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ISSN 2292-9754

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10.16.2014


भारतीय सिनेमा में 'समांतर' और 'नई लहर (न्यू वेव)' सिनेमा का स्वरूप

न्यू वेव (नई लहर) सिनेमा सामान्यत: जिसे आर्ट फिल्म या कला-सिनेमा या समांतर सिनेमा कहा जाता है, यह व्यावसायिक सिनेमा की मुख्य धारा का एक वैकल्पिक स्वरूप है जो कि भारतीय सिनेमा में एक विशेष आंदोलन बनकर उभरा। यह गंभीर यथार्थ और स्वाभाविक कथातत्व को सामयिक सामाजिक - राजनीतिक संदर्भों के साथ जोड़कर प्रस्तुत करती है। यह बॉलीवुड के व्यावसायिक सिनेमा के बरक्स एक विशेष आंदोलन के रूप में भारतीय सिनेमा में उसी समय प्रारम्भ हुआ जब फ्रेंच न्यू वेव और जापानी न्यू वेव सिनेमा ने अपनी पहचान बनाई। भारत में इस न्यू वेव अथवा समांतर सिनेमा आंदोलन की पहल सर्वप्रथम बंगाली सिनेमा में हुई। बंगाली सिनेमा ने भारतीय सिनेमा को सत्यजित रे, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के फ़िल्मकारों को दिया है। समांतर सिनेमा आन्दोलन बंगाली सिनेमा से प्रारम्भ हो कर आज समस्त भारतीय सिनेमा का प्रमुख अंग बन गया।

समांतर सिनेमा का उद्भव और विकास :

भारतीय सिनेमा में यथार्थवाद की प्रवृत्ति सन् 1920 और 30 के दशक से ही दिखाई देती है। सर्वप्रथम मराठी सिनेमा में यह प्रवृत्ति पहचानी गयी। निर्माता- निर्देशक वी शांताराम की 1925 में निर्मित अवाक् मराठी फिल्म सावकारी पाश (भारतीय शाइलॉक) उल्लेखनीय है, जिसमें एक गरीब किसान (शांताराम) कंजूस और लोभी साहूकार से कर्ज़ लेकर उत्पीड़ित होता है और परिणामस्वरूप गाँव छोड़कर शहर में मिल - मजदूरी करने को मजबूर हो जाता है। शांताराम की दुनिया न माने (1938) में भारतीय समाज में स्त्री की दुर्दशा और शोषण के यथार्थ को मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करता है।

भारत में चालीस से साठ के दशक के मध्य समांतर सिनेमा आंदोलन ने सिनेमा की मुख्य धारा को प्रभावित किया और दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। इस आंदोलन के पुरोधाओं में सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, विमल रॉय, मृणाल सेन, ख्वाजा अहमद अब्बास, चेतन आनंद, गुरुदत्त और वी शांताराम थे। यह काल भारतीय सिनेमा के स्वर्ण काल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस सिनेमा ने मूलत: भारतीय साहित्य से कथानाकों को चुना, इसीलिए इस दौर के फिल्मों में फ़िल्मकारों ने अपने समय के समाज का अध्ययन प्रस्तुत किया है। ये फिल्में अपने यथार्थपूर्ण चित्रण के लिए आज भी समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के लिए भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अध्ययन का महत्वपूर्ण साधन है।

समांतर सिनेमा का उद्देश्य व्यक्ति और समाज के अंतरसंबंध को हूबहू प्रस्तुत करना है। बिना किसी कृत्रिमता और बनावटीपन के मानवीय संवेदनाओं को वैयक्तिक तथा सामाजिक स्तर पर आडंबरहीन पृष्ठभूमि में बेबाकी के साथ प्रस्तुत करना है। इन फिल्मों का फिल्मांकन बहुत ही साधारण किन्तु सहज और स्वाभाविक सामाजिक वातावरण का निर्माण करके किया जाता है। सामान्यत: ये फिल्में बहुत कम बजट की होती हैं और इनके कलाकार भी चमक-दमक वाले फिल्मी सितारे न होकर (अधिकांश कलाकार) या तो फिल्म इंस्टीट्यूट के प्रशिक्षु कलाकार होते हैं या फिर नवोदित कलाकार या रंगमंच के कलाकार होते हैं।

इन फिल्मों की कथावस्तु सीधे लोगों के जीवन से जुड़ी स्थितियों और सत्य घटनाओं पर आधारित होती हैं। समांतर सिनेमा मानव जीवन के समांतर चलता है और मानव जीवन की वास्तविक स्थितियों को बेबाकी से प्रस्तुत करता है। इन फिल्मों के निर्माण का लक्ष्य व्यावसायिकता नहीं होती बल्कि विशिष्ट और यथार्थवादी फिल्मों का प्रदर्शन होता है। इसका लक्ष्य केवल मनोरंजन नहीं होता।

समांतर सिनेमा का उद्देश्य -

1 सिनेमा के परिष्कृत स्वरूप को कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करना
2 सिनेमा को व्यक्ति और समाज के निकट (समांतर) स्थापित करना
3 फिल्म निर्माण की एक नई संस्कृति को निर्मित करना
4 सामाजिक चेतना जागृत करना
5 सिनेमा की नई तकनीक विकसित करना
6 समाज की यथार्थ और अतियथार्थ स्थितियों का चित्रण स्वाभाविक रूप में करना
7 व्यक्ति और समाज को आडंबरहीन परिदृश्य में प्रस्तुत करना
8 स्वाभाविक और वास्तविक भौगोलिक परिदृश्य में फिल्मांकन करना
9 उपेक्षित और विस्मृत सामाजिक मुद्दों को प्रस्तुत करना
10 स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता और अनसुलझी समस्याओं के प्रति समाज का ध्यान दिलाना
11 आकर्षणविहीन शैली (ग्लैमर विहीन) में फिल्मांकन एवं प्रस्तुति
12 अनाकर्षक किन्तु प्रतिभावान अभिनेताओं तथा कलाकारों की प्रस्तुति
13 सशक्त अभिनय, साधारण पृष्ठभूमि
14 कथावस्तु की प्रधानता - सशक्त पटकथा और उसके और उसके संवाद

समांतर फिल्मों के विषय मुख्यत: सामाजिक समस्याएँ, कुरीतियाँ, नारी शोषण, दांपत्य संबंधों की विसंगतियाँ, स्त्री-पुरुष संबंध, किसान जीवन की समस्याएँ, कन्या भ्रूण हत्या, पारिवारिक मूल्यों का संकट, विभाजन से उत्पन्न समस्याएँ, सांप्रदायिकता, धार्मिक अंधविश्वास, महापुरुषों की जीवनियाँ, स्वतन्त्रता संग्राम की कहानियाँ, कश्मीर की समस्या, अलगाववादी आंदोलन, भ्रष्टाचार की समस्या, राष्ट्रीय चेतना, लोकसंस्कृति, नक्सल समस्या, आतंकवादी घटनाएँ रहे हैं। समांतर फिल्म विधा गंभीर और चिंतनपरक होती है जो दर्शकों को सीधे कथ्य से जोड़ती है। सादगी, साधारणता, बेबाकी और अनाकर्षक पृष्ठभूमि को कथानुकूल संवादों के साथ एक अलग ढंग का प्रभाव पैदा करती है। फिल्म का केंद्रीय भाव सांकेतिक पद्धति से प्रस्तुत किया जाता है जिससे ये दर्शकों की चेतना को झकझोरने में सफल होती हैं। इन फिल्मों का दर्शक वर्ग, सामान्य व्यावसायिक सिनेमा के दर्शक वर्ग से भिन्न और विशिष्ट होता है। समांतर सिनेमा को कला फिल्म (आर्ट फिल्म) और ऑफ बीट फिल्म भी कहा जाता है। समांतर फिल्मों की निर्माण लागत मुख्यधारा की व्यावसायिक फिल्मों से बहुत कम होती है।

इस आंदोलन के प्रारम्भ से ऐसे चिंताशील फ़िल्मकार जुड़े जिन्होंने सिनेमा माध्यम को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर उसे उद्देश्यपूर्ण बनाया और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। इस भारतीय सिनेमा में एक नई फिल्मी विधा का जन्म हुआ जिसने फिल्म जगत में अपनी सार्थक उपस्थिती दर्ज की। इस दिशा में हिंदी में पहला प्रयास 'चेतनानन्द' ने 'नीचा नगर' (1946) फिल्म के द्वारा किया। यह एक सामाजिक यथार्थवादी फिल्म है जिसे प्रथम कॉन (फ्रांस) फिल्मोत्सव में 'ग्रेंड प्राइज़' से पुरस्कृत किया गया। ऐसे फिल्मों की सार्थकता को आँकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर विभिन्न विकसित देशों में फिल्मोत्सवों का आयोजन होता है। फ्रांस का अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह 'कॉन फिल्म फेस्टिवल' के नाम से विख्यात है जिसमें किसी भी फिल्म की प्रस्तुति सम्मानजनक मानी जाती है। 50 और 60 के दशकों में भारतीय फिल्में अक्सर कॉन फिल्म महोत्सव में 'पाम डि ऑर्डर' जैसे बड़े पुरस्कारों की स्पर्धा में नियमित रूप से प्रवेश पाती रहीं हैं। 1950-60 के दशकों में भारत के गंभीर चिंतनशील फ़िल्मकार और कथा लेखक मुख्यधारा की मनोरंजन-प्रधान गीतों से भरी अस्वाभाविक फिल्मों से ऊबकर इस एकरसता को तोड़ने के लिए स्वाभाविक पृष्ठभूमि में जीवन की वास्तविक स्थितियों को सादगी के साथ दर्शाने के लिए ही समांतर फिल्मी विधा का सृजन किया। इन फिल्मों के निर्माण में केंद्र और राज्य सरकारों की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। इस धारा के प्रथम नव-यथार्थवादी फ़िल्मकार बांग्ला के 'सत्यजित रे' हुए। इसी परंपरा में श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, अदूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन, तथा गिरीश कासरवल्ली आते हैं। सत्यजित रे ने समांतर फिल्मों की नई परंपरा प्रारम्भ की। उनकी बहुचर्चित पाथेर पांचाली (1955), अपराजितो (1956) और अपूर संसार (1959- तीन फिल्मों की शृंखला) फिल्में ऐसी ही प्रयोगात्मक फिल्में हैं जिसने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जगत को आकर्षित किया। सत्यजीत रे अपनी फिल्मों का निर्माण बहुत कम लागत से करते थे। उनकी तीनों फिल्में बर्लिन और वेनिस के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में विशेष रूप से पुरस्कृत हुईं और आज भी भारत की महत्वपूर्ण फिल्मों की सूची में शीर्ष पर स्थापित हैं।

साधारणत: बॉलीवुड या बंबइया हिंदी फिल्में जो कि भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा - फिल्में मानी जाती हैं, इनका प्रधान लक्ष्य मनोरंजन व धनार्जन होता है। ये फिल्में स्वभाव से बहुत ही अस्वाभाविक और कल्पनात्मक तत्वों से भरी होती हैं तथा जीवन की सच्चाईयों से परे होती हैं। इनमें कल्पना का समावेश अविश्वासनीय स्तर पर होता है। इस तरह ये फिल्में भारी लागत से बनी सस्ते मनोरंजन का साधन बनती हैं।

भारतीय सिनेमा में कुछ विरले उदाहरण ऐसे भी हैं जिसमें सार्थक कला-फिल्में मुख्यधारा की लोकप्रिय और सफल फिल्म के रूप में विख्यात हुईं। विमलराय की दो बीघा ज़मीन (1953) किसान जीवन की त्रासदी पर आधारित ऐसी ही एक सार्थक फिल्म है। यह पूँजीपति जमींदारों के द्वारा किसानों की जमीन हड़पकर उन्हें जमीन से बेदखल करके, उनकी जमीन पर कल-कारखाने लगाने की कहानी है।

यह किसान जमींदार का कर्ज चुकाने के लिए गाँव छोड़कर शहर जाकर मजदूरी करने के लिए मजबूर हो जाता है। कलकत्ते की तपती सड़कों पर हाथगाड़ी (रिक्शा) चलाता है। चंद पैसों को जमा करने के लिए अपना सब कुछ गंवा देता है। अंत में जब वह गाँव लौटता है तो अपनी जमीन पर कारख़ाना बनते देखकर चुपचाप अपनी गठरी उठाकर पत्नी और बच्चों के साथ अज्ञात दिशा में गुम हो जाता है। इस फिल्म ने सारे देश को सामंती और पूंजीवादी शोषण के खिलाफ चेतना जगाई। भारतीय किसान जीवन की बेबसी और देश की कमजोर अर्थ व्यवस्था को उजागर करने वाली यह सामाजिक यथार्थ पर आधारित फिल्म आज भी प्रासंगिक है। इस फिल्म को सन् 1954 के 'कान' (फ्रांस) अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में पुरस्कृत किया गया। इस तरह इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में समांतर सिनेमा अथवा 'नई लहर' (न्यू वेव सिनेमा) की फिल्मों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
हिंदी सिनेमा प्रमुख फ़िल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी को फिल्मों में मध्यवर्गीय जीवन का एक कुशल चितेरा माना गया है। इनकी फिल्मों में भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की समस्याएँ और संवेदनाएँ मुख्य रूप से प्रतिबिम्बित होती हैं। 'बासु चटर्जी' भी अपने फिल्मों में मध्यवर्गीय जीवन को ही प्रधानता देते हैं। इनकी उल्लेखनीय फिल्में पिया का घर, रजनीगंधा, एक रुका हुआ फैसला आदि हैं।

समांतर सिनेमा के प्रमुख तत्व -

1 यथार्थवादी कथावस्तु
2 देश, काल और परिस्थितियों को यथावत प्रस्तुत करने की कला
3 निराडंबरपूर्ण प्रस्तुति - ग्लैमरहीन प्रस्तुति
4 ज़मीन से जुड़ी हुई कहानी अथवा प्रसंग
5 सामाजिक चेतना को जागृत करने वाले संदर्भ
6 जीवन को यथावत प्रस्तुत करने की कला
7 सरल-सीधे संवाद।
8 चुस्त, कसी हुई पटकथा
9 विशेष प्रकार का सादा छायांकन (सिनेमाटोग्राफी)
10 कलाकारों की मुद्राओं और भाव-भंगिमाओं के प्रभावशाली अंकन के लिए कैमरे के विशेष कोणों का प्रयोग।
11 स्वाभाविकता लाने के लिए सिनेमाटोग्राफी (अधिकतर श्वेत-श्याम) का विशिष्ट प्रयोग
12 स्वाभाविक परिवेश (भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक)
13 नॉन ग्लैमरस - कलाकारों का सादगी भरा अभिनय

हिंदी में लीक से हटकर सामाजिक समस्याओं पर यथार्थवादी फिल्में बनाने वाले फ़िल्मकार हैं - 'गुरुदत्त' जिनकी फिल्में व्यवसायिक और समांतर प्रकृतियों का अद्भुत सम्मिश्रण होती हैं। इनकी फिल्म प्यासा (1957) को अमेरिका की 'टाइम' पत्रिका ने विश्व की सार्वकालिक सौ (All - time 100) सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शामिल किया। गुरुदत्त एक ऐसे फ़िल्मकार हैं जिन्होंने अपनी फिल्मों को मानवीय संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति का यथार्थपूर्ण माध्यम बनाया। उनकी फिल्में मुख्य धारा के साथ-साथ कला फिल्मों की श्रेणी में भी शामिल होती हैं। गुरुदत्त की अधिकतर फिल्में उनकी आत्माभिव्यक्ति को व्यंजित करती हैं।

सन् 1960 में भारत सरकार ने भारतीय जीवन पर आधारित स्वतंत्र कला फिल्मों के निर्माण के लिए वित्तीय अनुदान देने की योजना शुरू की। उस समय के अधिकांश फिल्म निर्देशक भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान पूना के स्नातक (ग्रेजुएट) थे। सुप्रसिद्ध बंगाली फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक संस्थान में प्रोफेसर थे। संयोगवश सत्यजित रे की भांति उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नहीं हो पाई।

विकास :

1970 और 80 के दशक में हिंदी सिनेमा के क्षेत्र में समांतर सिनेमा मुखर होकर प्रकाश में आया और इसने व्यापक धरातल पर अपनी विशेष पहचान बनाई। सिनेमा के इस स्वरूप को समृद्ध और सशक्त बनाने वाले निर्देशकों में गुलज़ार, श्याम बेनेगल, मनी कौल, राजेन्द्र सिंह बेदी, कांतिलाल राठोड़ और सईद अख्तर मिर्ज़ा प्रमुख हैं। आगे चलकर इसी शृंखला में महेश भट्ट और गोविंद निहलानी इस धारा के प्रमुख निर्देशक बने। श्याम बेनेगल ने 'अंकुर ' (1974) के निर्देशन से फिल्म जगत में प्रवेश किया। इस फिल्म ने जबरदस्त आलोचनापरक सफलता हासिल की। इस फिल्म ने समांतर फिल्मों की एक सुदीर्घ और लोकप्रिय परंपरा को विकसित किया, इसके बाद श्याम बेनगल ने निशांत, भूमिका, मृगया, भुवन शोम, मंडी, जुनून, बाज़ार जैसी अनेकों फिल्में पूरी बनाई जिसने समांतर फिल्मों के प्रति दर्शकों को आकर्षित किया। इन फ़िल्मकारों ने यथार्थवाद की प्रस्तुति के लिए विभिन्न शैलियों को अपनाया और कुछ ने तो लोकप्रिय फिल्मों की परंपराओं को भी स्वीकार किया। इस दौर की समांतर सिनेमा ने नए युवा कलाकारों कि पूरी नयी पीढ़ी को फिल्मों में स्थापित होने का अवसर प्रदान किया, जिनमें शबाना आज़मी, स्मिता पटेल, अमोल पालेकर, ओमपुरी, कुलभूषण खरबन्दा, पंकज कपूर, दीप्ति नवल, फारूख शेख आदि आज अत्यंत सफल कलाकार हैं।

'अदूर गोपालकृष्णन' ने समांतर सिनेमा की विधा को मलयालम सिनेमा में फिल्म स्वयंवरम (1972) से विस्तरित किया। हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के बीत जाने के बाद बहुत बाद में 1980 और 1990 के दशकों में मलयालम सिनेमा में स्वर्ण युग का अनुभव किया गया। उस काल के मशहूर भारतीय सिनेमा निर्माता निर्देशक मलयालम फिल्म जगत से ही आए, जैसे अदूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन, जॉन अब्राहेम, पद्मराजन, भारतन, टी वी चंद्रन और शाजी एन करुण आदि। फिल्म जगत में गोपालकृष्णन को सत्यजित रे का पवित्र उत्तराधिकारी समझा जाता है, इन्होंने इस दौर में अपने सर्वश्रेष्ठ फिल्म्प्न का निर्देशन और निर्माण किया जिनमें एलिप्पाथयम (1981) जिसे लंदन फिल्म समारोह में सदरलैंड ट्रॉफी प्रदान की गई, माथिलुकल (1989) जिसे वेनिस फिल्म समारोह में पुरस्कृत किया गया। मलयालम फ़िल्मकारों के द्वारा निर्मित अन्य महत्वपूर्ण फिल्में हैं - शाजी एन करुण की पहली फिल्म पीरवी (1989) ('कान' फिल्म समारोह में पुरस्कृत), उनकी दूसरी फिल्म स्वाहम (1994) (कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित) और उन्हीं की तीसरी फिल्म वाणाप्रस्थम (1999) भी कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित की गयी। इस तरह शाजी एन करुण पहले भारतीय निर्देशक हुए जिनकी तीन फिल्में लगातार तीन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों (कान फिल्म समारोह फ्रांस) में प्रदर्शन के लिए चुनी गई।

कन्नड भाषा में समांतर सिनेमा के संवर्धक गिरीश कार्नाड और बी वी कारन्त, आसमिया में डॉ भाबेंद्रनाथ साइकिया, और जाहनू बरुआ, तमिल में के बालचंदर, पी भारतीराजा और मणिरत्नम और मणिपुरी में अरीबाम श्याम शर्मा हैं।

1990 के दशक तक आते आते फिल्म निर्माण की लागत में भारी वृद्धि होने लगी और फिल्मों का व्यापारिक पक्ष प्रबल होने लगा, जिससे ऐसी कला फ़िल्मों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना शुरू हुआ। कला फिल्मों से निर्माण की लागत के वसूल न होने की स्थिति स्पष्ट दिखाई देने लगी, जिससे फ़िल्मकार चिंतित होने लगे। समांतर सिनेमा के लिए मुख्य धारा सिनेमा में अपराध जगत की पूंजी का निवेश, राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता, टी वी के बढ़ते हस्तक्षेप तथा फिल्मों की पाइरेसी जैसे संकट, बाधा बनने लगे, और धीरे-धीरे ह्रासोन्मुख होने लगे।

ह्रास के अन्य कारण -

भारत में समांतर सिनेमा या न्यू वेव सिनेमा के खत्म होने का एक सबसे कारण यह है कि राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम ने समांतर सिनेमा के फिल्मों के वितरण और प्रदर्शन की सुविधाओं की ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। मुख्य धारा के सिनेमा के प्रदर्शक इन फ़िल्मों का प्रदर्शन करने के लिए आगे नहीं आते क्योंकि इन फिल्मों मेन तथाकथित मनोरंजन के तत्व मौजूद नहीं होते और ये महज गंभीर वैचारिक फिल्में होती हैं। इन फिल्मों के प्रदर्शन के लिए छोटे-छोटे सिनेमा घरों के निर्माण की चर्चा चली थी लेकिन इस वैकल्पिक सुविधा को साकार करने के गंभीर प्रयास नहीं हुए। इस तरह इन फिल्मों को कुछ सिनेमा क्लब या ऐसे ही छोटे-छोटे संगठन प्रदर्शित करते हैं। टी वी के उदय ने इस समांतर फिल्म आंदोलन को प्रभावित किया है जिससे इसकी लोक प्रियता में गिरावट आई है। लोग अब ऐसे फिल्मों कि हँसी उड़ाने लगे हैं। धीरे-धीरे सरकार इन फिल्मों की संबद्धता से स्वयं को अलग कर रही है।

पुनरागमन -

इधर समांतर सिनेमा शब्द को मुंबई (बॉलीवुड) की 'लीक से हटकर' बनाई जा रही फिल्मों
(गैरपारंपरिक) के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है, जिससे कला फिल्में नए रूप में फिर से उभरने लगी हैं। इस उदय ने मुंबइया फिल्म नाम से एक नए फिल्म-वर्ग जिसमे मुंबई महानगर की शहरी सामाजिक समस्याएँ चित्रित की जा रही हैं। ऐसी समांतर फिल्मों के नमूनों पर बनी फिल्मों में मणि रत्नम की दिल से (1998), युवा (2004), नागेश कुकुनूर की तीन दीवारें (2003), और डोर (2006), सुधीर मिश्रा कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2005), जाहनू बरुआ की मैंने गांधी को नहीं मारा (2005), नंदिता दास की फिराक (2008), अनुराग कश्यप की देव डी (2009), पीयूष झा की सिकंदर (2009) और विक्रमादित्य मोटवाने की उड़ान (2009) हैं।

इन सबसे अलग बोलचाल की अंग्रेजी में भी कभी कभी फिल्में बनाई जाती रहीं हैं। उदाहरण के लिए रेवती की मित्र, माय फ्रेंड (2002), अपर्णा सेन की मी एंड मिसेज अय्यर (2002) और 15 पार्क एवन्यू (2006), अनंत बालानी की जोगर्स पार्क (2003), पीयूष झा की किंग ऑफ बॉलीवुड (2004), होमी अदजानिया की बीइंग साइरस (2006), ऋतुपर्णों घोष की था लास्ट लियर (2007), सूनी तारपोरवाला की लिटल जिजौ (2009) और संदीप मोहन की लव रिंकल फ्री (2012) आदि।

दूसरे भारतीय कला फिल्मों के निर्देशक जो आज सक्रिय हैं उनमें मृणाल सेन, बुद्धदेब दासगुप्ता, अपर्णा सेन, गौतम घोष, संदीप रे (सत्यजित रे के सुपुत्र) और ऋतुपर्णों घोष बंगाली में, अदूर गोपालकृष्णन, शाजी एन करूँ, टी वीए चंद्रन और डॉ बीजू मलयालम में, कुमार शाहनी, केतन मेहता, गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल और दीपा मेहता हिंदी में, मणि रत्नम तमिल और हिंदी में, जाहनू बरुआ हिंदी और आसामिया में, अमोल पालेकर हिंदी और मराठी में तथा बाला चंदर तमिल में प्रमुख हैं।

मुख्य धारा से इतर सिनेमा -

चूंकि समांतर सिनेमा हमेशा मुख्य धारा सिनेमा के हाशिये पर रहा और चूंकि इस विधा ने सदैव मुख्य धारा सिनेमा के पतनशील सामाजिक दृष्टि जो की इसकी मूल प्रवृत्ति बनाकर उभरी है, को नकारा और अस्वीकार किया इसलिए समांतर सिनेमा, मुख्य धारा सिनेमा को निर्माण और वितरण और प्रदर्शन की व्यवस्था के धरातल पर स्वीकार नहीं कर पाया। इसलिए कुछ बहुत प्रभावशाली लीक से अलग की समांतर फिल्में जो बासु भट्टाचार्य, मणि कौल, एम एस सत्यु, कुमार शाहनी, कमाल स्वरूप, सईद अख्तर मिर्ज़ा, जाहनू बरुआ, के हरिहरन, गिरीश कासरवल्ली, अदूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन,जॉन अब्राहाम, अवतार कौल, अशोक आहूजा, सुशील मिश्रा, हिमांशु खतुआ, मुरली नायर, अमिताभ चक्रवर्ती, परेश कामदार, निरंजन थाड़े, प्रिया कृष्णस्वामी, गुरविंदर सिंह, और बेला नागी जैसे सार्थक फिल्मकारों के फिल्मों को पहचान नहीं मिल पाई।

वैश्विक संवाद

1940 और 1950 में भारतीय समांतर सिनेमा के प्रारम्भिक दिनों में यह समांतर सिनेमा का आंदोलन इतालवी सिनेमा और फ्रेंच सिनेमा से प्रभावित हुआ खासकर इतालवी नव-यथार्थवाद और फ्रेंच काव्यात्मक यथार्थवाद से। सत्यजित रे ने विशेष रूप से इतालवी फ़िल्मकार विट्टोरियो डेसिका की 'बाइसिकल थीव्स' (1948) और फ्रेंच फ़िल्मकार जीन रेनोआयर की 'द रिवर' (1951) के प्रभाव के साथ-साथ कलात्मक भारतीय रंगमंच तथा बंगाली साहित्य के प्रभाव को अपनी पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' (1955) पर स्वीकार किया है। विमल राय की फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' (1953) पर भी विट्टोरियो डेसिका के बाइसिकल थीव्स का प्रभाव स्पष्ट है। भारतीय न्यू वेव सिनेमा (नई लहर का सिनेमा) भी फ्रेंच न्यू वेव और जापानी न्यू वेव सिनेमा के संग संग ही शुरू हुआ।

जब से चेतनानन्द की 'नीचा नगर' फिल्म ने 1946 के प्रथम 'कान' फिल्म समारोह में 'ग्रैंड प्राइज़' (विशेष पुरस्कार) जीता तभी से अगले कई दशकों तक भारतीय समांतर सिनेमा की फिल्में अकसर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहीं। इस परिदृश्य ने स्वातंत्र्योत्तर भारतीय फ़िल्मकारों को विश्व स्तर पर दर्शकों तक पहुँचने की राह आसान बनाई। इनामे सबसे अधिक प्रभाववान सत्यजीत राय थे, जिनकी फिल्में यूरोप, अमेरिका और एशियाई दर्शकों में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त करने में सफल हुईं। इसके बाद सत्यजीत राय की फिल्मों ने विश्व स्तर पर अपना दिखाया और मार्टिन स्कोरसेस, जेम्स आइवरी, अब्बास कियारोस्तमी, एलिया कजान, फ्रेङ्कोयी ट्रूफ़ाल्ट, कार्लोस सौरा, इसाओ टकाहाटा, वेस एंडरसन आदि को प्रभावित किया। अकीरा कुरोसावा ने सत्यजीत रे की कार्य की सराहना की। सत्यजित रे की 1967 की एक पटकथा जो 'द एलिएन' के लिए लिखी गयी थी और जो किन्हीं कारणों से खारिज कर दी गयी, ऐसा कहा जाता है कि स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म 'ई टी' (1982) इसी से प्रेरित है। सत्यजित राय की फिल्मों के आंशिक दृश्यों का प्रयोग पश्चिम के कई फ़िल्मकारों ने अपनी फिल्मों में किया है। आपूर संसार (1959) के कई दृश्य विभिन्न पश्चिमी फिल्मों में दिखाई देते हैं। दीपा साही ने अपनी तीनों फिल्मों में (फायर, वाटर और अर्थ) 'राय' की शैली को ग्रहण किया है।

मृणाल सेन फिल्मों में मार्क्सवादी विचारों की प्रस्तुति के लिए पहचाने जाते हैं। उनके फिल्मी जीवन में उनकी फिल्मों को लगभग सभी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया गया, जैसे कान, बर्लिन, वेनिस, मास्को, कार्लोवी वारी, मोंट्रियाल, शिकागो और कैरो आदि।

ऋत्विक घटक बंगाली के स्वतंत्र फ़िल्मकार हैं जिनकी फिल्में उनकी मृत्यु के बाद (1990) अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों में लोकप्रिय हुईं। सत्यजी राय की फिल्मों के साथ ही ऋत्विक घटक की फिल्में भी सार्वकालिक महान फिल्मों की सूची में शामिल हो गईं।


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