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ISSN 2292-9754

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01.06.2016


एक राजनैतिक कहानी
तेलुगु मूल : "ओका राजकीय कथा"
लेखिका : वोल्गा
हिंदी अनुवाद : प्रो. एम. वेंकटेश्वर

जो कुछ हुआ उसमें मेरा क्या दोष था, यह मैं आज तक नहीं जान पाई। जो घटित हुआ उसे रोकना यदि मेरे वश में होता तो शायद मुझे इतना बुरा नहीं लगता। यदि यही संकट मेरे पति पर आ पड़ता तो मैं उनका कितना साथ देती, मैं उन्हें कितनी सांत्वना देती, उन्हें अपने सीने में छुपा लेती। वह शाम मुझे आज भी याद है, वह दृश्य आज भी मेरी आँखों में सजीव हो उठता है।

उनका नाम मैं पहली बार अपने ताऊ जी से ही सुनी थी। ताऊ जी ने ही हमारा रिश्ता तय किया था।

"मधुसूद" नाम मुझे अत्यंत मोहक और पवित्र प्रतीत हुआ था। इस नाम ने मेरे मन में एक उमंग और नया उल्लास भर दिया था। मेरे कानों में यह नाम रह-रहकर गूँजता था। उन दिनों मुझे जीवन की सार्थकता इसी नाम में समाहित जान पड़ती थी। मेरे नाम के साथ जुडने वाले नाम की कल्पना में मैं पिछले तीन वर्षों से खोई हुई थी। आज मेरी कल्पना साकार हो रही थी। उस क्षण से मुझे मेरा अपना ही घर जिसमें मेरा बचपन बीता और जहाँ मैं पलकर बड़ी हुई थी, अचानक पराया लगाने लगा।

"कुछ ही दिनों में मुझे अपना यह घर छोड़ना होगा", इस विचार को लिए मैं निश्चिंत रहने लगी थी। इधर कुछ समय से माँ मुझे टोकने लगी थी कि – “तुम तुम्हारे घर जाकर अपनी इच्छानुसार कर लेना, यहाँ तो ऐसे ही चलने दो जैसे चल रहा है।"

माँ के उन वचनों को सुनकर मैं सोचती कि "सचमुच अपने घर को मैं अपनी पसंद से सजाऊँगी"। तब से मैं अपने उस घर की कल्पना में डूबी रहने लगी थी। आख़िर पता चला कि मेरा घर हैदराबाद में है। यह सुनते ही मैं ख़ुशी से झूम उठी थी। "हैदराबाद और मधुसूदन" – ये दो नाम मुझे बार-बार छेड़ जाते जिससे मन में गुद्गुदी सी होने लगती। मेरे होंठों पर हल्की मुस्कान छा जाती। मुझे इस तरह देख मेरी छोटी बहन मुझे चिढ़ाया करती, मैं और अधिक शर्म से लाल हो जाती।

मधुसूदन से रिश्ते के लिए दहेज़ में पचास हज़ार रुपये मेरे घर वाले दे रहे थे। यह मेरी सहेलियों में अच्छा-ख़ासा चर्चा का विषय बन गया। हमारी बी.ए. की परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं। मेरी सहेलियों में शादी और दहेज़ पर बहस शुरू हो गई। उन सब लोगों में मेरी ही शादी सबसे पहले तय हुई थी, इसका मुझे गर्व था। दहेज़ की बात सुनकर कुछ सहेलियों ने, "बाप रे बाप, इतना दहेज़" कहा। एक लड़की ने दहेज़ प्रथा के विरोध में लंबा भाषण दे डाला।

विवाह के बाद मैं पति को सुखी रखूँगी, उनका सारा काम करूँगी, उनके बच्चों को जन्म दूँगी। इसलिए उस सहेली के अनुसार इन सारी ज़िम्मेदारियों के बदले में उन्हें ही दहेज़ देना चाहिए, मैं क्यों दहेज़ दूँ?

मुझे लगा कि विवाह की पवित्रता को वह अपनी तीखी आलोचना से भंग कर रही थी। उसकी बातों से मुझे बहुत गुस्सा आया। "उनके लिए काम करूँगी तो क्या वह मेरे लिए नहीं होगा? और फिर बच्चे होंगे तो क्या वे मेरे नहीं होंगे?” जब मैंने उस वक्र बुद्धि वाली लड़की से यह पूछा तो – "फिर इसके लिए उन्हें पचास हज़ार रुपये देने की क्या ज़रूरत, जब तुम दोनों मिलकर सुखी रह सकते हो तो!” – कहकर उत्तर दिया उसने। जैसे वह कोई बड़ा कानूनी दाँव-पेंच सिखा रही हो मुझे। उसके कुतर्क का कोई उत्तर नहीं था मेरे पास।

उसे समझाने का जब कोई उपाय मुझे नहीं सूझा तो मैंने उससे कह दिया – "ये सब तो विवाह की रस्मों का ही हिस्सा होती हैं, इसलिए इनको निभाना पड़ता है, और फिर जब मुझे और मेरे परिवार वालों को इस पर आपत्ति नहीं तो है तो उसे क्यों इतनी परेशान हो रही है?

"शादी के बाद तुम्हें इसका फल भुगतना पड़ेगा" – उसने कहा और चली गई।

देखते ही देखते मेरा ब्याह हो गया। ब्याह पारंपरिक रीति से ही संपन्न हुआ। विवाह मंडप में उनके प्रथम दर्शन से ही मैं उन पर मोहित हो गई। उन क्षणों को मैं कभी भुला नहीं सकती। वे अपनी फोटो से कहीं अधिक सुदर्शन थे। उनका व्यक्तित्व और उनका सहचर्य, सब कुछ मेरे लिए बहुत प्रिय होगा, इसका मुझे विश्वास होने लगा। विवाह के सारे अनुष्ठान मैंने पवित्र मन से संपन्न किए थे। अपने सुहाग की निशानी, मंगलसूत्र को प्रेम से सहेजकर मैंने अपने सीने में छुपाकर रख लिया था। वह मेरे जीवन का सर्वोत्तम क्षण था। मेरा सुहाग ही मेरे संपूर्ण जीवन का अमूल्य वरदान था। निर्मल मन से उनके सुख-दुःख में सहभागी बनने का दृढ़ संकल्प मैंने लिया। आगे चलकर, जब किसी बात पर मन दुःखी हो जाता तो मुझे विवाह के उस संकल्प की याद हो आती और तब मैं उस दुःख को भुलाकर प्रसन्नता से उनके साथ हो लेती। पति-पत्नी के परस्पर संबंधों और पत्नी के कर्तव्यों का बोध मुझे हो चुका था। इससे जुड़े फ़िल्मी गीत मैं बचपन से गुनगुनाती थी। दांपत्य संबंधों पर आधारित कहानियाँ और उपन्यास मुझे विशेष प्रिय थे। अक्सर इनमें नारी जीवन के आदर्श को आकर्षक शैली में चित्रित किया जाता था। मैं अपनी जीवन बेल को मधुसूदन से लिपटा हुआ पाती और स्वयं को सुरक्षित महसूस कर निश्चिंत हो जाती।

लेकिन यह सब आसानी से नहीं हुआ था। विवाह के दिन मन में जागी आशाओं को साकार रूप देने के लिए मुझे काफ़ी संघर्ष करना पड़ा था। उनकी और मेरी प्रवृत्तियाँ परस्पर विपरीत थीं। वे आरामपसंद थे और स्वच्छता के प्रति लापरवाह। मैं अत्यंत सफ़ाई-पसंद थी। मेरे अत्यधिक स्वच्छता प्रेम से वे कभी-कभी झल्ला जाते थे। लेकिन मैं बहुत जल्द ही उनके अनुकूल बनने के प्रयास में लग गई।

मेरी एक पड़ोसन थी जिसे मेरी तरह साफ़-सफ़ाई का जुनून नहीं था किन्तु उनके साहब घर में अव्यवस्था से भड़क उठते थे। वह बेचारी पति से डरकर घर को बहुत सजा-सँवारकर रखती थी। हम दोनों जब भी मिलते, हमारी चर्चा का यही विषय होता। हम लोगों ने अपनी आदतों को एक-दूसरे से साझा करने का निश्चय कर लिया।

वैसे उनका व्यवहार मेरे साथ प्रेमपूर्ण ही रहता। कभी-कभी मेरे मन में प्रश्न उठता कि प्रेम का मापदंड क्या है? साथ मिलकर फ़िल्में देखना और सैर-सपाटे करना ही यदि प्रेम है तो मुझे इसकी कमी नहीं थी। लेकिन कभी अपनी पसंद के फूलों को बालों में सजाकर मनपसंद हिंदी फ़िल्म दिखाने का मेरा अनुरोध, उनके चेहरे पर सख़्ती अवश्य ले आता। ठीक उसी समय मुझे अपना संकल्प याद आ जाता। मेरे सास और ससुर दोनों बहुत भले लोग थे। हमारे विवाह में दहेज़ के अलावा उन्होंने हमसे और कुछ नहीं लिया था और न ही मुझे किसी चीज़ के लिए तंग किया, इसलिए उन दिनों हमारा जीवन सुखी था।

उस दिन हमारी शादी की पहली सालगिरह थी। शाम का समय था, आँगन में उनकी प्रतीक्षा में बैठी मैं उनकी कमीज़ में बटन टाँक रही थी। मन में बीते वर्ष की खट्टी-मीठी यादें बसी हुईं थीं। मैं उन्हीं यादों में खोयी हुई थी कि इतने में बाहर से कोई शोर सुनाई दिया। सहमते हुए मैं फाटक की ओर दौड़ पड़ी। फाटक पर एक ऑटो को घेरे बहुत सारे लोग दिखाई पड़े । कुछ लोग स्कूटरों पर सवार थे जो ऑटो के साथ आए थे। मैंने देखा कि कोई चार व्यक्ति भीड़ के बीच में से रास्ता बनाते हुए मेरे पति को ऑटो से उतारकर भीतर ला रहे हैं। लड़खड़ाते कदमों से उनको चलते देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया और मैं फफक कर रो पड़ी।

"कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं हुआ" कहते हुए एक सज्जन मधुसूदन को पलंग पर लिटाने लगे। तब मैंने देखा, उनका दाहिना हाथ खून से लथपथ पट्टी में बँधा था। मुझे चक्कर सा आने लगा। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया, कुछ ही देर में मैं निढाल होकर लुढ़क गई।

"उन्हें क्या हो गया, क्या मेरे सर्वस्व नहीं बचेंगे?” यह सोचकर मैं रोने लगी। मुझे धीरज बँधाते हुए उन लोगों ने मुझे उस दुर्घटना के बारे में बताया जिसे सुनकर मैं काँप उठी। उनकी फैक्ट्री में वे जिस मशीन पर काम करते थे, उसका कोई नाम बताया उन लोगों ने। ये उस मशीन पर सात साल से काम कर रहे थे। उन्हें इस मशीन की काफ़ी अच्छी जानकारी भी थी। आज उसी मशीन में इनके दाहिने हाथ की सारी उंगलियाँ कटकर अलग हो गईं। उस मशीन ने हाथ को बड़ी बेरहमी से चबा डाला था। उनके साथियों ने उस दुर्घटना को मामूली सा बताया था। उन्हें अस्पताल से ही लाया गया था। उन लोगों ने उनके इलाज का पूरा आश्वासन दिया। मधुसूदन को विश्राम की आवश्यकता थी, साथ ही पौष्टिक आहार तथा दवादारू के लिए उनके साथियों ने मेरे हाथ में कुछ रुपये रख दिए। वे सब मेरे पति के ही फैक्ट्री के यूनियन के कार्यकर्त्ता थे। इस संकट की घड़ी में इतने सारे लोगों का मेरी मदद के लिए आ पहुँचना केवल ईश्वर की ही कृपा थी। उन लोगों की सांत्वना से अपने आँसुओं को पोंछकर बड़े धैर्य से मैंने मधुसूदन की आँखों में झाँक कर देखा। दुःख में व्यक्ति कितना अकेला पड़ जाता है। किन्तु दुःख के स्पर्श से पूर्व ही यदि कोई हमें सहारा दे दे तो उससे मन को जो राहत मिलती है उसका आभास मुझे जीवन में पहली बार हुआ।

फैक्ट्री वालों को विदा कर जब मैं भीतर आयी तो मेरे अंदर की पीड़ा फिर मुझे सालने लगी। लेकिन इस बार मैं नहीं रोई। मुझे रोने का अवसर ही मधुसूदन ने नहीं दिया। वे अपने ठूँठनुमा हाथ को देखकर हिचक-हिचक कर रोने लगे, मैं अपना सारा धैर्य बटोरकर, अपने आँसुओं को रोककर, उनके आँसू पोंछने लगी। उन्हें नन्हें शिशु की भाँति मैंने अपने सीने से लगा लिया और अपनी सारी ममता उन पर उंडेल दी। उन्हें ढाढ़स बँधाती रही। उँगलियों के बिना भी उनका जीवन पूर्ववत चलता रहेगा, इसकी ज़िम्मेदारी मैंने अपने ऊपर ले ली। वे अपार दुःख और पीड़ा के सागर में डूब चुके थे। उन्हें मेरे प्रेम पर भी संदेह होने लगा।

"आपका ऐसा सोचना भी कैसा पागलपन है" – कहकर मैंने उन्हें डाँट दिया। "वे चाहे जैसे भी हैं, मेरे अपने हैं, और मेरे प्रेम की ऐसी अनगिनत परीक्षाओं की भी मुझे परवाह नहीं है" – सोचा मैंने।

उनके खून से सने, दवाओं की पट्टी में बँधे हाथ को मैंने धीरे से अपने हाथों में लेकर हल्के से उसे अपने होठों से लगा लिया। उसी क्षण उनको एक बड़ी चिंता ने आ घेरा। हाथ की उँगलियों के बिना उनकी नौकरी का क्या होगा? यदि नौकरी चली गई तो हमारा गुज़ारा कैसे होगा? फिर दूसरी नौकरी कहाँ मिलेगी? मेरे लाख समझाने पर भी उनकी पीड़ा कम नहीं हुई। अंत में किसी तरह नींद की गोलियाँ देकर उनको सुला पाई और ख़ुद रात भर जागती रही।

दूसरे दिन उनकी दुर्घटना की ख़बर पाते ही मेरे सास और ससुर दोनों आ पहुँचे। घर में फिर रोना-धोना शुरू हो गया। "क्या इस रोने-धोने का कोई अंत नहीं है? ये लोग क्या उन्हें सँभलने ही नहीं देंगे?” मैं यह सोच ही रही थी कि उनकी यूनियन के कार्यकर्ता आ पहुँचे। उन लोगों को देखकर घर वाले थोड़ा सतर्क हो गए।

"नौकरी के बारे में चिंता की कोई बात नहीं है। यदि तुम्हें नौकरी से निकाल दें तो फिर हमारी यूनियन किस लिए है" – कहा उन लोगों ने। नौकरी और मुआवज़े की समस्या को समाधान के लिए उन पर छोड़ देने के लिए उन लोगों ने आग्रह किया। उनकी बातों से मेरे पति को काफ़ी मनोबल प्राप्त हुआ। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर अपने यूनियन के प्रमुख से मेरा परिचय कराया और उनके चरणों में मुझे प्रणाम करने को कहा। मैं घबराई हुई सी उनके चरणों की ओर बढ़ने लगी तो वे पीछे हट गए।

उस नेता ने बताया कि मधुसूदन की नौकरी की रक्षा केवल यूनियन और उसके नेताओं के प्रभाव से नहीं हुई बल्कि श्रमिकों में विकसित नई सोच के फलस्वरूप हुई है। श्रमिक आँदोलन से पहले फैक्ट्री में दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के लिए लाचार होकर मर जाने के सिवाय और दूसरा कोई रास्ता नहीं था। फैक्ट्री के मालिक कभी उन लोगों की परवाह नहीं करते थे। इसीलिए श्रमिकों ने संगठित होकर आत्मरक्षा के लिए कुछ नियम बनाए हैं। अत: अब मधुसूदन की समस्या आसानी से हल हो सकती है। फैक्ट्री के कर्मचारियों के लिए आयोजित अनेक कल्याण योजनाओं के संबंध में उन्होंने हमें बताया। मैं उनकी बातों को बहुत ध्यान से सुनती रही। मैं समझ गई कि मेरे पति की स्थिति में पड़े लोगों को अब चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अब उनके साथ यूनियन है। इससे हम दोनों बहुत आश्वस्त हुए।

एक महीने में ही उनका हाथ पूरी तरह ठीक हो गया, उनका घाव भर गया। पट्टी खुलवाकर जिस दिन वे आए, उस रात उँगली विहीन हथेली ने मेरे शरीर का स्पर्श किया तो मेरे सारे शरीर में एक विचित्र सी झुरझुरी दौड़ गई। लेकिन मैंने जल्द ही स्वयं पर काबू पा लिया और बिना उँगलियों की उस हथेली को मैं प्रेम से चूमती रही।

यूनियन वालों की कोशिशों से उनको उसी मशीन पर रख लिया गया और उनकी मदद के लिए एक लड़के को भी दिया गया। मुआवज़े में दस हज़ार रुपये भी मिले। दुर्घटना के बाद उसी नौकरी में बहाली की वज़ह से मुआवज़ा कम मिला था, लेकिन यूनियन के नेताओं ने हमें उस रकम से संतुष्ट होने को कहा। चार महीनों में हमारा जीवन फिर से पहले जैसा ही चलने लगा।

उन्हीं दिनों मुझमें गर्भवती होने के लक्षण दिखाई दिए। डॉक्टरी जाँच से इसकी पुष्टि हो गई। डॉक्टर की सलाह पर मैं दवाएँ और टॉनिक लेने लगी। पति मेरी खूब देखभाल करने लगे। वे मेरी हर प्रिय वस्तु खरीदकर ला देते और समय पर दूध-फल लेने के लिए ज़िद करते।

मेरे हिसाब से तीन महीने बीते होंगे, एक शाम जब मैं अपने उलझे बालों को सुलझाते हुए बाहर बैठी थी तो अकस्मात गर्भाशय में शूल सा चुभा और मैं एक असहनीय विस्फोटक पीड़ा से कराह उठी। बहुत देर तक मुझे कुछ न सूझा। मैं उस पीड़ा को सहने की कोशिश कर रही थी लेकिन वह दर्द बढ़ता ही जा रहा था। मेरे भीतर एक उबाल सा उठ रहा था जो इस पीड़ा को और भी असह्य बना रहा था। भीषण दर्द से मेरे मुख से ज़ोर की चीख निकल पड़ी। मेरी उस चीख को सुनकर पड़ोसन आ पहुँची। उस पड़ोसन को मैंने क्या बताया, कैसे बताया, मुझे कुछ याद नहीं। मैं बेहोश हो चुकी थी। आँख खुली तो अपने को अस्पताल में पाया। मेरे पलंग के चारों ओर घर वाले मौजूद थे। माँ और पिताजी भी आ गए थे। उतने सारे लोगों को देखकर, स्वयं पर कोई अनहोनी के घटित होने की आशंका से भीतर ही भीतर मैं डर गई। मेरे दोनों हाथ बँधे हुए थे। एक हाथ से सेलाइन और दूसरे हाथ से खून चढ़ाया जा रहा था। पेट पर पट्टियाँ बँधी हुई थी। भीतर कहीं परतों के नीचे दर्द अभी भी शेष रह गया था। जब मैं पूरी तरह होश में आ गई तो माँ ने मुझे धीरे से बताया कि मेरे भीतर पलने वाला पिंड गर्भाशय से हटकर साथ के ट्यूब में बढ़ने लगा था, जो अचानक फट गया। उसके फटने से भीतर खून जमा हो गया था जिसे साफ़ करने के लिए छ: घंटों का ऑपरेशन करना पड़ा था। इस ऑपरेशन के कारण मैं अब गर्भ धारण नहीं कर सकती थी। मैं अब कभी माँ नहीं बन सकती थी। इस भयानक सत्य का उद्घाटन मेरी माँ ने ही किया।

"कुछ भी हो, कम से कम तुम्हारी जान बच गई" - कहकर माँ ने एक लंबी साँस ली। माँ की बातें मुझे कुछ विचित्र सी जान पड़ीं। एक पल के लिए मैं अपने अस्तित्व को पहचानने का प्रयत्न करने लगी। भीषण झंझावात से ध्वस्त इमारत की भांति मैं ढह गई। मधुसूदन को देखते ही मेरे भीतर का दुःख, भावनाओं के आवेग से उमड़ पड़ा। मैं ज़ोर से रो पड़ी।

"रोती क्यों हो? रोने से अपनी तकदीर नहीं बदलेगी" – बहुत रुखाई से उन्होंने कहा।

मैं तो समझी थी कि वे मुझे इस हाल में देखकर घबरा जाएँगे। मेरे सिर को अपनी गोद में लेकर सहलाएँगे, मेरे आँसू पोंछकर मुझे सांत्वना देंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि इसके विपरीत उनकी नज़रों में उपेक्षा और आक्रोश के भाव स्पष्ट झलकने लगे थे जिसे भाँपकर मैं घबरा गई। इसका कारण मैं नहीं जान पाई।

"तुम अब बच्चों को जन्म नहीं दे सकोगी इसीलिए तुम्हारी सास भी तुमसे नाराज़ है" – दूसरे दिन माँ ने मुझसे कहा तो मुझे पति की आँखों में व्याप्त आक्रोश का अर्थ समझा में आ गया।

"माँ, अब मैं क्या करूँ?" मैंने पूछा।

"तुम क्या कर सकती हो। तुम्हारे भाग में यही लिखा था। शायद संतान का जोग तुम्हें नहीं है। अब वे लोग जो भी करें हमें सहना तो पड़ेगा ही।" कहकर माँ दुःख से रो पड़ी।

भय से मेरी आँखें पथरा गई थीं। मेरे आँसू सूख गए थे। उस हालत में मुझे अपनी बेबसी पर खीझ होने लगी। मेरे दुःख का सहभागी कोई नहीं था। मुझसे संतान प्राप्ति नहीं हो सकती, इस सच्चाई ने दैत्याकार रूप धारण कर लिया था, जो सबकी चिंता का विषय बन गया। उनमें से किसी को मुझसे लेश मात्र भी सहानुभूति नहीं थी। मेरे माँ की भी चिंता उन अजन्मे शिशुओं के प्रति ही थी। मेरी मानसिकता टूटकर बिखर रही थी। मेरी इस दारुण मानसिक और शारीरिक यंत्रणा से किसी को सरोकार नहीं था।

अस्पताल की नर्स ने जब यह कहकर थोड़ी सी सहानुभूति जताई कि "कितनी बड़ी जानलेवा विपत्ति टल गई" - तो पास ही खड़ी मेरी सास ने तपाक से कहा – "ऐसा भी जीना किस काम का?" उनकी आँखों में नफ़रत के भाव स्पष्ट झलक रहे थे।

मुझे अपनी स्थिति पर दुःख तो हो रहा था लेकिन अपने दुःख से अधिक मधुसूदन के संबंध में मैं अधिक चिंतित थी। उन्हें मुझसे संतान की प्राप्ति नहीं होगी जिससे उनका वंश आगे नहीं बढ़ेगा। उनकी संपत्ति का कोई वारिस नहीं होगा। ज़ाहिर था कि मैं ही इन स्थितियों के लिए दोषी हूँ, सब यही सोचेंगे। इधर मेरा इलाज ज़ारी था परंतु सब कुछ यंत्रवत चल रहा था। मुझे मात्र एक अनुपयोगी वस्तु की भाँति ही देखा जा रहा था। घर की बेकार, पुरानी, सिलाई-मशीन की तरह मैं भी एक कोने में पड़ी थी, लोग मुझसे ऊब चुके थे। अस्पताल से मेरे घर आते ही माँ और पिताजी लौटकर चले गए। फिलहाल मुझे साथ ले जाने की इच्छा ज़ाहिर नहीं की उन्होंने। मुझे माँ-पिताजी के साथ नहीं जाते देख, मेरी सास के तेवर चढ़ गए। पति का व्यवहार भी बदला हुआ नज़र आने लगा। मेरे प्रति उनमें उपेक्षा के भाव स्पष्ट उभरने लगे थे। मैं सब कुछ सह सकती थी, किन्तु उनके द्वारा तिरस्कार नहीं सह सकती थी। मेरे मन में अनेक प्रश्न उठने लगे किन्तु उनमें से किसी का उत्तर मुझे नहीं मिला। वे कैसे यह सोच सकते हैं कि मैं बिलकुल व्यर्थ हूँ? क्या उन्होंने मुझसे केवल बच्चे पैदा करने के लिए ही विवाह किया था। जीवन में प्रेम और सहचर्य का क्या कोई स्थान नहीं? क्या हमारा जीवन पहले जैसा अनुरागमय नहीं हो सकता? क्या उन्हें मुझसे पहले जैसा लगाव नहीं रहा? क्या संसार में बिना संतान के स्त्रियाँ नहीं हैं? क्या उनका दांपत्य जीवन सुखी नहीं है? इन सब बातों पर जब मैं सोचती तो मुझे रुक्मिणी मौसी की याद आ जाती। चालीस वर्षों की आयु तक संतान प्राप्ति के सारे उपायों में विफल होकर, व्रत उपवास आदि प्रयत्नों से हारकर उन्होंने अपने भाई के बेटे को गोद ले लिया था।

"कुछ भी हो संतान बिना नारी जीवन सार्थक नहीं होता" – माँ अक्सर कहा करती। तो क्या विवाह का लक्ष्य केवल बच्चे पैदा करना ही है? नारी क्या इस संसार में केवल संतानोत्पत्ति के लिए ही जन्म लेती है? क्या नारी जीवन की सार्थकता पुरुषों के लिए बच्चे पैदा करने में ही है।"

"नारी क्या केवल एक एम्ब्रियो और दो ओवरीज़ मात्र ही है" – इस पर मैं जितना सोचती हूँ मुझे संसार की कोई स्त्री संतुष्ट नहीं दिखाई देती। दहेज़ देकर मैंने तो विवाह कर लिया। लेकिन मेरी कई सहेलियाँ दहेज़ न देने की स्थिति में अभी तक कुँवारी बैठी हैं, लोग उनके बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं। उनको इस स्थिति का सामना करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। दहेज़ से असंतुष्ट ससुराल के अत्याचारों से छुटकारा पाने के लिए मेरी सहेलियाँ, निर्मला और सरोज ने आत्महत्या का मार्ग चुन लिया। कमला को तो उसी के पति ने मार डाला। दोनों बार कन्याओं को जन्म देने के अपराध में मेरी पड़ोसन पारिवारिक हिंसा की शिकार हो गई।

आज तक मैं स्त्रियॉं के प्रति समाज के ऐसे शोषक व्यवहार से कैसे अनजान थी? समाज में चारों ओर नारी का करुण आर्तनाद व्याप्त है लेकिन बाहर यह दिखाई नहीं देता, क्योंकि नारी सहिष्णुता की साक्षात मूर्ति है।

मुझे स्वयं पर गुस्सा आने लगा। अपने अनुरागमय दांपत्य की कल्पना मुझे मूर्खतापूर्ण लगी। मेरी तरह ही अनेक मूर्ख कुलवधुएँ अपने स्वप्नलोक में खोई रहती हैं। हम स्त्रियाँ दुर्लभ प्रेम की मृग मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर रही हैं। मेरे मन में विचारों का तूफ़ान उठ रहा था।

आख़िर एक दिन मेरी सास ने अपने घिनौने इरादों से मुझ पर हमला कर ही दिया। उन्होंने कहा कि मेरे कारण उनके पुत्र का जीवन अशांत और अंधकारमय हो गया है। वह बेचारा सूखकर काँटा हुआ जा रहा है। चिंता उसे निगल रही है। जो कि सरासर ग़लत था। इधर वे मुझसे उखड़े-उखड़े से रहने लगे थे, यह सच था,किन्तु इसके अलावा उनका जीवन सामान्य गति से ही चल रहा था। फैक्ट्री में उनको पहले से कम काम दिया जा रहा था। उनके स्वास्थ्य में काफ़ी सुधार हो गया था। चिंता में तो मैं घुली जा रही थी। पास पड़ोस की औरतों को अपने संग बैठाकर मुझे सुनाने के लिए जब मेरी सास मेरे पति के प्रति चिंता व्यक्त करने लगी तो मुझे उनके इरादों का पता चला। उन्होंने एक दिन अपने मन की बात मेरे मुँह पर ही कह डाली।

माता अपने पुत्र का दूसरा ब्याह रचाना चाहती थी।

सुनकर मैं काँप उठी। तिरस्कृत और अपमानित होकर भी मैं किसी हाल अपने ही घर में दिन बिता रही थी। अब वे लोग मुझे मेरे ही घर से बाहर कर, उनके लिए दूसरी स्त्री लाना चाहते थे।

जब मैंने इस बारे में अपने पति से पूछा तो – "माँ पोतों को गोद में खिलाने के लिए बेचैन है, मैं क्या कर सकता हूँ" - कहा उन्होंने। उनकी मुख मुद्रा को देखकर मुझे पता चल गया कि अपनी माँ को भड़काने वाले वे ही थे।

"तो आपने क्या सोचा है?" – पूछा मैंने।

मुझे तलाक़ देकर दूसरा विवाह करने की अपनी योजना बहुत शांत भाव से उन्होंने बताई।

हमारी बातचीत बहुत औपचारिक तौर पर शुरू हुई थी लेकिन अंत उसका मेरे पति की धमकी से हुआ। उनके कहने का आशय यही था कि बिना किसी विरोध के मैं उन्हें तलाक़ दे दूँ, और यदि ऐसा नहीं हुआ तो मुझसे अपना पिंड छुड़ाने के कई उपाय उनके पास हैं। उनमें से एक दो का ज़िक्र उन्होंने किया तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। तत्काल मेरे माता-पिता को बुलवाया गया और मुझे उनके सुपुर्द कर दिया गया। वे चुपचाप हाथ बाँधे उनके सामने खड़े रहे। मेरी सास ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उसी क्षण मुझे घर छोड़कर निकल जाना होगा। वह घर अब मेरा नहीं। उनके लिए जो स्त्री बच्चे पैदा करेगी, यह घर उसी का होगा। विवाह के पवित्र मंत्रों का अर्थ केवल पति के वंश की वृद्धि ही है। स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी। मुझे उनके घर में उनके लिए बच्चे पैदा करके, पाल-पोसकर बड़ा करने की नौकरी दी गई थी। इस नौकरी को मैंने पचास हज़ार रुपयों की रिश्वत देकर खरीदा था। आज मैं उस कार्य के योग्य नहीं रह गई इस कारण मुझे इस नौकरी से बर्ख़ास्त किया जा रहा है। साथ ही किसी योग्य व्यक्ति को उसी काम पर रखा जाने वाला था। शायद विवाह का यही अर्थ है। लोग इस अर्थ को छिपाकर विवाह का अर्थ – प्रेम, अनुराग, दांपत्य आदि खोखले शब्दों में ढूँढने का प्रयास करते हैं। इसे खुलकर नौकरी पेशा कहने से शायद लोग इसलिए कतराते हैं कि नौकरी में अधिकारों की माँग होगी, बोनस का प्रावधान होता है। दांपत्य, पातिव्रत्य – जैसे शब्दों के प्रति तो स्त्रियाँ अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार हो जाती हैं और प्रतिदान की आकांक्षा के बिना ही अपने भाग्य को स्वीकार कर लेती हैं। पुरुष के प्रेम की पतली आँच भी स्त्री को पिघला कर रख देती है और वे पुरुष की आराधना करने लगती हैं। "लड़ाकू" कहलाने के भय से वे अपनी आवश्यकताओं को ज़ाहिर ही नहीं करतीं। स्त्री-पुरुष के इस संबंध को विवाह कहने में जब इतने लाभ हों तो फिर इसे नौकरी पेशा कौन मानेगा? मैं खुलकर इस शोषण का विरोध करना चाहती थी, किन्तु तब मैं अपने अकेलेपन से त्रस्त और भयभीत थी। मेरी इस संकट की घड़ी में मुझे आश्रय देने वाला मेरा अपना कोई नहीं था। मैं नितांत अकेली थी। मेरे साथ की स्त्रियॉं को भी मेरे दुःख का आभास नहीं हो रहा था। यह मुझे चौंका रहा था।

उस दिन मधुसूदन के दुर्घटनाग्रस्त होने पर यूनियन के कितने सारे लोग आ पहुँचे थे। उन सबने उन्हें कितना धीरज बँधाया था। मालिकों से इलाज का पैसा लाकर दिया था। सबने साथ होने का अहसास दिलाया था। सारे लोग एकजुट होकर उनकी नौकरी की बहाली के लिए लड़े थे। मुआवज़े की रक़म के लिए मालिकों के कई चक्कर लगाए थे। उन लोगों ने मुझे हिम्मत दी थी। मेरे पति की पीड़ा और दुःख को उनके सहयोगियों ने मिलकर बाँट लिया था। आज वे सब कहाँ गए? पति का वह हाथ, बेकार होकर भी कितनी रियायतें प्राप्त कर चुका था। उसे मित्रों का कितना प्यार दुलार मिला था। उस हाथ की दुर्घटना के साथ कितने संघर्ष और आंदोलन जुड़े थे। जब मैं अपने बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया में दुर्भाग्यवश दुर्घटना का शिकार हुई तो मुझे अपमानित कर पति के घर से निकाल दिया गया। मेरी दुर्घटना के दोषी शायद पति ही हैं। उनके कण के समागम से ही मेरे शरीर का वह अंग क्षतिग्रस्त हुआ था, परिणामस्वरूप मेरे शरीर का एक हिस्सा काटकर अलग कर दिया गया और मेरे माथे पर "बाँझ" शब्द अंकित कर दिया गया। यह कैसा न्याय है? मेरी भी दुर्घटना उत्पादन की प्रक्रिया में ही हुई थी। मैं किसी इलाज करने वाले व्यक्ति के उत्पादन कार्य में ही ज़ख़्मी हुई हूँ तो मुझे इस समाज से कोई रियायत नहीं मिली। मुझे किसी की करुणा या सहानुभूति नहीं मिली। मुझे किसी का सहयोग नहीं प्राप्त हुआ बल्कि मुझे ही कार्य से बर्ख़ास्त कर दिया गया। मेरी किसी ने थोड़ी भी मदद नहीं की। आख़िर यह असमानता क्यों? मेरे जीवन में एकाकीपन का षडयंत्र किसने रचा? नारी माता, पत्नी, पुत्री, सास, बहू आदि अनेकों वर्गों में बँट गई है। किसने इनको इतने वर्गों में बाँटा। दांपत्य और मातृत्व का लालच देकर स्त्रियों को क्यों छला जा रहा है? समाज में व्याप्त इस खुले शर्मनाक व्यापार का पर्दाफ़ाश करना होगा। नारी की खंडित मानसिकता का उपचार ढूँढना होगा। मुझ जैसी अभागन स्त्रियॉं का पता लगाना होगा। यही मेरे शेष जीवन का लक्ष्य है। मेरे जीवन की सार्थकता सुहाग में नहीं बल्कि शोषित नारियों को बल प्रदान करने में ही है।


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