कथा पर आधारित थी जिस पर पारसी थियेटर की छाप स्पष्ट थी। "वाडिया मूवीटोन" की इसी फ़िल्म से नादिया का प्रवेश हुआ था। इस फ़िल्म के कथाकार थे "जोसेफ डेविड" जिन्होंने भारत की प्रथम सवाक फ़िल्म "आलम आरा" की कथा लिखी थी। उसी वर्ष बनी फ़िल्म "हिंद केसरी" से होमी वाडिया ने फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में प्रवेश किया। सन् 1935 में ही होमी वाडिया ने नादिया को लेकर "हंटरवाली" फ़िल्म बनाई जो अत्यंत लोकप्रिय हुई। लोगों ने फ़िल्म में नादिया के दिलेर और हैरतअंगेज़ स्टंट को बहुत सराहा।

नाडिया फ़िल्म से फियरलेस नादिया (निडर नादिया) के नाम से मशहूर हो गई। इस फ़िल्म की कथा एक राज घराने की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उस राज्य की राजकुमारी मुखौटा पहनकर गरीबों पर अत्याचार करने वाले अत्याचारियों पर हंटर से वार कर ग़रीबों की रक्षा करती है। नादिया चलती हुई रेलगाड़ी की छतों पर स्टंट के दृश्यों को साहस के साथ जीवंत रूप में करने में माहिर थी। किसी नायिका का ऐसे दृश्यों को करना दर्शकों के लिए आश्चर्य और रोमांच से भरा होता था, इसलिए ये फ़िल्में ख़ूब लोकप्रिय हुईं। निडर नादिया के इसी स्टंट को भुनाकर "वाडिया मूवीटोन" ने कई फ़िल्में बनाईं, जिसमें सन् 1936 में निर्मित "मिस फ़्रांटियर मेल" सन् 1939 में निर्मित "पंजाब मेल" और सन् 1940 में बनी "डायमंड क्वीन" फ़िल्में आज तक याद की जाती हैं। सन् 1942 के अंत तक वाडिया मूवीटोन भीतरी लड़ाई-झगड़ों के कारण बंद हो गई। इस कंपनी को वी. शांताराम ने खरीद कर इसे ही अपनी निर्माण संस्था "राजकमल कला मंदिर" नाम से स्थापित किया। वर्तमान में वाडिया परिवार के लोग मिलकर "वाडिया मूवीटोन" के नाम से ही टेलीविज़न कार्यक्रमों का निर्माण कर रहे हैं।

फ़िल्म निर्माण कंपनियों का प्रारम्भ वैसे तो सन् 1918 के आसपास हो चुका था और यह सन् 1940 तक निर्बाध गति से ये संस्थाएँ फ़िल्म निर्माण करती रहीं। एक आंकड़े के अनुसार सन् 1935 में पूरे भारत में छोटी-बड़ी मिलाकर कुल पचासी फ़िल्म निर्माण कंपनियाँ मिलकर फ़िल्मों का निर्माण कर रहीं थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध कालीन स्थितियों में भारतीय फ़िल्म निर्माण व्यवस्था काफ़ी प्रभावित हुई। इसका व्यापक असर फ़िल्म बाजार पर पड़ा। इस कारण कई फ़िल्म कंपनियाँ वित्तीय संकट के कारण बंद होने लगीं।

भारतीय सिनेमा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिवर्तन के दौर से गुज़रने लगा। यह परिवर्तन फ़िल्म उद्योग के पुनर्व्यवस्थीकरण के क्षेत्र के साथ साथ फ़िल्मों के विषय और उसकी प्रस्तुति के ढंग पर भी दिखाई देने लगी। इसी कारण सन् 1946 में बनी फ़िल्मों में, विशेष रूप से नवगठित "इप्टा" की द्वारा बनी फ़िल्म "धरती के लाल", चेतनानन्द की फ़िल्म "नीचा नगर", वी शांताराम की सस्ता राजकमल कला मंदिर की फ़िल्म "डॉ कोटनिस की अमर कहानी" की कथावस्तु और प्रस्तुतीकरण पर द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से उत्पन्न परिस्थितियों का तथा भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। ये तीनों फ़िल्में भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और इन्हें विदेशी सिनेमा जगत में भी अनूठी पहचान प्राप्त हुई।

15 अगस्त सन् 1947 को देश आज़ाद हुआ। आज़ाद भारत के उन्मुक्त वातावरण में भारतीय सिनेमा को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। भारतीय सिनेमा में इस नए युग की छवि स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी। इसी वर्ष बंगाल के सत्यजित रे और चिदानंद दास गुप्त ने कुछ लोगों के साथ "कलकत्ता फ़िल्म सोसाइटी" गठन कर लोगों में सिनेमा के प्रति नई संवेदनाओं और जागृति का संचार करने में जुट गए। आज़ादी का उत्सव मनाने के लिए "भारतीय मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर्स एसोसिएयशन" (IMPPA ) ने "आज़ादी का उत्सव" नाम से एक फ़िल्म का निर्माण कर इसे हर जगह थियेटरों में प्रदर्शित किया गया। स्वतन्त्रता प्राप्ती से भारतीय फ़िल्म उद्योग की सरकार से उम्मीदें बढ़ गईं। फ़िल्म निर्माण जगत को आशा थी कि भारत सरकार भी फ़िल्म निर्माण को प्रोत्साहित करेगी और उनकी सहायता करेगी। लेकिन सन् 1948 में प्रधान मंत्री पं. नेहरू ने सिनेमा थियेटरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया।

आर के स्टुडियो

इसी वर्ष भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे बड़ा शो मैन, महान कलाकार और निर्माता-निर्देशक राजकपूर ने आर के फिल्म्स की स्थापना करके इस बैनर की पहली फ़िल्म "आग" रिलीज़ की। राजकपूर स्वयं एक मंझे हुए अभिनेता थे जिन्होंने फ़िल्म निर्देशन, निर्माण संबंधी संयोजन कौशल को अपने पिता पृथ्वीराज कपूर से ग्रहण किया था। उन्हें विरासत में नाट्यकला–कौशल पृथ्वीराज कपूर से प्राप्त हुआ था। पृथ्वी थियेटर में पिता के नेतृत्व में छोटे-छोटे कामों को करते, सीखते हुए वे एक महान कलाकार बने थे। अभिनय के साथ-साथ, निर्देशन और संपादन कला में भी वे पारंगत थे। इसीलिए उनके द्वारा निर्मित सारी फ़िल्मों का निर्देशन और संपादन वे स्वयं करते थे। उनके लिए फ़िल्म में गीत और सगीत का महत्व अत्यधिक हुआ करता था। विषय एवं कथा चयन में वे सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को प्राथमिकता देते थे। सामान्य और निम्न वर्ग के सपनों को उन्होंने देश के नवनिर्माण की स्थितियों से जोड़कर यथार्थपूर्ण फ़िल्मों का निर्माण किया। उनकी प्रारम्भिक फ़िल्में अधिकतर निम्न वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों और बुराइयों के प्रति सुधारवादी दृष्टि को प्रस्तुत करती हैं। इन फ़िल्मों में मानवीय संवेदनाएँ एवं स्त्री-पुरुष संबंधों के आधुनिक स्वरूप को बदलते भारतीय परिदृश्य में कलात्मक ढंग से प्रदर्शित किया गया। "आग, जागते रहो, बरसात, आवारा, श्री 420, जिस देश में गंगा बहती है, आशिक, संगम, मेरा नाम जोकर, कल आज और कल, धरम करम, तक की उनके द्वारा निर्मित फ़िल्मों में उन्होंने स्वयं नायक की भूमिका की थी। तत्पश्चात "बॉबी" के साथ उन्होंने पुत्र ऋषि कपूर को अपने निर्देशन में बनी फ़िल्मों में नायक के रूप में हिंदी सिनेमा में प्रवेश दिलाया। "हिना, राम तेरी गंगा मैली और आ अब लौट चलें" फ़िल्में राजकपूर के बाद आर के बैनर की शेष फ़िल्में हैं जिनमें उनके पुत्र रणधीर कपूर ने भी निर्देशन का दायित्व सँभाला। आर के स्टुडियो और निर्माण संस्था आज भी मौजूद है किन्तु अब वह उस भव्यता और सक्रियता से दूर हो चुका है।

नवकेतन फिल्म्स

"नवकेतन फिल्म्स" की स्थापना सन् 1949 में मशहूर सदाबहार अभिनेता देवानंद और उनके बड़े भाई चेतनानन्द ने की थी। इनके द्वारा निर्मित पहली फ़िल्म "नीचा नगर" थी जिसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई। यह एक संदेशात्मक फ़िल्म थी। देवानंद के छोटे भाई विजयानंद ने भी नवकेतन फिल्म्स के लिए कई सफल और चर्चित फ़िल्मों का निर्देशन किया था जिनमें "गाइड (1965), जेवेल थीफ (1967), जॉनी मेरा नाम (1970) प्रमुख हैं। बाद के वर्षों मे चेतनानन्द इस संस्था से अलग हो गए। देवानंद स्वयं भी एक कुशल निर्देशक थे। नवकेतन बैनर के अंतर्गत निर्मित चर्चित फ़िल्में हैं – बाज़ी (1951), हाउस नं 44 (1955), फन्टूश (1956), काला पानी (1958), काला बाज़ार (1960), हम दोनों (1961), तेरे घर के सामने (1963), जेवेल थीफ (1967), प्रेम पुजारी (1970), तेरे मेरे सपने, हरे राम हरे कृष्ण (1971), हीरा पन्ना (1973) आदि। नवकेतन फिल्म्स की फ़िल्मों का सुनहरा दौर सत्तर के दशक तक ही सीमित हो गया। इसके बाद देवानंद ने कई फ़िल्में बनाईं किन्तु उन्हें दर्शकों ने पसंद नहीं किया। देवानंद की फ़िल्मों के गीत और संगीत विशेष रूप से आकर्षक और मधुर हुआ करते थे जो आज भी लोकप्रिय हैं। एस डी बर्मन और आर डी बर्मन देवानंद के प्रिय संगीत निर्देशक थे जिन्होंने नवकेतन के फ़िल्मों को संगीत से सँवारा।

देवानंद द्वारा निर्मित अधिकतर फ़िल्में संगीतमय रोमांटिक श्रेणी में आती हैं। सामाजिक समस्याएँ, राजनीतिक चेतना, देशभक्ति, स्त्री-पुरुष संबंध जैसे विषय नवकेतन बैनर की फ़िल्मों की विशेषताएँ हैं।

श्वेत श्याम युग से रंगीन फ़लक के युग तक की सुदीर्घ यात्रा देवानंद ने निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के रूप में की थी। इस फ़िल्म कंपनी की सफलता में अभिनय कुशल निर्देशक चेतनानन्द का योगदान अविस्मरणीय है।

यशराज फिल्म्स

यशराज फिल्म्स भारत की अग्रगणी फ़िल्म कंपनी है जिसे निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा ने सन् 1970 में मुंबई में स्थापित किया। फिल्मी मनोरंजन के क्षेत्र में यश चोपड़ा का महत्वपूर्ण स्थान है। यश चोपड़ा ने फ़िल्मी जीवन का प्रारम्भ अपने भाई बी आर चोपड़ा के सहायक के रूप में किया। उन्होंने अपने भाई की फ़िल्म कंपनी "बी आर फिल्म्स " के लिए पाँच सफल फ़िल्मों का निर्देशन किया था। ये सभी फ़िल्में हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। धूल का फूल (1959), धर्मपुत्र (1961), वक़्त (1965), इत्तेफाक (1969) और आदमी और इंसान (1969)। इस संस्था ने पचास से ज़्यादा बहुत ही सफल और लोकप्रिय फ़िल्में निर्मित की हैं जो कि फ़िल्म जगत में एक कीर्तिमान है। इनमें से तेरह फ़िल्मों का निर्देशन यश चोपड़ा ने स्वयं किया है। सामाजिक समस्याओं के अतिरिक्त युवा रोमांस के फिल्मांकन में यश चोपड़ा अपनी ख़ास पहचान रखते हैं। इनकी सभी फ़िल्में प्रेम प्रधान होती हैं और इनका संगीत पक्ष बहुत ही सशक्त होता है। देश-विदेश के अति सुदर प्रदेशों के रोमांटिक फिल्मांकन के लिए यश राज बैनर एक सुपरिचित नाम है। "दाग (1973), कभी-कभी (1976), काला पत्थर (1979), सिलसिला (1981), चाँदनी (1989), डर (1993), दिल तो पागल है (1997) और वीर–ज़ारा (2004), यशराज फ़िल्म कंपनी की सार्वकालिक लोकप्रिय फ़िल्में हैं। यशराज की फ़िल्मों की पटकथा सशक्त और संगीत कर्णप्रिय होता है। यशराज के पुत्र आदित्य चोपड़ा इस फ़िल्म कंपनी मे बतौर निर्माता जुड़ गए हैं और वे अपनी फ़िल्में स्वयं बना रहे हैं। इस कंपनी का अपना स्टूडियो है जिसमें इनकी और अन्य निर्माताओं की फ़िल्में निर्मित होती हैं।
हिंदी फ़िल्मों के निर्माण में प्रारम्भ से ही दक्षिण की फ़िल्म कंपनियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दक्षिण की बड़ी-बड़ी फ़िल्म कंपनियों में हिंदी फ़िल्म निर्माण के प्रति विशेष रुझान दिखाई देता है। फिल्मी कहानियों के लिए दक्षिण के फ़िल्मकार अपनी ख़ास पहचान रखते हैं। दक्षिण में फ़िल्म उद्योग का केंद्र चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलोर में स्थापित है। इन सबमें सबसे पुराना विशाल दक्षिण फ़िल्म उद्योग चेन्नई में केन्द्रित है।

ए वी एम (मययाप्पन) प्रोडक्शन्स/स्टुडियो

ए वी एम प्रोडक्शन्स भारत की सबसे पुरानी फ़िल्म निर्माण कंपनी है। यह ए वी एम स्टुडियो के नाम से भी पहचानी जाती है। इसके स्टुडियो चेन्नई के वडपलनी क्षेत्र में स्थित हैं। इस निर्माण संस्था में लगभग 170 तमिल, तेलुगु, मलयालम और हिंदी फ़िल्में निर्मित हुई हैं। आज भी यह स्टुडियो और निर्माण संस्था फ़िल्म निर्माण में अग्रणी है। सिनेमा के साथ इस संस्था ने टेलीविज़न धारावाहिकों के निर्माण में भी अपनी विशेष पहचान बना ली है। ए वी एम ने कई बड़े सितारों को तमिल और तेलुगु सिनेमा जगत में प्रवेश दिलाया, जिनमें प्रमुख हैं – वैजयंतीमाला, शिवाजी गणेशन, एस एस राजेन्द्रन और कमाल हसन आदि।

ए वी एम के पास शूटिंग फ्लोर के अलावा डब्बिंग, रिकॉर्डिंग और अन्य तकनीकी सुविधाओं की व्यवस्था है। ए वी एम स्टुडियो (फ़िल्म कंपनी) में निर्मित लोकप्रिय मशहूर हिंदी फ़िल्में हैं – "बहार" (1951, वैजयंतीमाला की पहली हिंदी फ़िल्म), लड़की (1953), चोरी चोरी (1956), मिस मेरी, भाई भाई, भाभी (1957), बरखा (1959), छाया (1961), मैं चुप रहूँगी (1963), पूजा के फूल (1964), दिल का राजा (1972), जैसे को तैसा (1973)।

पारिवारिक समस्याओं पर आधारित सुंदर स्वच्छ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को संवर्धित करने वाली, भारतीय नारी के त्याग, क्षमा, सेवा, परोपकार और संघर्ष को दर्शाने वाली कहानियों को चुनकर फ़िल्में बनाने का श्रेय ए वी एम स्टुडियो को जाता है। सम्मिलित परिवार में स्नेह और आत्मीयता, परस्पर समर्पण और त्याग की भावना को प्रेरित करने वाली इन फ़िल्मों में प्रेम और सौन्दर्य का मधुर मिश्रण भारतीय पारिवारिक जीवन के सुखमय पक्ष को दर्शाता है।

दक्षिण भारत की अन्य फ़िल्म निर्माण संस्थाएँ जहाँ से उत्तम पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों के पक्षधर फ़िल्मों का निर्माण हुआ उनमने प्रमुख रूप से जेमिनी, विजया-वाहिनी और प्रसाद स्टुडियो एवं निर्माण संस्थाएँ उल्लेखनीय हैं। जेमिनी स्टुडियो की स्थापना सन् 1940 में एस एस वासन ने मद्रास में की थी। यहाँ से तमिल और तेलुगु फ़िल्मों के अलावा कुछ लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मों भी बनाकर हिंदी सिनेमा जगत को आकर्षित करने में सफल हुईं। इंसानियत (1955, दिलीप कुमार-देवानंद) और पैगाम (1959, दिलीप कुमार-वैजयंतीमाला) जेमिनी की उल्लेखनीय हिंदी फ़िल्में रहीं हैं। सन् 2002 में जेमिनी स्टुडियो की इमारतों को ढहाकर एक आलीशान होटल बना दिया गया।

प्रसाद स्टुडियो

भारतीय सिनेमा निर्माण के इतिहास में दक्षिण भारत की एक महत्वपूर्ण संस्था है "प्रसाद स्टुडियो"। एल वी प्रसाद नामक एक युगांतरकारी सिनेमा प्रेमी कलाकार द्वारा सन् 1956 में इस संस्था की स्थापना मद्रास में हुई। यहाँ से तेलुगु, तमिल, कन्नड, मलयालम और हिंदी में लगभग 150 फ़िल्में बनी हैं। प्रसाद स्टुडियो के निर्माता एल वी प्रसाद की आस्था भारतीय पारिवारिक मूल्यों में गहन रूप से विद्यमान थी, जो उनकी फ़िल्म कला में मुखर होकर प्रकट हुई। एल वी प्रसाद ने हिंदी की प्रथम सवाक फ़िल्म "आलम आरा" में अभिनय किया था। प्रसाद स्टुडियो के अंतर्गत फ़िल्मों के संपादन, साउंड रिकार्डिंग, कलर प्रोसेसिंग और डब्बिंग आदि तकनीकी उपकरणों से लैस अत्याधुनिक सुविधाएँ निर्माताओं के लिए उपलब्ध हैं। एल वी प्रसाद को भारतीय सिनेमा में अप्रतिक योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हैदराबाद में उनके द्वारा निर्मित प्रसाद आइमेक्स 3 डी सिनेमा हाल विश्व स्तर का अपना एक मात्र मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर है जिसमें विश्व का सबसे बड़ा 3 डी आइमेक्स स्क्रीन मौजूद है। इस ऐतिहासिक निर्माण संस्था मे एल वी प्रसाद के निर्देशन में बनी हिंदी की प्रमुख और लोकप्रिय फ़िल्में हैं -

शारदा (1957, राजकपूर-मीना कुमारी), छोटी बहन (1959), ससुराल (1961), हमराही (1963), बेटी-बेटे (1964), दादी माँ (1966), मिलन (1967), राजा और रंक (1968), जीने की राह (1969),खिलौना (1970), बिदाई (1971), शादी के बाद (1972), जय-विजय (1977), ये कैसा इंसाफ (1980), एक दूजे के लिए (1981), मेरा घर मेरे बच्चे (1985), स्वाती (1986)। इनमें से अधिकांश फ़िल्में तेलुगु और तमिल भाषाओं में पहले बनीं हैं।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में प्रसाद स्टुडियो के फ़िल्मों की लोकप्रियता की अपनी एक अलग पहचान है। ये सभी फ़िल्में संगीत प्रधान हैं जिनके गीत आज भी सुनाई देते हैं, और लोग इन्हें पसंद करते हैं। मद्रास में हिंदी फ़िल्म निर्माण के इतिहास में "विजया वाहिनी स्टुडियो" की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस फ़िल्म निर्माण संस्था "मूला नारायण स्वामी और बी एन रेड्डी" ने मिलकर सन् 1948 में स्थापित किया था। यहाँ से दक्षिण भारत के दिग्गज फ़िल्म निर्देशकों के निर्देशन में बहुत ही सुंदर मनोरंजक और संदेशात्मक फ़िल्में तेलुगु, तमिल और हिंदी में बनी हैं। तेलुगु की कालजयी, सार्वकालिक लोकप्रिय पौराणिक फ़िल्म "माया बज़ार" इसी विजया निर्माण संस्था की ही निर्मिति है। यह स्टुडियो बहुमंज़िला है, जहाँ ऐतिहासिक और पौराणिक फ़िल्मों के निर्माण के लिए विशेष सेट और अन्य सुविधाओं की स्थायी व्यवस्था है। इस निर्माण संस्था द्वारा निर्मित हिंदी फ़िल्मों में "राम और श्याम (1967, दिलीप कुमार), नन्हा फरिश्ता (1969), घर घर की कहानी (1971), जूली (1975), यही है जिंदगी (1978), स्वर्ग नरक (1978), स्वयंवर (1980) और श्रीमान श्रीमती (1982) प्रमुख हैं। सन् 1980 से यह स्टुडियो बंद पड़ा है।

रामोजी फ़िल्म सिटी

हैदराबाद स्थित रामोजी फ़िल्म सिटी, भारतीय और विदेशी सिनेमा निर्माण की आज एक अग्रणी संस्था बन गई है। इसकी स्थापना रामो जी राव नामक एक उद्योगपति ने सन् 1996 में की। रामोजी राव पत्रकारिता, वित्त प्रबंधन और सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। रामोजी फ़िल्म सिटी दो हजार एकड़ में कृत्रिम रूप से निर्मित उद्यान वनों, राजप्रासादों, ऐतिहासिक इमारतों के प्रतिरूपों, अत्याधुनिक पाश्चात्य शैली के निर्माणों, महलों, किलों आदि की भव्यता धारण किए हुए फैला है। तीन पाँच सितारा होटल और अन्य तरह की आवासीय सुविधाओं से सुसंपन्न यह निर्माण सस्ता देश–विदेश के फ़िल्म निर्माताओं के लिए एक वरदान है। यहाँ ई टीवी के भारतीय भाषाओं के स्टुडियो भी स्थित हैं। इस संस्था में प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में फ़िल्में निर्मित होती हैं। हर तकनीकी व्यवस्था से लैस होने के कारण निर्माता-निर्देशकों को कहीं और उसे तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती है। हॉलीवुड के फ़िल्म निर्माता भी रामोजी फ़िल्म सिटी की ओर फ़िल्म निर्माण के लिए आकर्षित हो चुके हैं। रामोजी राव स्वयं भी एक उत्तम कोटि के फ़िल्म निर्माता हैं। उन्होंने लगभग 80 फ़िल्में तेलुगु, तमिल, हिंदी, कन्नड, मराठी और बंगाली भाषाओं में सफलतापूर्वक बनाई हैं। हैदराबाद में अन्य फ़िल्म निर्माण संस्थाओं मे "अन्नपूर्णा स्टुडियो, पद्मालया स्टुडियो प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। अन्नपूर्णा स्टुडियो की स्थापना तेलुगु सिनेमा के युग-पुरुष डॉ अक्कीनेनी नागेश्वर राव द्वारा 1970 में की गई। तेलुगु फ़िल्म उद्योग को स्वतंत्र अस्मिता दिलाने के लिए उन्होंने मद्रास से तेलुगु फ़िल्म उद्योग को निकालकर तेलुगु प्रदेश, हैदराबाद में स्थानांतरित किया। उनका यह योगदान ऐतिहासिक महत्व का है। अन्नपूर्णा स्टुडियो में देश के सभी भाषाओं की फ़िल्में तकनीकी प्रक्रिया के लिए आती हैं। अक्कीनेनी नागेश्वर राव की मृत्यु के बाद उनके अभिनेता पुत्र नागार्जुन इस स्टुडियो के संरक्षक हैं।

हिंदी फ़िल्म निर्माण में दक्षिण भारतीय निर्माण संस्थाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। हिंदी सिनेमा निर्माण ने उत्तर और दक्षिण की दूरियों को ख़त्म किया है। हिंदी के दिग्गज कलाकारों ने दक्षिण में बनी हिंदी फ़िल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उसी तरह दक्षिण के कलाकारों, निर्देशकों और निर्माताओं ने हिंदी सिनेमा के उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से यह साझा प्रयास प्रशासनीय है। भारतीय सिनेमा के प्रोन्नयन में समूचे देश का योगदान है जिसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। साथ के दशक से फ़िल्म निर्माता स्वतंत्र रूप से फ़िल्म बनाने लगे। उससे पहले फ़िल्में स्टुडियो के मालिक ही कलाकारों को मासिक वेतन पर नियुक्त करके फ़िल्में बनाते थे। फ़िल्म की पटकथा लेखक, संगीत निर्देशक, निर्देशक एवं नायक-नायिका आदि कलाकार सभी निर्माण संस्था के वेतन-भोगी लोग ही होते थे। ये इन संस्थाओं से अनुबंधित होते थे इसलिए इन्हें अनुबंधित काल में अन्य संस्थाओं में काम करने की स्वतन्त्रता नहीं होती थी। सन् साठ के दशक से यह परंपरा टूटी और निर्माता भी आज़ादी से अपनी फ़िल्में बनाने लगे। फ़िल्मों के निर्माण में फ़िल्म कंपनियों का एकाधिकार समाप्त हुआ। इसके बदले में फ़िल्म स्टुडियो निर्माताओं को भाड़े पर उपलब्ध कराए जाने की पद्धति शुरू हुई जो आज भी मौजूद है। आज कोई भी निर्माता किसी भी फ़िल्म स्टुडियो में अपनी फ़िल्म बना सकता है। कलाकार भी अनुबंध के बंधन से मुक्त हैं। इस तरह से एक नए युग का प्रारम्भ हुआ। भारत फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में विश्व में एक शक्तिशाली देश बनाकर उभरा है। भारत में फ़िल्म निर्माण की सभी तकनीकी सुविधाएँ अत्याधुनिक स्तर पर उपलब्ध हैं।


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