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ISSN 2292-9754

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10.09.2016


अपराजेय कथाशिल्पी शरतचंद्र और देवदास
(देवदास के प्रकाशन के सौ वर्ष के संदर्भ में)

बंकिमचन्द्र, रवीन्द्रनाथ और शरतचंद्र, भारतीय साहित्य के तीन अनमोल धरोहर हैं। ये तीनों ही भारतीय साहित्य एवं संस्कृति के ऋषि तुल्य मनीषी हैं। भारतीय चिंतन को मध्ययुगीन रूढ़िग्रस्त परंपराओं से मुक्त कर आधुनिकता बोध की नवीन सरणियों से सिंचित करने वाले महापुरुष हैं। बंगाल के नवजागरण के वैतालिक थे, राममोहन राय। मध्याह्न के चारण हुए बंकिमचंद्र (1838-1894) और उसकी परिणति हुई रवीन्द्रनाथ के साहित्य में। शरतचंद्र इसी रवीन्द्र युग के उज्ज्वल नक्षत्र थे। बंकिम मातृभूमि और भारती देवी के उपासक हैं, रवीन्द्र में अतींद्रिय अनुभूति है, पर शरत ने इस धरती की धूल को ही महिमामय किया। इस देश में ऐसे बहुत कम साहित्यकार हुए हैं जिनका वरण केवल समकालीन साहित्य चिंतकों ने ही नहीं, बल्कि राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों, विधि-विशेषज्ञों और धर्म तत्व के ज्ञाताओं ने सहज भाव से किया। वास्तव में बंकिमचंद्र नवयुग के प्रेरक थे किन्तु वे मूलत: आदर्शवादी मूल्यों और महत्तर संस्कारों के पक्षधर थे। परंपरा को वे पुनीत मानते थे पाप से उन्हें घृणा थी। शरत पाप का प्रचार नहीं करते, परंपरा से भी उन्हें घृणा नहीं है, पर वे मनुष्य को देवता के नाते नहीं, मनुष्यता के नाते ही प्यार करते हैं। उनकी दृष्टि में कोई शास्त्र, श्लोक, मंत्र-तंत्र मनुष्य से बड़ा नहीं है। उन के पात्र विशिष्टता रखते हुए भी इसी धरती की मिट्टी से निर्मित हाड़-मांस के पुतले हैं। शरत साहित्य में भीषण भावुकता के बावजूद विपरीत चित्तवृत्तियों का आंतरिक संघर्ष मौजूद है।

रवीन्द्रनाथ (1861-1841) ने जिस नवयुग का सूत्रपात किया शरतचंद्र (1876-1938) ने उसमें माटी की गंध बसाकर उसे जन-जन में प्रसारित किया। रवीन्द्रनाथ मानवीय घटनाओं को विश्व-प्रकृति के साथ जोड़कर देखते थे। उनका अंतर्द्वंद्व निर्वेयक्तिक है। उनके शास्त्र विचारों के मानवीय संस्करण हैं। उनका लक्ष्य है – देशातीत-कालातीत मानव। उन्होंने जीवन के वास्तविक सुख-दुःख को अस्वीकार नहीं किया, पर दुखातीत महाजीवन की वाणी ही उनकी रचनाओं में प्रकट हुई। रवीन्द्रनाथ ने जो कुछ किया शरत ने उसे आगे बढ़ाया। कविगुरु रवीन्द्र जहाँ केवल उस समय के सामाजिक नियमों से वर्जित बहुत से विषयों को, जैसे विधवा (चोखेर बालि) में प्रेम-लिप्सा को, स्वाभाविक बताकर रह गए वहाँ शरत ने उसे आगे बढ़ाकर समाज के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। जिस प्रतिभा के बल पर उन्होंने रवीन्द्र युग में, बरगद के वृक्ष तले, न केवल अपना स्थान बनाया बल्कि समूचे देश को अपनी ओर आकर्षित भी किया। उनके साहित्य का क्षेत्र रवीन्द्रनाथ की तुलना में सीमित अवश्य है पर अपूर्व है। वे प्रेम के चित्रण में अद्भुत सृजनात्मक शक्ति का परिचय देते हैं। उन पर चरित्रहीनता का आरोप लगाया गया, पर उस चित्रण में अश्लीलता खोजे भी नहीं मिलती। मिलता है अद्भुत संयम। यही संयम शरत की विशेषता है, जो अपने आप में अद्वितीय है। इलाचन्द्र जोशी के शब्दों में, "उनमें न तो रवीन्द्रनाथ की बौद्धिक ऊँचाई और व्यापकता है और न अतलस्पर्शी रहस्यानुभूति की वह निगूढ़ता और निविड़ता। पर उनमें एक बड़ी विशेषता है, जो दूसरों को सहज में प्राप्त नहीं हो सकती। जीवन को सरल, सुस्पष्ट और सुलझी हुई दृष्टि से देखकर, उसकी यथार्थता के भीतर सहज ही डुबकियाँ लगाकर, बिना किसी जटिल बौद्धिक प्रयास के उसके सच्चे स्वरूप को हृदयंगम कर लेना और उस सच्चे रूप का चित्रण बिना किसी कृत्रिम काव्यात्मक कौशल के, केवल अपनी सहज अंतरानुभूति की सहायता से करके, उसके भीतर छिपी मार्मिकता को प्रस्फुटित कर देना। यह इतनी बड़ी देन उन्हें प्राप्त है जो अक्सर बड़े-बड़े लेखकों को भी सुलभ नहीं होती।"1

भारतीय साहित्य में बंकिम, रवीन्द्र और शरत अपने अपने स्थान पर अप्रतिम और अनिवार्य हैं। परंपरा की कड़ियों की तरह एक दूसरे से जुड़े हैं और प्रत्येक आगे आने वाले की तरह शरतचंद्र अपने दोनों महान पूर्ववर्तियों के ऋणी हैं। रवीन्द्रनाथ के तो वे परम शिष्य हैं। रवीन्द्र न होते तो शरत भी न होते। अपराजेय कथाशिल्पी शरत जीवन के अंतिम क्षण तक उन्हें गुरु ही मानते रहे।

जिस समय शरत का जन्म हुआ था (15 सितंबर 1876) वह चहुँमुखी जागृति और आंदोलनों का काल था। सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम की असफलता और सरकार के तीव्र दमन के कारण कुछ समय तक शिथिलता अवश्य दिखाई दी थी, परंतु वह तूफ़ान से पूर्व की शांति जैसी थी। शीघ्र ही क्रान्ति का स्वर फिर से फूटने लगा। साहित्य में इस स्वर की सबसे पहले अभिव्यक्ति हुई बंकिमचंद्र के "आनंदमठ" में। इसी उपन्यास ने आधुनिक बंगाल को जन्म दिया जो कालांतर में सारे देश की प्रेरणा बन गया। लेकिन इस असफलता का परिणाम यह भी हुआ की लोगों का ध्यान राजनीतिक उथल-पुथल से हटकर सामाजिक क्रान्ति की ओर उन्मुख हुआ। सामाजिक क्रान्ति के बिना राजनैतिक क्रान्ति सफल नहीं हो सकती, यह सत्य स्पष्ट होने लगा। इसी पुनर्जागरण के फलस्वरूप 19वीं सदी के उत्तरार्ध में सारा देश सामाजिक क्रान्ति की पुकार से गूँज उठा। इस क्षेत्र में भी बंगाल सबसे आगे रहा। यही कारण है की भारतीय नवजागरण को प्रारम्भ करने का गौरव बंगाल की भूमि को प्राप्त है। राजा राममोहन राय भारतीय राष्ट्रीयता के जनक माने जाते हैं और नवजागरण के पुरोधा भी। परंतु सबसे पहले उनकी दृष्टि धर्म की ओर ही आकृष्ट हुई थी। उस समय धर्म ही व्यक्ति और समाज का मूलाधार था। उसके बिना समाज सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती थी। इसीलिए राममोहन राय ने धर्म संस्कार की ओर ध्यान दिया। उन्होंने निराकार ब्रह्म की साधना, एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद को हिंदू धर्म का शुद्ध रूप प्रमाणित करने की चेष्टा की और इसी उद्देश्य से उन्होंने "आत्मीय सभा" की स्थापना की। इस सभा में धर्म तत्वों के अतिरिक्त जाति-भेद समस्या, कुलीन प्रथा, सहभोज, बाल विधवा, बहु विवाह और सती प्रथा आदि सामाजिक कुप्रथाओं पर भी विचार किया जाता था। यही समाज सुधार का प्रारम्भ था जो बाद में सारे भारत में व्याप्त हो गया और ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज तथा थियोसोफ़िकल सोसाइटी आदि संस्थाओं के रूप में प्रकट हुआ। स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की जीवन दृष्टि सहित ये सब इस काल के निर्णायक तत्व हैं।

शरत का जन्म राजा राममोहन राय की मृत्यु (1833) के 43 वर्ष बाद हुआ था और जब वह दिशाहारा होकर मार्ग की खोज में भटक रहा था तथा उसकी साहित्य साधना प्रेम की पीड़ा के भीतर से उन्मुख हो रही थी।

शरत का सारा जीवन भीषण बिखराव और भटकाव की यंत्रणा से भरा था। बाल्यावस्था से ही वह दरिद्रता निराश्रय और दीनता का शिकार रहा। पिता मोतीलाल के अपने परिवार के भरण-पोषण की अक्षम आर्थिक स्थितियों ने माता भुवन मोहिनी को अपने पिता के घर देवानंदपुर में शरण लेने के लिए बाध्य कर दिया। शरत की बाल्यावस्था देवानन्दपुर, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पटना आदि स्थानों पर टुकड़ों-टुकड़ों में गुज़री। उनके जीवन में कभी स्थिरता नहीं रही। आर्थिक निर्धनता और अभावों ने उनके जीवन के अंतिम समय तक उनका पीछा नहीं छोड़ा। वे स्वयं उन स्थितियों के लिए ज़िम्मेदार थे। शरत स्वभाव से बचपन से साहसी, पराक्रमी, निर्भीक, नास्तिक, सेवापरायण और अत्यंत भावुक प्रकृति के व्यक्ति थे। उनमें उत्पीड़ित और शोषित जनों के लिए अपार प्रेम और स्नेह का भाव सदैव जागृत रहता था। तत्कालीन बंगाली समाज स्त्रियों के प्रति विशेष रूप से निर्दयी और रूढ़ियों से ग्रस्त था। शरत, दीन-हीन, निराश्रित और पतित स्त्रियों के प्रति सदैव समर्पित था।

रात-रात जागकर रोगियों की सेवा करना, समय-असमय श्मशान जाकर दाह संस्कार करना, विवाह-पूजा आदि में आगंतुकों की सेवा करना, इन सब कामों में वह पटु था।

बचपन में कई बार पैसे के अभाव में उसकी पढ़ाई बाधित हुई और समाप्त भी हो गई। नाटक-थियेटर, गाना-बजाना और साहित्य सृजन, इन्हीं में उसका मन रमने लगा। उसके दीन-दुखियों की सेवा के अभियान और ज़ोरों से चलने लगे। उसके लिए वेश्याओं के घर तक जाना भी वर्जित नहीं था। कहा जाता है कि उन्नीस वर्षीय शरत और उसके बालसखा राजू दोनों का संपर्क कालीदासी नामक एक नर्तकी से हुआ था। कालीदासी इन दोनों से स्नेह करती थी। कंठ के माधुर्य और वाक्पटुता के कारण नारियों का उसके प्रति विशेष आकर्षण रहा है। ऐसे ही कुकर्मों के कारण कुलीन समाज में शरत की मान-मर्यादा नष्ट हो चुकी थी। इसीलिए अकुलीनों के समाज में ही उसे शरण लेनी पड़ती थी। वहीं पर उसने मनुष्य की खोज की, और जाना कि मनुष्यत्व सतीत्व से बड़ी वस्तु है। इन्हीं दिनों (1901) चोरी-चोरी "देवदास" का सृजन चल रहा था। यद्यपि प्रौढ़ावस्था में शरतचंद्र ने इस रचना की निंदा की है। बार-बार कहा है, "वह अच्छा नहीं है, अश्लील है, और भी बहुत कुछ है। बचपन की मेरी इस रचना को मत छापो।"2 लेकिन उस समय निश्चय ही उसने अपने प्रेम के दर्द को देवदास के माध्यम से स्वर देने का प्रयत्न किया था। अतिशय भावुकता के बावजूद यह रचना शरत के अपने असफल पर उत्कट प्रेम की आत्मस्वीकृति ही है। इस उपन्यास के सभी चरित्रों का आधार वास्तविक है। जो उसे बहुत अधिक प्यार करती थी, स्कूल की वह साथिन धीरू, देवदास में "पार्वती" के रूप में अवतरित हुई। धर्मदास के चरित्र का आधार बना, नाना के घर का सेवक "मुशाई" और चन्द्रमुखी का उपादान जुटाया एक नर्तकी ने। स्वयं शरतचंद्र ने नर्तकी के इस आभार को स्वीकार किया है। उन्होंने यह कहानी अपने मित्रों को कई बार, कई रूपों में सुनाई।

शरतचंद्र ने व्यक्तिगत अनुभव की एक रोचक कहानी अपने परम भक्त संगीतज्ञ मित्र दिलीप कुमार राय को सुनाई जो "देवदास" उपन्यास का प्रेरक बना। शरत को नाच-गाने का शौक़ तो बचपन से ही था। अपने इस शौक़ को पूरा करने के लिए वे किसी भी लांछित एवं कुख्यात जगह पर पहुँचने से परहेज़ नहीं करते थे। वे गाँजा, अफ़ीम और शराब का सेवन भी करने के आदी थे जिस कारण उन्हें कुलीन समाज अपने निकट भटकने नहीं देता था। किन्तु शरत को कथित सभ्य एवं संभ्रांत समाज के द्वारा ऐसा अवमाननापूर्ण व्यवहार प्रिय था और वे जानबूझकर ऐसी स्थितियों को स्वयं निर्मित करते थे। यह शरत के चरित्र का विचित्र लक्षण था। समाज के उपेक्षित, उत्पीड़ित, दलित, तिरस्कृत और पतित, दुःखी जनों के प्रति ही उनमें प्रेम और आत्मीयता का भाव कूट-कूट कर भरा था। वे मनुष्यत्व के पुजारी थे तथा इसकी रक्षा के लिए अपने आप को चरित्रहीन सिद्ध करने में उन्हें कोई गुरेज नहीं था।

उनका एक मित्र किसी ज़मींदार के यहाँ काम करता था। शरत इस मित्र के साथ गाना सुनने के लिए एक नर्तकी के विलास मंदिर में गया था। उस दिन उस मित्र के पास कई हज़ार रुपये थे। उस विलास मंदिर में शरत और उसके मित्र ने शराब और नाच-गाने का ख़ूब आनंद लूटा। मित्र पर शराब का नशा ऐसा चढ़ा की वह अपने होश खो बैठा। शरत भी होश गँवा बैठे थे। दूसरे दिन सुबह जब दोनों मित्रों को होश आया तो मित्र ने अपने पैसे लुट जाने का हल्ला मचा दिया। मित्र की आँखों में आँसू आ गए क्योंकि वह पैसे उसके ज़मींदार के थे और उसके खो जाने से उसकी नौकरी जा सकती थी। मित्र को विश्वास हो गया कि उसके पास की वह धन राशि नर्तकी ने ही चुराए हैं। किन्तु ठीक उसी समय नर्तकी उनके बीच पहुँचकर उनके पैसों की थैली उन्हें सौंप देती है। वह मित्र से कभी ऐसी मूर्खता न करने की विनती करती है। वह नसीहत देती है कि ऐसी जगहों पर इतनी धन राशि लेकर कभी नहीं जाना चाहिए। वहाँ तो थोड़े से रुपयों के लिए खून खराबा हो जाया करता है। इसी आशंका से ही उसने बेहोश मेहमान के उन रुपयों को सुरक्षित रखने के लिए उसने रुपयों को अपने आँचल में बाँध लिया और इस तरह कमर में लपेट लिया कि ज़रा भी छेड़ने पर उसकी आँख खुल जाए। यह कहते हुए उसने वे रुपये निकालकर मित्र के सामने रख दिये और कहा, "देख लीजिए, सब ठीक तो है न? जब नर्तकी ने वे रुपये वापस कर दिए तो शरत उसकी ओर देखता रह गया। सोचने लगा, वह चाहती तो उन्हें हज़म भी कर सकती थी। किसमें हिम्मत थी कि उससे वापस ले सकता! कितनी महान है वह! पथभ्रष्ट हो जाने पर भी मनुष्य के अंतर की सद्वृत्तियाँ पूरी तरह नष्ट नहीं होतीं। बाहरी रूप ही मनुष्य का असली परिचय नहीं है। अनेक सती नारियाँ कुकर्म करती हैं, इसके विपरीत दुराचारिणियों के हृदय में भी दया-माया बनी रहती है। लोगों के अनुमान के अनुसार यह नर्तकी कालीदासी ही हो सकती है जो शरत के प्रति स्नेह और ममता का भाव रखती थी। "देवदास" के सृजन के समय शरत उसी के पास जाता था, यही देवदास की चन्द्रमुखी बनकर उभरी। उसका चरित्र भी इस नर्तकी से मिलता है। सब कुछ दान करके वह संन्यासिनी हो गई थी, लेकिन उसके बाद भी पूजा के अवसर पर लोगों के घर गीत सुनाने वह जाती रही। यही कालीदासी चन्द्रमुखी के रूप में अवतरित हुई, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तभी तो उपन्यास में देवदास का मित्र चुन्नीलाल उससे कह सका,

"नहीं, नहीं। नोट-फोट की लालची और ही होती हैं। तुम उनमें से नहीं हो।"

शरतचंद्र के जीवन में बाल्यपन से ही कई नारियाँ कई रूपों में आईं, माता और बहनों के अतिरिक्त धीरू, नीरदा, कालीदासी, विलासी, निरुपमा, शांति, मोक्षदा (हिरण्मयी) तथा और भी कई पीड़ित स्त्रियों ने उसके जीवन को प्रभावित किया। शरत के स्कूल की संगिनी धीरू, जिससे शरत के मन में बाल-सुलभ अवस्था में ही गंभीर किन्तु अव्यक्त प्रेम का अंकुरण हुआ था और जो अचानक उनके गाँव देवानन्दपुर छोड़कर अपने माता-पिता के संग कहीं और चली गई। शरत के बाल मन का यही विरहाकुल घाव उसके जीवन को सदैव त्रस्त करता रहा। शरत अपनी बालसखी और चिर प्रेमिका धीरू को कभी नहीं बुला पाया था। यही धीरू "देवदास" में पार्वती के रूप में प्रकट हुई।

शरतचंद्र का जन्म बंगाल के देवानंदपुर गाँव में 15 सितंबर 1876 में हुआ। वे उनके पिता मोतीलाल और माता भुवन मोहिनी की दूसरी संतान थे। देवानंदपुर, बंगाल का एक साधारण गाँव है। हरा-भरा, ताल-तलैयों, नारियल और केले के वृक्षों से पूर्ण। नवाबी शासन में यह फ़ारसी भाषा की शिक्षा का केंद्र था। इसी गाँव में शरत का बाल्यकाल अभावों के बीच शुरू हुआ। शरत जब पाँच वर्ष का हुआ तो उसे विधिवत गाँव के पंडित बंदोपाध्याय की पाठशाला में भर्ती कर दिया गया, लेकिन शब्दश: वह शरारती था। प्रतिदिन वह कोई न कोई कांड करके ही लौटता। जैसे जैसे वह बड़ा होता गया उसकी शरारतें भी बढ़ती गईं। पाठशाला में चुपके से पंडित जी की चिलम में तंबाखू के स्थान ईंट के टुकड़े भरकर रख देना और भले लड़के की तरह अपने स्थान पर जा बैठना। पंडित जी का क्रोधवश शरारती बालक को बेंत उठा कर मारने के लिए दौड़ने के उपक्रम में शरत का छलाँग लगाकर कक्षा से निकल भागने का प्रसंग, शरत ने स्वयं "देवदास" में लिखा है। उपन्यास में देवदास का बाल्यकाल का चित्रण, शरत के देवानंदपुर की पाठशाला की शरारतों के यथावत चित्रित से भरा पड़ा है। उसी कक्षा में शरत की बालसखी धीरू भी पढ़ती थी जिस पर शरत स्नेह-वश अपना अधिकार जताता था। धीरू भी शरत के अधिकार को स्वीकार करती थी। पंडितजी स्वयं कई बार शरत की शरारतों को अनदेखा कर जाते। एक तो वह पढ़ने में तेज़ था, दूसरे उनके बेटे काशीनाथ का परम मित्र भी था। काशीनाथ उसी स्कूल में पढ़ता था धीरू उसी की बहन थी। न जाने कैसे शरत की उससे मित्रता हुई। वे दोनों अकसर एक साथ खेलते हुए दिखाई देते। वे दोनों जितना एक दूसरे को चाहते उतना ही आपस में लड़ते-झगड़ते भी थे। गाँव के निकट के नदी या तालाब में मछली पकड़ना, नाव लेकर नदी में सैर करना, बाग़ से फल चुराना, पतंग उड़ाना, वन-उपवन में घूमना, इन सब प्रकार के बालसुलभ चेष्टाओं में धीरू शरत की संगिनी थी। उसका असली नाम क्या था, किसी को पता नहीं परंतु सभी लोग उसे धीरू के नाम से जानते थे। धीरू को एक शौक़ था, वह निकट के करौंदे के झुरमुट से उसकी माला तैयार करती और शरत को भेंट कर देती। शायद माल्यार्पण का अर्थ वह तब तक नहीं जानती थी। "देवदास" के बाल्य जीवन के सभी प्रसंग शरत के देवानंदपुर में अध्ययन काल के ही वास्तविक प्रसंग हैं। देवदास उपन्यास में वर्णित कक्षा के प्रमुख को चूने के ढेर में गिराकर पाठशाला से पलायन का दृश्य, इसे देखकर पार्वती का हँसते-हँसते लोटपोट हो जाने वाले दृश्य आदि सभी शरत के जीवन की घटनाएँ ही तो हैं। धीरू की नादानी पर शरत उसे बहुत मारता भी था जिसे वह सहज भाव से सह लेती थी, कभी-कभार वह शरत के घर में शिकायत भी करती लेकिन शरत उसे फिर मना लेता। इन प्रसंगों से उन दोनों की मित्रता में कभी कोई अंतर नहीं पड़ा। वह निरंतर प्रगाढ़ ही होती गई। शरत को धीरू के अपने प्रेम का अहसास तब होता है जब वह उससे दूर चली जाती है। उपन्यास में शरत ने अपनी इसी व्याकुलता को देवदास के माध्यम से व्यक्त किया है। विछोह की परिस्थिति में ही प्रेम के मूल्य का पता चलता है इसे देवदास में शरत ने सिद्ध किया है किन्तु इस विछोह का मूल्य दु:सह था। बहुत दिन बाद शैशव की इस संगिनी को आधार बनाकर देवदास के साथ-साथ शरत ने अपने अन्य कई उपन्यासों की नायिकाओं का सृजन किया।

देवदास की पारो, "बड़ी-दीदी" की माधवी और "श्रीकांत" की राजलक्ष्मी, ये सब धीरू ही का तो विकसित और विराट रूप हैं। विशेषकर "देवदास" में तो जैसे शरत ने अपने बचपन को ही मूर्त कर दिया है।

शरतचंद्र का समस्त कथा साहित्य, असफल प्रेम की विडंबनाओं से भरा है। शरत का यह दृढ़ विश्वास था कि प्रेम में सफलता ही उसके अस्तित्व का प्रमाण नहीं है। मन ही मन किसी के लिए अपने को विसर्जित किया जा सकता है। इस वेदना को स्नेह कहें, प्रेम कहें, आयु का दोष कहें, पर इसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। शरत में प्रेम की भूख अपार है लेकिन तृप्ति का कहीं कोई साधन नहीं है। यह अतृप्ति दर्द के रूप में उसके अंतर में रम गयी और उसकी अभिव्यक्ति "देवदास" और "बड़ी दीदी" आदि रचनाओं में तीव्रता के साथ अभिव्यक्त हुई। इन रचनाओं में असफल प्रेम का वही दर्द परिव्याप्त है। काल्पनिक पात्र नीरदा हो या अपने सहपाठी मित्र की विधवा बहन-निरुपमा, देवदास की पारो हो या बड़ी दीदी की माधवी, वे सब एक ही हैं – असफल प्रेम की प्रतिमाएँ। प्रेम में असफल होकर भी शरत न तो आत्महत्या कर सका और न संन्यासी बन सका लेकिन स्रष्टा बनने का मार्ग उसे अवश्य मिल गया। इस मार्मिक अनुभूति ने साहित्य में प्रतिबिंबित होने का मार्ग पा लिया। वियोग ने एक शक्तिशाली कलाकार को जन्म दिया। उसके उच्छृंखल जीवन की जो अतृप्ति थी, वही उसके साहित्य-सृजन का मूलधन बनी। प्रेम की पीड़ा और साहित्य यात्रा एक साथ चलने लगी। विरह बोध ही जीवन का आवेग है, बुद्धि इसकी थाह नहीं पा सकती, हृदय से ही इसका स्वरूप माना जा सकता है। शरत के साहित्य में यही विरह बोध मुखर हुआ है। आदर्श और यथार्थ, समस्या और समाधान, सब कुछ हृदय-रस की संजीवनी में डूबे हुए हैं। शरत, अपनी जीविका की तलाश में देवानन्दपुर से भागलपुर, पटना, मुजफ्फरपुर होते हुए बर्मा (रंगून) पहुँचे जहाँ वे कई वर्ष रहे। भटकाव ही उनके जीवन का स्थायी भाव रहा है। मानव जीवन के दुर्वह से दुर्वह रूपों को शरत ने बहुत निकट से देखा और उसके साथ जुड़ते चले गए।" साधारण व्यक्ति के लिए जो जीवन अप्रतिष्ठा और कलंक का कारण हो सकता है वही भावुक साहित्यकार के लिए बड़ी शक्ति बन जाता है।" यह कथन शरत के लिए चरितार्थ होती है। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ने लिखा है –

"जीवन-मंथन से निकला विष, वह जो तुमने पान किया।
और अमृत जो बाहर आया, उसे जगत को दान किया।"

शरत का मानना था कि "मनुष्य से किसी भी अवस्था में घृणा नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति ख़राब दिखाई देते हैं उन्हें सुधारने की चेष्टा करनी चाहिए। यह बहुत बड़ा काम है। भगवान की इस सृष्टि में मनुष्य जितना शक्तिशाली है उतना दुर्बल भी है।" शराब पीकर जीवन नष्ट करने वालों के प्रति शरत के हृदय में करुणा का भाव जागता था। उसे क्रोध आता था किन्तु वह उन लोगों से घृणा कभी नहीं करता था, क्योंकि वह मानता था कि "बुद्धि और हृदय की विशालता के मामले में शराब पीने वाले न पीने वालों से क्षुद्र हैं, यह किसी भी तरह से सत्य नहीं है।" कदाचित देवदास के पात्र को गढ़ने में शरत की यही सोच रही है।

"क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि जो स्वयं शराब पीने और नाना प्रकार के दूसरे कुकर्म करने के लिए बदनाम हो वह दूसरों के ये ही दुर्गुण छुड़ाने का प्रयत्न करे। अपने मित्रों को समय-समय पर लिखे गए पत्रों में उसने अपने इन दुर्गुणों का रस ले-लेकर बखान किया है और इसी के आधार पर बहुत से लोगों ने बहुत-सी अविश्वसनीय घटनाओं की सृष्टि कर ली। लेकिन ये सब अतिरंजित ही नहीं झूठ भी हैं। सत्य यही लगता है कि उसके अंतर में कई शरत आसन जमाये बैठे थे और इसलिए वह अपने चारों ओर एक रहस्यमय वातावरण बनाए रखना चाहता था। अपने को छिपाए रखने और अवचेतन में विद्यमान वीभत्स और क्रूर समाज से बदला लेने की भावना उससे यह सब काम करवाती रहती थी। शरत कि यही प्रतिहिंसात्मक और प्रतीकारात्मक मानसिकता उनके सारे उपन्यासों में व्याप्त है।" जहाँ तक शराब का प्रश्न था, पीते और लोग भी थे। शरत भी पीता था लेकिन इसी कारण लक्ष्यभ्रष्ट वह कभी नहीं हुआ। उसका सबसे बड़ा अपराध यही था कि वह तथाकथित छोटे और चरित्रहीन लोगों के बीच में रहता था। यही नहीं, अवसर पाकर वह जावा, सुमात्रा, बोर्नियो आदि बदनाम द्वीपों में घूमने निकला जाता और वहाँ के लोगों के बीच में उनका होकर जीवन जीता। इस प्रवृत्ति के कारण उसने बहुत कुछ खोया पर बहुत कुछ पाया भी। उसका शरीर एक़दम जर्जर हो गया परंतु उसकी अभिज्ञता का कोश बढ़ता ही गया।"

शरत के सभी उपन्यासों में वह स्वयं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विद्यमान है। "देवदास" उपन्यास में भी शरत के जीवन की अनेकों छवियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। शरत के जीवन की यायावरी, अनिश्चितता, दुविधात्मक मानसिक गुत्थियों का आत्मसंघर्ष और बारंबार पलायन की प्रवृत्तियाँ सभी कुछ तो देवदास के चरित्र में पूरी तरह से समा गई हैं। देवदास उपन्यास शरत के जीवन के प्रारंभिक दौर का उपन्यास है जब उनमें युवावस्था का प्रेमिल उन्माद हिलोरें मार रहा था और उसका बचपन के असफल प्रेम का दंश ताज़ा था। सहज ही शरत की प्रेम की पीड़ा देवदास में अभिव्यक्त हुई है। "देवदास" एक विफल प्रेम की त्रासद कहानी है जिसका नायक देवदास, ज़मींदार घराने का चंचल चित्तधारी द्वन्द्वात्मक मानसिकता का विचित्र पात्र है। अनिश्चितता, द्वंद्वात्मकता, पलायनवादिता और सबसे बढ़कर कायरता, उसके चरित्र का प्रधान लक्षण है। देवदास के प्रति शरत के मन में अपार करुणा भरी हुई है जिसे वे उपन्यास के अंत में अभिव्यक्त करते हैं और पाठकों से भी देवदास की त्रासदी के लिए करुणा के अश्रु बिन्दुओं को समर्पित करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

देवदास उपन्यास की कहानी उन्नीसवीं सदी के पुनर्जागरण काल के बंगाल की कहानी है। उस समय के बंगाल में एक ओर जहाँ तेज़ी से आधुनिक शहर में बदलता हुआ कलकत्ते जैसा बड़ा क़स्बा है, वहीं दूसरी ओर अपने पतनशील सामंती मूल्यों और संस्कारों में जकड़ा ग्राम समाज है। यह समाज उपनिवेशवादी अंग्रेज़ शासकों की ज़मींदारी व्यवस्था से नियमित और नियंत्रित होने को ही अपनी नियति मानता है।

देवदास और पारो एक ही गाँव में बचपन से पलकर बड़े हुए थे। देवदास बंगाल के ताल सोनापुर गाँव के ज़मींदार नारायण मुखर्जी का लाड़ला छोटा बेटा था। उसका बड़ा भाई द्विजदास, जिसकी किशोरावस्था में शादी कर दी गई थी। ज़मींदार के पड़ोस में ही नीलकंठ का मध्यवर्गीय परिवार रहता था जिसकी सुंदर बिटिया पार्वती (पारो) देवदास की बालसखी थी। दोनों में बचपन से ही बहुत प्यार और हमजोली थी। देवदास मानो पारो को परोक्ष रूप से अपना ही समझता था, और उस पर अपना पूरा अधिकार जमाता रहता था। खेलकूद, पाठशाला में शरारतें और फिर भागकर पोखर के किनारे वाले झुरमुट में छिपकर बैठ जाना, उसे मनाने के लिए ज़मींदार का विश्वासपात्र नौकर धर्मदास का पारो की मदद से उसे ढूँढकर वापस घर ले जाने का सिलसिला चलता था। गाँव में देवदास की शरारतों से तंग आकर, एक दिन ज़मींदार नारायण मुखर्जी देवदास को कलकत्ता पढ़ने के भेज देते हैं। कलकत्ता जाकर वह अपनी पढ़ाई में लीन हो गया। गाँव में पारो पीछे छूट गई। छुट्टियों में कभी-कभी देवदास गाँव आता तो पार्वती से उसकी भेंट हो जाती, कभी देवदास पार्वती के घर आ जाता या दोनों गाँव के बाहर पोखर के निकट पेड़ों के झुरमुट में बैठकर ख़ूब बातें करते। छुट्टियाँ ख़त्म होते ही देवदास कलकत्ता लौट जाता।

पारो के मन में देवदास बस गया था। वह मन ही मन उसकी पूजा करने लगी थी। उसके लिए देवदास ही जीवन का सर्वस्व बन चुका था जिसकी ख़बर किसी को न हुई। पारो देवदास को अपना ही समझ बैठी थी।

देवदास के मन में पारो के लिए प्रेम तो बचपन से ही मौजूद था किन्तु उसे इसका आभास नहीं हुआ था। उसमें प्रेम सहज भाव से अनायास अंकुरित हुआ था जिसे उसने कभी गंभीरता से नहीं लिया था। उसका कारण था, पार्वती पर उसके एकाधिकार का विश्वास।

पार्वती के तेरहवें वर्ष में प्रवेश करते ही, उसके विवाह के बारे में घर में बातें चलने लगती हैं। उसका सौन्दर्य दिनों-दिन निखरने लगा था। पार्वती के घर वाले बड़े आदमी न थे, पर संतोष यही था कि लड़की देखने में बहुत ही सुंदर थी। पार्वती की माँ की धारणा थी कि दुनिया में अगर रूप की मर्यादा और क़दर है, तो पार्वती के लिए फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं। चक्रवर्ती परिवार में इसके पहले लड़की के विवाह में रत्ती भर चिंता नहीं करनी पड़ी थी, चिंता लड़के के विवाह में करनी पड़ती थी। उनके परिवार में लड़की के विवाह में दहेज लिया जाता था और लड़के के विवाह में दहेज देकर लड़की लाई जाती थी। पार्वती के पिता नीलकंठ ने भी बेटी पर दहेज लिया था, लेकिन नीलकंठ ख़ुद इस रिवाज़ से घृणा करते थे। उनकी ज़रा भी इच्छा न थी कि पार्वती को बेचकर रुपये कमाएँ। पार्वती की माँ के मन में एक दुराशा पल रही थी कि किसी उपाय से देवदास से पार्वती का ब्याह हो जाए। उसे यह असंभव नहीं लगता था। क्योंकि देवदास और पार्वती, दोनों के परिवार इस सत्य से अनभिज्ञ न थे कि पार्वती और देवदास दोनों बचपन से एक दूसरे को चाहते हैं।

पार्वती की दादी (नीलकंठ की माँ) एक दिन देवदास की माँ से पारू और देवदास के विवाह की चर्चा छेड़ती है। देवदास की माँ इस प्रस्ताव को सुनकर आगबबूला हो उठती है और उसे अपमानित करके भेज देती है। देवदास की माँ वैसे तो मन ही मन पार्वती को बहुत चाहती थी किन्तु उसे "लड़की ख़रीद-बिक्री वाले" घर की बेटी से रिश्ता मंजूर नहीं था। विवाह के प्रस्ताव को ठुकराने का उनका यह तो एक बहाना था। वास्तव में उन्हें अपने उच्च कुल और ज़मींदारी का घमंड थी जिस कारण वे देवदास की माँ को अपमानित कर विदा कर देते हैं।

इस संबंध में ज़मींदार मुखर्जी बाबू का भी यही विचार था कि वे कभी बेटी-बेचवा के यहाँ की लड़की को अपने घर की बहू नहीं बना सकते। इससे उनके खानदान की नाक जो कट जाएगी! यह घटना पार्वती के घर में तूल पकड़ लेती है। ज़मींदार नारायण मुखर्जी और उनकी पत्नी के अपमानजनक व्यवहार से क्रोधित होकर नीलकंठ चक्रवर्ती, पार्वती के लिए वर ढूँढने के लिए निकल पड़ते हैं। इन घटनाओं के बीच पार्वती क्षोभ और दुःख से व्याकुल हो उठती है। शरत ने कहानी के इस मोड़ पर पार्वती के अंतर्द्वंद्व को बहुत ही बारीक़ी से उकेरा है।

"छुटपन से ही उसका ऐसा ख़याल था कि देवदास पर उसका थोड़ा अधिकार है। ऐसा नहीं कि किसी ने यह अधिकार उसे हाथ से दिया था! अनजाने ही, अशांत मन ने धीरे-धीरे इस अधिकार को ऐसे चुपचाप, लेकिन इतनी दृढ़ता से, जमा लिया कि बाहर से यद्यपि आज तक उसकी कोई शक्ल नज़र नहीं आई, तथापि आज उसे खोने की बात उठते ही उसके सारे हृदय में भयानक आँधी उठने लगी।"

नीलकंठ चक्रवर्ती अपनी ज़िद से मिथ्या स्वाभिमान की रक्षा के लिए चालीस वर्ष से अधिक उम्र के हाथीपोता गाँव के विधुर ज़मींदार भुवन चौधरी से पार्वती का रिश्ता निश्चित कर आते हैं। घटनाचक्र बहुत तेज़ी से पार्वती के जीवन को अज्ञात दिशा में धकेलकर ले जाता है। देवदास को इन बातों की ख़बर तक नहीं थी। देवदास इन्हीं दिनों जब गाँव आता है तो उसे उसकी माँ, पार्वती के ब्याह की चर्चा करती है। वह बताती है कि पार्वती के घर वाले उनके ही घर में रिश्ता करना चाहते थे। तब देवदास, माँ की प्रतिक्रिया जानना चाहता है। माँ उसे साफ़ शब्दों में पिता के प्रतिकूल विचारों से उसे अवगत करा देती है। देवदास का मन खिन्नता से भर उठता है।

उस रात पार्वती स्त्री सुलभ लाज और शर्म को त्यागकर निर्भीकता के साथ ज़मींदार के भवन में प्रवेश कर, गहरी नींद में सोए हुए देवदास को जगाकर अश्रुपूरित नेत्रों से देवदास के पैरों में सिर रखकर रुँधे स्वर में कहती है –

"मुझे यहाँ थोड़ा सा स्थान दो, देव भैया!" देवदास अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था, यही वह पारू को उस रात समझाकर विदा कर देता है। दूसरे दिन देवदास अपने पिता से पारू के संबंध में पूछना चाहता है किन्तु उसके पिता उसे धिक्कार देते हैं। उसी दिन देवदास घर छोड़कर कलकत्ता चला जाता है। कलकत्ता से वह पार्वती को पत्र लिखता है। यह पत्र उपन्यास का वह केंद्र बिन्दु है जो पार्वती और देवदास के विनाश कारण बनाता है। यह पत्र देवदास के आत्मभीरु और पलायनवादी चरित्र को उद्घाटित करता है। यह वह निर्णायक पत्र था जिससे देवदास हमेशा के लिए पारू को खो बैठता है। पत्र में देवदास विवाह के मामले में अपनी अशक्यता को प्रकट करता है। वह लिखता है कि उसके माता-पिता पारू के कुल को नीच मानते हैं और वे बेटी-बेचवा के घर की लड़की को अपने कुल की वधू कभी नहीं बना सकते। पत्र के अंत में वह पारू से निवेदन करता है की वह उसे हमेशा के लिए भूल जाए।

पत्र को डाक में डालते ही देवदास को अपनी भूल का अहसास होता है। उसकी अस्थिर मानसिक स्थिति उसे व्याकुल कर देती है। उसे पार्वती की दयनीयता का स्मरण हो आता है। उसकी तर्क बुद्धि एकाएक जाग उठती है और वह आत्मविश्लेषण करने लगता है। अंतर्द्वंद्व देवदास की मनोदशा का मुख्य लक्षण है जो इस स्थिति में व्यक्त होती है। "डाकघर से लौटते हुए हर क़दम पर उसे यही याद आ रहा था। आख़िर यह अच्छा हुआ? वह यह सोच रहा था कि जब पार्वती का अपना कोई क़ुसूर नहीं तो माता-पिता इस विवाह के लिए मना ही क्यों कर रहे हैं? वह यह समझ रहा था की सिर्फ दिखावे की कुल-मर्यादा और छोटे ख़याल के चलते, नाहक़ किसी की जान लेना ठीक नहीं। अगर पार्वती जीना न चाहे, अगर जी की जलन छुड़ाने के लिए वह नदी में कूद पड़े, तो विश्वपिता के चरणों पर एक महापातक का दाग़ उस पर नहीं लगेगा क्या?"

वह उद्विग्न अवस्था में पुन: पारू से मिलने और अपनी ग़लती को ठीक करने के उद्देश्य से फौरन गाँव लौट जाता है। वह पारू से पोखर किनारे बाग़ में मिलता है और अधिकारपूर्वक पारू को स्वीकार करने की मनोकामना व्यक्त करता है। किन्तु तब तक देर हो चुकी थी, पारू का स्वाभिमान जाग उठा था, वह भी अपने माता-पिता की मान मर्यादा का वास्ता देकर देवदास के अहंकार पर चोट करती है। पार्वती के स्वाभिमान का दर्प देवदास को भस्म कर देता है। "क्यों न हो अहंकार! तुम कर सकते हो, मैं नहीं कर सकती? तुमको रूप है, गुण नहीं। मुझमें रूप है, गुण भी। तुम बड़े आदमी हो, मगर मेरे पिता भी भीख नहीं माँगते फिरते। फिर इसके बाद ख़ुद मैं भी किसी प्रकार तुमसे हीन नहीं रहूँगी, पता है?" इस बार पार्वती देवदास को ठुकरा देती है क्योंकि वह निर्णय ले चुकी थी। अपने माता-पिता के निर्णय को वह स्वीकार कर चुकी थी, क्योंकि देवदास ने उसे ठुकरा दिया था। पारू के स्वाभिमानी तर्क से क्रोधित होकर देवदास हाथ में थामे हुए बंसी की मूठ को ज़ोर से घुमाकर पार्वती के सिर पर मार देता है जिससे पार्वती के माथे पर गहरी चोट लगती है और वह ज़ख़्मी हो जाती है। उसका चेहरा लहू से लाल हो जाता है। देवदास आत्मग्लानि और आवेश भरे स्वर में पार्वती से बोलता है – "सुनो पार्वती, इतना रूप भी रहना ठीक नहीं। अहंकार बढ़ जाता है। देखती नहीं, चाँद इतना ख़ूबसूरत है, इसीलिए उसमें कलंक का काला टीका है। कमल कैसा सफ़ेद होता है, इसीलिए उसमें काला भौंरा बैठा रहता है। आओ तुम्हारे पर भी कलंक की कुछ छाप छोड़ दूँ।"

उपन्यास का यह प्रसंग मार्मिक और चिरवेदना की छाप छोड़ जाता है। देवदास शिथिल और पराजित होकर अपने प्रेम के संसार को अनजाने में लुटाकर निराशा और उदासी के अंधकार में खो जाता है। उसकी कायरता और अस्थिर मानसिकता उसे बेसहारा बनाकर छोड़ देती है।

पार्वती का विवाह हो जाता है वह अपने ससुराल चली जाती है। भुवन चौधरी के परिवार में उनकी पहली पत्नी की पाँच संताने थीं। पार्वती विवाह से ही पाँच बच्चों की माँ बना गई। अब वह ज़मींदारनी थी। उसका पति की हवेली में उसने बहुत सम्मान पाया।

देवदास निराश होकर अंतर्वेदना से व्यथित होकर कलकत्ता चला जाता है। कलकत्ता पहुँचकर वह निश्चेष्ट और अन्यमनस्क स्थिति में दारुण मानसिक क्लेश का शिकार हो जाता है। उसे कुछ भी नहीं सूझता। इसी विषम और व्याकुल मन:स्थिति में उसके वियोग जनित तप्त हृदय को शीतलता पहुँचाने का उपाय सुझाता है उसका मित्र, चुन्नीलाल। चुन्नीलाल देवदास के ही बसेरे में रहने वाला एक स्वच्छंद स्वभाव का व्यक्ति था जो पढ़ाई के लिए कलकत्ता आया था किन्तु वह इतर दुर्व्यसनों में ही अपना समय बिताया करता था। उससे देवदास की व्यथा नहीं देखी जाती। वह देवदास का हितैषी मित्र होने के नाते उससे उसके दुःख का कारण पूछता है किन्तु देवदास उसे अपने निजी जीवन के संबंध में कुछ नहीं बताता। उसने देवदास की अमिट प्यास बुझाने और मानसिक शांति हासिल करने के लिए शराब लाकर दी। शराब के नशे में देवदास अपनी व्यथा को कुछ देर के लिए भूलने लगा। अपनी बेचैनी और दारुण यंत्रणा से मुक्ति का यह उपाय देवदास को प्रिय हो गया। इसके बाद वह भी देवदास की असह्य पीड़ा को देखकर चुन्नीलाल उसे चन्द्रमुखी के कोठे पर ले जाता है जहाँ चन्द्रमुखी अपने रूप और यौवन से रसिक जनों को लुभाकर उनका दिल बहलाती थी। चन्द्रमुखी, देवदास का स्वागत करती है लेकिन चन्द्रमुखी के व्यवहार से देवदास क्रोध और आक्रोश से भर उठता है। उसे उस क्षण समस्त नारी जाति से ही मानो नफ़रत सी होने लगती है। वह चन्द्रमुखी को पतित और चरित्रहीन कहकर उसके मुँह पर रुपये फेंककर कोठे से क्रोध से बाहर निकल आता है। देवदास के इस आकस्मिक आवेग से चन्द्रमुखी के हृदय को गहरी चोट लगती है। देवदास उसकी चेतना को एक ही पल में झकझोर देता है। देवदास वापस अपने बसेरे में लौट आता है। उसकी अशांति तीव्र से तीव्रतर होती जाती है। उसके हृदय की आग और वियोग की मर्मांतक वेदना को कुचल डालने का एक मात्र उपाय उसे शराब के नशे में उपलब्ध था। वह नशे को ही व्यथा से मुक्ति का मार्ग मान लेता है और उसी में डूब जाता है। यहीं से देवदास के अध:पतन का अध्याय प्रारम्भ होता है। उसे नशे में ही चैन मिलता था। वह एक पल के लिए भी होश में नहीं रहना चाहता क्योंकि होश में आते ही उसे पार्वती की याद आती, पार्वती के साथ हुए अन्याय की याद उसे असह्य पीड़ा देती थी। इन्हीं स्थितियों में चुन्नीलाल एक बार फिर देवदास को चन्द्रमुखी से भेंट कराने के लिए लेकर जाता है। इस बार उसे चन्द्रमुखी बहुत बदली हुई सी उसे दिखाई देती है। वह अपने वैभव और विलास को त्याग चुकी थी। बहुत सादगी के साथ वह देवदास को उसके नारीत्व के स्वाभिमान को जागृत करने के लिए कृतज्ञता का भाव प्रकट करती है। चन्द्रमुखी देवदास से शराब छोड़ने की प्रार्थना करती है और उसकी पीड़ा कारण जानना चाहती है। चन्द्रमुखी में देवदास के प्रति प्रेम का भाव जागता है। देवदास और चन्द्रमुखी के संबंध इस उपन्यास की कहानी को नई दिशा देते हैं। देवदास के ही मुख से नशे की हालत में चन्द्रमुखी को पार्वती के बारे में पता चलता है। उसे प्रतीत होता है की देवदास ने बहुत गहरी चोट खाई है। वह इसका कारण जानने का प्रयत्न करती है। चन्द्रमुखी का संवेदनशील मन देवदास के हृदय की अशांति को पहचान लेती है। वह स्वयं देवदास से प्रेम करती है किन्तु उसे मालूम था कि देवदास उससे नफ़रत करता है। देवदास उसे एक नीच और गिरी हुई औरत मानता है। वह पार्वती को, जिसे वह अपनी ही चंचल चित्त वृत्ति और कायरता के कारण खो बैठा है, उसे वह उच्च कोटि की कुलवधू मानता है।

चन्द्रमुखी कहती है - "सच बताऊँ, तुमको दुःख होता है तो मुझे भी पीड़ा पहुँचती है। फिर मैं शायद बहुत बातें जानती हूँ। जब तुम नशे में होते थे, तुम्हारे मुँह से मैं बहुत कुछ सुनती रही हूँ। लेकिन तो भी मुझे यह विश्वास नहीं होता कि पार्वती ने तुम्हें ठगा है, बल्कि मेरा ख़याल है, तुमने ही अपने को ठगा है। देवदास! उम्र में मैं तुमसे बड़ी हूँ, दुनिया में बहुत कुछ देखा है। मुझे क्या लगता है, बताऊँ? लगता है तुमसे ही ग़लती हुई है। लगता है, चंचल और अस्थिर चित्त के नाम से स्त्रियों की जितनी बदनामी है, हक़ीक़त में उतनी वे होती नहीं। बदनाम करने वाले भी तुम्हीं लोग हो, सुनाम करने वाले भी तुम्हीं लोग हो।"

"देवदास, जो प्यार करती है, सब कुछ बर्दाश्त करती है। जिसे यह पता है कि केवल हृदय से प्यार करने में कितना सुख कितनी शांति है, वह नाहक़ दुःख और अशांति को खींचकर नहीं लाना चाहती। लेकिन मैं जो कहना चाहती थी, दरअसल पार्वती ने तुम्हें रत्ती भर भी दग़ा नहीं दिया, तुमने ख़ुद अपने आपको दग़ा दिया है। जानती हूँ, आज बात समझने की ज़रूरत नहीं है मगर जब समय आयेगा तो समझोगे कि मैंने सच ही कहा था।"

देवदास के संग उसका विश्वासपात्र सेवक धर्मदास सदा उसके साथ उसकी देखभाल करने के लिए रहता था। जब भी देवदास को रुपयों की ज़रूरत होती तो वह गाँव जाकर रुपये ले आता। देवदास को रुपयों की ज़रूरत केवल शराब के लिए ही पड़ती थी। शहर में रहते हुए देवदास शराब में इस क़दर डूब जाता है कि उसका स्वास्थ्य पूरी तरह नष्ट होकर वह केवल हड्डियों का ढाँचा भर रह जाता है।

उसके पिता ज़मींदार नारायण मुखर्जी की मृत्यु हो जाती है। वह गाँव जाता है। अपने भाई द्विजदास और माँ के साथ कुछ समय गुज़ारता है। ज़मींदार मुखर्जी की मृत्यु की ख़बर पाकर पार्वती देवदास से मिलने ताल सोनापुर आती है। वह देवदास की हालत देखकर व्यथित हो जाती है। धर्मदास से वह सच्चाई जानना चाहती है। धर्मदास पार्वती से देवदास से शराब छुड़ाने का आग्रह करता है।

पार्वती, देवदास से विवाह के बाद पहली बार मिलती है। एक शाम वह देवदास से मिलने जाती है। देवदास, पार्वती को अपने पास बैठाकर उसका हालचाल पूछता है। बचपन की बातों को वे दोनों याद करते हैं और भावुक हो उठते हैं। देवदास बहुत बदल गया था। उसकी क्षीण काया पार्वती को किसी अशुभ का संकेत दे रही थी। वह देवदास के चरणों में झुककर उसकी सेवा का अवसर उसे प्रदान करने की प्रार्थना करती है। पार्वती को बचपन से देवदास की सेवा करने की उत्कट अभिलाषा थी जिसे वह इस जनम में पूरा करना चाहती थी। वह उससे शराब छोड़ने के लिए कहती है लेकिन वह पार्वती की इस विनती को स्वीकार नहीं करता। वह कहता है कि पार्वती के लिए जितना उसे भुला देना असंभव है उसके लिए भी शराब छोड़ना उतना ही कठिन है, क्योंकि शराब ही उसे जीवित रखे हुए है। अंत में देवदास से विदा लेते हुए वह देवदास को एक बार उसके पास उसके गाँव हाथीपोता आने की प्रार्थना करती है। वह पार्वती को वचन देता है कि एक बार (देह छोड़ने से पहले) वह अवश्य पार्वती के घर आएगा।

कलकत्ता पहुँचकर वह चन्द्रमुखी के पास जाता है। उसे पता चलता है कि चुन्नीलाल कलकत्ता छोड़कर कहीं चला गया। चन्द्रमुखी भी किसी छोटे से गाँव में रहते हुए परोपकार में अपना शेष जीवन बिताने के लिए शहर छोड़ने की तैयारी कर रही थी। देवदास उसके पास कुछ दिन ठहरता है और उसे कुछ रुपये देकर विदा करता है। चन्द्रमुखी अश्वथझूरी नामक गाँव में दो साल तक निवास करती हुई ग्रामवासियों में मग्न हो जाती है।

कलकत्ता में रहते हुए देवदास का स्वास्थ्य गिरने लगता है। बीच-बीच में वह रुपयों के लिए अकसर गाँव जाया करता था। एक बार पार्वती की सहेली मनोरमा उसे नशे की हालत में गाँव में भटकते हुए देखकर, पार्वती को पत्र लिखती है जिसमें वह देवदास की दुर्दशा का वर्णन करती है। मनोरमा का पत्र पाते ही, पार्वती फौरन देवदास को अपने साथ लिवा ले जाने के लिए ताल सोनापुर पहुँचती है लेकिन उससे पहले ही देवदास वहाँ से शहर जा चुका था। दुःखी मन से पार्वती अपने घर लौट आती है।

इधर चन्द्रमुखी निकट के गाँव में रहते हुए एक बार देवदास से भेंट करने ताल सोनापुर आती है किन्तु उसे भी देवदास के दर्शन नहीं होते, तब वह देवदास की खोज में दुबारा कलकत्ता जाती है। देवदास को ढूँढने के लिए ही वह कलकत्ते में फिर से एक घर किराये पर लेकर रहने लगती है। उसे आशा थी कि एक न एक दिन देवदास उसके पास अवश्य आयेगा। वह देवदास को ढूँढना शुरू करती है। उसे कलकत्ता आए डेढ़ महीना बीत जाता है। एक रात जब वह हताश होकर घर वापस लौट रही थी कि उसने देखा, एक घर के सामने कोई आप ही आप कुछ बोल रहा था। चन्द्रमुखी के लिए यह पहचानी आवाज़ थी। करोड़ों में भी वह उस स्वर को पहचान लेती थी। जगह अँधेरी थी, फिर नशे में चूर वह आदमी औंधा पड़ा था। वह देवदास ही था। चन्द्रमुखी की आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। देवदास कुछ गा रहा आता। चन्द्रमुखी ने एक गाड़ी रोक कर उस पर देवदास को किसी तरह चढ़ाकर अपने घर ले आई।

उसी समय धर्मदास गाँव से रुपए लेकर देवदास को ढूँढता हुआ चंद्रमुखी के पास आता है। चन्द्रमुखी, देवदास के शरीर पर पट्टी बँधी हुई पाती है जो ऑपरेशन की निशानी थी। उसे देखकर वह घबरा जाती है। सुबह जब देवदास होश में आता है तो वह अपने को चन्द्रमुखी के पास पाकर आश्वस्त हो जाता है। वह अपने मन में चन्द्रमुखी के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त कर देता है। वह उससे पूछता है कि क्यों वह उसकी इतनी सेवा करती है? उसका क्या रिश्ता है उसके साथ? क्यों उसे वह इतनी आत्मीय लगती है। उसके साथ कितने जन्मों का बंधन है यह?

वह चन्द्रमुखी से विदा लेकर चला जाना चाहता है। वह भी देवदास के साथ उसकी सेवा के लिए जाने की इच्छा व्यक्त करती है। देवदास उसे मना कर देता है। वह कहता है कि यदि यह पार्वती को मालूम होगी तो वह क्या सोचेगी? और फिर यह उचित भी नहीं है। वह चंद्रमुखी से कहता है -

"पार्वती और तुममें कितना फ़र्क है, फिर भी कितनी समानतना! एक है स्वाभिमानिनी, उद्धत, दूसरी कितनी शांत, कितनी संयमी। वह कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकती, और तुम्हारी सहनशक्ति की हद! उसका कितना नाम है, कितनी बड़ाई, और तुम्हारी कितनी बदनामी! उसे सब प्यार करते हैं, तुम्हें कोई नहीं। मगर मैं करता हूँ, बेशक़ करता हूँ प्यार!" देवदास ने भारी निश्वास छोड़कर फिर कहा, "पाप-पुण्य का विचार करने वाले जाने तुम्हारा क्या फ़ैसला करेंगे, लेकिन मृत्यु के बाद फिर कहीं मिलना हुआ तो मैं तुमसे दूर हर्गिज न रह सकूँगा।"

इस अवसर पर चन्द्रमुखी विह्वल होकर मन ही मन प्रार्थना करने लगी कि "कभी किसी जन्म में अगर इस पापिन का प्रायश्चित्त हो तो हे भगवान मुझे यही पुरस्कार देना।"

देवदास को आभास हो चुका था कि वह कुछ ही दिनों का मेहमान है, उसकी हालत गिरती जा रही थी। शराब ने उसे खोखला कर दिया है, उसे कई तरह के रोगों ने जकड़ लिया है, ऐसी स्थिति में वह चन्द्रमुखी से अंतिम बार विदा हो रहा था। चन्द्रमुखी के यह पूछने पर कि "फिर कब भेंट होगी?" देवदास ने कहा, "यह तो नहीं कह सकता, मगर जीते जी तुमको भूलूँगा नहीं, तुमको देखने की प्यास मिटेगी नहीं।" प्रणाम करके चन्द्रमुखी हट गई। मन ही मन बोली – "मेरे लिए यही बहुत है। इससे ज़्यादा की आशा नहीं करती।"

जाते समय देवदास, चन्द्रमुखी को और दो हज़ार रुपये देकर कहता है, "इन्हें रख लो। मनुष्य के शरीर का क्या ठिकाना! आख़िर को मझधार में डूबोगी?"

जैसे जैसे उपन्यास अंत की ओर बढ़ता जाता है देवदास के जीवन की त्रासदी तीव्र से तीव्रतर होती जाती है। वह अपने मन में चन्द्रमुखी के निश्छल और निस्वार्थ प्रेम के प्रति नतमस्तक हो जाता है। उसे भी चन्द्रमुखी से प्रेम हो जाता है। किन्तु उसे उस पतनोन्मुख मानसिक अवस्था में भी पार्वती के लाज और स्वाभिमान की चिंता बनी रहती है। उसे पार्वती के प्रेम पर विश्वास है। वह परोक्ष रूप से भी पार्वती के प्रेम की रक्षा करना चाहता है, किन्तु उसकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी।

देवदास के शरीर को शराब ने क्षत-विक्षत कर दिया था तो उसकी आत्मा को उसकी कायरता, भीरुता और अनिश्चय ने रौंद डाला था। उसने स्वयं अपनी आत्मा का हनन किया था। जीवन के अंतिम क्षणों में वह अपने ही किए हुए का प्रायश्चित्त करना चाहता था किन्तु उसके पास इसका कोई उपाय नहीं था। वह सारा जीवन पार्वती को अपने ही हाथों खो देने के मर्मांतक दुःख और पीड़ा से मुक्त नहीं हो सका और न ही पार्वती को भूल सका था।

देवदास, चन्द्रमुखी के पास से धर्मदास के साथ चुन्नीलाल का पता लगाकर उससे मिलने लाहौर चला जाता है। वहाँ कुछ समय रहने के उपरांत इलाहाबाद, पटना, काशी आदि शहरों में घोर अशांति और व्याकुलता के बीच भटकने के बाद वह बंबई में धर्मदास के साथ एक साल गुज़ार देता है। भादों के महीने में एक दिन सवेरे धर्मदास के कंधे का सहारा लेकर देवदास बंबई के अस्पताल से निकलकर गाड़ी पर बैठता है। धर्मदास उसे माँ के पास चलने की विनती करता है। लेकिन देवदास माँ को शर्म से अपना मुँह नहीं दिखाना चाहता।

"देवदास की दोनों आँखें छलछला उठीं। इधर कई दिनों से माँ की बेहद याद आ रही थी। अस्पताल में पड़े पड़े देवदास यही सोचता रहा, दुनिया में उसके सब हैं, मगर कोई नहीं। माँ हैं, बड़े भाई हैं, बहन से भी बढ़कर पार्वती है, चन्द्रमुखी है; उसके सभी हैं पर वह किसी का नहीं।"

देवदास की काया स्याह हो गई थी। शरीर में हड्डियाँ ही शेष रह गई थीं, आँखें एकबारगी धँस गई थीं, सिर्फ़ एक अस्वाभाविक चमक चेहरे पर विद्यमान थी। माथे के बाल रूखे और छिछले, चाहे तो गिन लिए जाएँ। हाथ की उँगलियाँ देखकर घृणा होती- एक तो दुबली, फिर घिनौने रोग के दाग पड़े हुए थे।" स्टेशन पहुँचकर धर्मदास ने देवदास से पूछा – कहाँ का टिकट कटाऊँ? सोच विचार कर देवदास बोला, "चलो घर चलें, फिर देखा जाएगा।" वे हुगली का टिकट लेकर गाड़ी में सवार हुए। धर्मदास उसके पास ही रहा। देवदास बुखार से बेहोश पड़ा रहा। उसे कहीं भीतर से विश्वास हो गया कि अब उसका अंत निकट आ गया है। गाड़ी जब पंडुआ स्टेशन पर पहुँची, सवेरा हो रहा था। सारी रात बारिश होती रही। देवदास उठकर खड़ा हुआ। धर्मदास नीचे सो रहा था। देवदास ने हल्के-हल्के उसके ललाट का स्पर्श किया, शर्म से उसे जगा न सका। उसके बाद दरवाज़ा खोलकर धीरे-धीरे गाड़ी से उतर पड़ा। गाड़ी सोए हुए धर्मदास को लेकर चली गई। थरथराते हुए वह स्टेशन से बाहर आया। वह पार्वती के गाँव हाथीपोता पहुँचाना चाहता था। उसने एक बग्घीवाले से पूछा – भैया हाथीपोता ले चलोगे? बरसात में बग्घी उस रास्ते नहीं जा सकेगी कहकर बग्घी वाले उसे बैलगाड़ी से जाने की सलाह देते हैं। एक बैलगाड़ी वाला उसे हाथीपोता ले जाने के लिए तैयार हो जाता है लेकिन वह कहता है कि दो दिन लगेंगे। रास्ता बहुत दुर्गम और बीहड़ था। देवदास अपने मन में विचारने लगा कि क्या वह दो दिन तक जीवित रह सकेगा? लेकिन उसे किसी हाल पार्वती के पास जाना ही पड़ेगा। उसे अंतिम दिन के लिए पार्वती को दिए वचन को निभाना ही था। चाहे जैसे हो उसे अंतिम दर्शन देना ही था। लेकिन उसे अपने जीवन की लौ बुझती हुई प्रतीत हुई, जिसका उसे डर था।

जीवन के शेष क्षणों में एक और स्नेह और आत्मीयता से भरा कोमल मुखड़ा अत्यंत पवित्र सा होकर उसे दिखाई पड़ा, यह मुखड़ा था चन्द्रमुखी का। जिसे पापिन कहकर वह सदा घृणा करता रहा, जो उसके लिए फूटफूटकर कर रोई थी, उसकी याद आते ही उसकी आँखों से आँसू झरने लगे। शायद बहुत दिनों तक उसे इसकी ख़बर भी न मिल सकेगी। रास्ता ठीक नहीं था। कहीं कहीं बरसात का पानी जम गया था, कहीं रास्ता टूट गया था, कीचड़ ही कीचड़ भरा पड़ा था। बैलगाड़ी चली तो कहीं-कहीं उतरकर गाड़ी के पहिये ठेलने की नौबत आई। जैसे भी हो सोलह कोस की दूरी तय करनी थी।

रास्ते में बारिश शुरू हो गई। बीच-बीच में बैलगाड़ी दलदल में फँस जाती तो गाड़ीवान के साथ देवदास भी उसी जर्जर अवस्था में उतरकर गाड़ी को दलदल से निकालने में मदद करता। सारा दिन चलने के बाद अँधियारी रात में बारिश और तेज़ हवा के थपेड़ों से गाड़ी में कराहते, खाँसते ख़ून उगलते हुए देवदास की अंतिम आशा किसी भी हाल प्राण रहते पार्वती की शरण में पहुँच जाना चाहता था। रात बढ़ती जाती है, थोड़ी-थोड़ी देर में देवदास क्षीण और करुण स्वर में गाड़ीवान से "और कितनी दूर है भैया" कहकर पूछता रहता। वह गाड़ीवान से मनुहार करता – "जल्दी पहुँचा दो भैया, तुझे काफ़ी रुपए दूँगा। उसके जेब में सौ रुपये का एक नोट था। उसको दिखाकर बोला, एक सौ रुपये दूँगा, पहुँचा दो।"

दिन भर गाड़ी चलती रही। बारिश होती रही। देवदास रह-रहकर गाड़ीवान से कराहते हुए डूबती आवाज़ में गाँव की दूरी पूछता जाता है। शाम होते-होते देवदास की नाक से लहू टपकने लगा। जी जान से उसने नाक को दबाया, फिर लगा कि दाँत के बगल से भी ज़हरीला लहू निकल रहा है, साँस लेने – छोड़ने में भी कष्ट महसूस हो रहा है। उसने हाँफते हुए पूछा- "और कितनी दूर है भैया?"

गाड़ीवान बोला, "बस दो कोस और। रात के दस बजे तक पहुँच जाऊँगा। देवदास ने बड़ी मुश्किल से रास्ते की तरफ़ देखते हुए कहा, "भगवान"! गाड़ीवान ने पूछा, "ऐसा क्यों कर रहे हैं बाबूजी?"

देवदास इसका जवाब न दे सका। गाड़ी चलने लगी, और रात दस की बजाए बारह बजे हाथीपोता के ज़मींदार भुवन चौधरी की हवेली के सामने चौतरा वाली पीपल के नीचे गाड़ी जा लगी। गाड़ीवान ने आवाज़ दी "बाबूजी उतरो।" कोई आवाज़ नहीं। फिर पुकारा, फिर कोई जवाब नहीं। उसे डर लगा। उसने मुँह के पास लालटेन ले जाकर पूछा, "सो गए, क्या बाबूजी?" देवदास देख रहा था। होंठ हिलाकर कुछ बोला। क्या बोला, समझ में नहीं आया। गाड़ीवान ने फिर पुकारा- "बाबूजी।" देवदास ने हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन न उठा सका। आँखों से सिर्फ आँसू की दो बूँदें ढुलक पड़ीं। गाड़ीवान ने अपनी अक़्ल लगाई। पीपल के चौंतरे उसने पुआल का बिछावन लगाया, और बड़ी मुश्किल से देवदास को गाड़ी पर से उतारकर उस पर सुला दिया। बाहर कोई न था। ज़मींदार का सारी हवेली सोयी पड़ी थी। देवदास ने किसी तरह से सौ रुपये वाला नोट निकालकर दिया। लालटेन की रोशनी में गाड़ीवान ने देखा कि बाबू ताक रहे हैं, पर बोल नहीं पाते। रात भर गाड़ीवान लालटेन की रोशनी में देवदास के पाँव के पास बैठा रहा।

सुबह होते ही उजाले में ज़मींदार के घर से लोग बाहर निकले और पीपल के चौतरे पर पहुँचे तो देखा कि एक भला आदमी जिसके बदन पर कीमती ऊनी चादर, पाँव में कीचड़ से सने महँगे जूते, उँगली में नीले नग की अंगूठी, धारण किए हुए दम तोड़ रहा था। डॉक्टर, ज़मींदार, उनका बेटा महेंद्र और गाँव वाले सभी इकट्ठा हो कर उस बेबस, बेज़ुबान, मरणासन्न व्यक्ति को घेरे खड़े हो जाते हैं। सबके मुँह से आह निकलती है। भीड़ में से कोई दया करके मुँह में बूँद भर पानी डाल देता है। देवदास ने एक बार उसकी ओर करुणा दृष्टि से देखा और आँखें मूँद लीं। कुछ देर और ज़िंदा था, फिर सब कुछ ख़त्म। इस तरह देवदास पार्वती के चौखट पर ही दम तोड़ देता है, वह पार्वती तक पहुँचकर भी उसे नहीं देख पाता। यह उसकी नियति थी।

लाश की शिनाख़्त की जाती है, पुलिस की जाँच-पड़ताल करके उसे ताल सोनापुर का देवदास घोषित कर देती है। महेंद्र और भुवन बाबू दोनों वहाँ मौजूद थे। महेंद्र कहता है कि यह छोटी माँ के मैके का है। वह अपनी माँ पार्वती को बुलाना चाहता है किन्तु भुवन बाबू उसे फटकार कर रोक देते हैं।

ब्राह्मण लाश थी, फिर भी गाँव के किसी ने छूना नहीं चाहा। देवदास की लावारिस लाश को गाँव के डोम उठाकर ले गए और किसी सूखे पोखर के किनारे अधजला डाल दिया। कौए, गिद्ध, सियार लाश को नोच-नोचकर छीना झपटी करने लगे। यही देवदास का करुण और दुर्भाग्यपूर्ण अंत था। एक हारे हुए प्रेमी का अंत। हवेली में पार्वती अपनी नौकरानी से, हवेली के द्वार पर ताल सोनापुर के देवदास नामक व्यक्ति की मृत्यु की ख़बर सुनती है तो वह बेतहाशा दौड़ती हुई हवेली के बाहर दौड़ती हुई मूर्छित होकर गिर पड़ती है। मूर्छा टूटने पर वह उन्माद की अवस्था में सिर्फ़ इतना पूछती है कि "रात में वे आए थे न? सारी रात.... "।

पार्वती के आगे के हाल के बारे में जानने और बताने की तनिक भी इच्छा लेखक को नहीं है। उपन्यास की अंतिम पंक्तियाँ देवदास को लेखक की करुणापूरित श्रद्धांजलि है। लेखक पाठकों से इस प्रकार निवेदन करता है–

"आप लोग जो भी इस कहानी को पढ़ेंगे, हम जैसे ही दुःखी होंगे। फिर भी अगर देवदास जैसे बदनसीब, असंयमी और पापी से कभी परिचय हो जाए तो उसके लिए प्रार्थना कीजिए कि और चाहे जो भी हो, उसके जैसी मौत किसी की न हो। मरने का कोई दुःख नहीं, लेकिन कोई स्नेह स्पर्श उस समय उसके ललाट तक पहुँचे, एक भी करुणा-विगलित, स्नेहमय मुखड़ा देखते हुए उस जीवन का अंत हो। मरते वक़्त जिससे वह किसी की आँख में आँसू की एक बूँद देखकर मर सके।"

देवदास उपन्यास की रचना शरतचंदर ने सन् 1901 में कर दी थी। यह उपन्यास उन्हें कदाचित प्रिय नहीं था। उनकी दृष्टि से इस उपन्यास में कई दोष थे। देवदास, पात्र के प्रति भी वे बहुत आश्वस्त नहीं थे, क्योंकि इसके नायक (देवदास) में चारित्रिक दृढ़ता का अभाव था और साथ ही यह एक आत्महंता शराबी पात्र था जिसके प्रति पाठक वर्ग की संवेदना का अनुमान लगाना कठिन था। इसीलिए शरत ने इस उपन्यास को महत्व नहीं दिया। किन्तु सन् 1917 में इस उपन्यास की पाण्डुलिपि उनके मित्रों के हाथ लगी जो उसी वर्ष प्रकाशित हुई। शरत को इस उपन्यास की अपेक्षा "चरित्रहीन" और "श्रीकांत" अधिक प्रिय थे। शरत के देवदास के प्रति विमुखता का एक कारण यह भी हो सकता है कि देवदास का स्वभाव और चरित्र दोनों, शरत के अपने स्वभाव और व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता। शरत जुझारू, निर्भीक और दृढ़-निश्चयी थे। उन्होंने संकटग्रस्त पतित स्त्रियों को हृदय से अपनाया था। उन्होंने प्रथम पत्नी के मरणोपरांत दूसरा विवाह किया, दोनों ही विवाह उन्होंने संकटग्रस्त असहाय स्त्रियों की रक्षा और उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने के लिए किए थे और सुखी और सुदीर्घ वैवाहिक जीवन जिया।

देवदास का सिनाई रूपान्तरण :

"देवदास " उपन्यास ने फ़िल्म जगत को इसके प्रकाशन काल से ही न केवल अभिभूत किया बल्कि इसे फ़िल्म के रूप में रूपांतरित करने के लिए भी प्रेरित किया। भारतीय सिनेमा के आरंभिक दौर में उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों पर आधारित कथाओं पर ही फ़िल्म निर्माण की स्वस्थ परंपरा रही है। इसी क्रम में शरचन्द्र की कालजयी कृति "देवदास" पर भी दर्जनों फ़िल्में बनी हैं। "देवदास" उपन्यास 1917 में पहली बार बांग्ला में छपा था हालाँकि शरतचंदर ने इसे 1901 में ही लिख लिया था, इसीलिए इसमें 1900 ई. के आरंभ का सामाजिक परिवेश चित्रित हुआ है। प्रकाशन के दस साल बाद, सन् 1928 में पहली बार नरेश मित्र के निर्देशन में इस पर एक फ़ीचर फ़िल्म बनी, जो मूक थी। तब से अब तक "देवदास" उपन्यास पर आधारी सोलह फ़िल्में बंगाली और हिंदी ही नहीं असमिया, तेलुगु, तमिल, उर्दू आदि में बन चुकी हैं। यह एक साहित्यिक कृति की शक्ति है जो हर युग के फ़िल्मकारों की पहली पसंद और चुनौती भी रही है। सन् 2010 में इकबाल कश्मीरी ने पाकिस्तान में और हाल ही में बांग्लादेश में भी चाशी नज़रुल इस्लाम ने इस पर फ़िल्म बनाई। वर्तमान युवा पीढ़ी के फ़िल्मकारों में सन् 2002 में संजयलीला भंसाली ने "देवदास" निर्देशित किया। जिसमें निर्माता-निर्देशक ने अपने ढंग से सामयिक सामाजिक परिवेश के अनुकूल, मूलकथा में परिवर्तन करके पार्वती के बरक्स चन्द्रमुखी के चरित्र को उभारने का प्रयास किया। दर्शकों ने इसे पसंद किया और इसकी तकनीकी पक्ष को सराहा। रंगीन प्रारूप में भव्य और महँगे सेटों के सहारे शास्त्रीय नृत्य शैली में चन्द्रमुखी के पात्र को अधिक विस्तार देकर इसे मनोरंजक ही बनाया गया। इसी साल शक्ति सामंत ने 76 वर्ष की उम्र में बंगाली भाषा में "देवदास" बनाई। इस कृति ने हिंदी फ़िल्मों के युवा निर्देशक अनुराग कश्यप को भी आकर्षित किया और उन्होंने सन् 2009 में "देव डी" बनाई। दरअसल शरतचंदर का नायक देवदास पिछले 100 सालों से हर काल खंड में हर वर्ग को आकर्षित करता रहा है।

देवदास एक सीधी-सादी प्रेमकथा है, लेकिन अपने कारुणिक अंत से वह सबका दिल छू लेती है। हिंदी में इस प्रेमकथा को नरेश मित्र ने 1927 में, पी सी बरुआ ने 1935 में, बिमल रॉय ने 1955 में संजयलीला भंसाली ने 2002 में, और अनुराग कश्यप ने 2009 में इसे फ़िल्म में रूपांतरित किया। यह भी ग़ौरतलब है कि देवदास उपन्यास का हिंदी अनुवाद पी सी बरुआ की फ़िल्म प्रदर्शित होने के बाद प्रकाशित हुआ। 1935 में पीआईआई सी बरुआ के देवदास का छायांकन बिमल रॉय ने किया था। बिमल रॉय ने बीस साल बाद 1955 में अपनी देवदास बनाई। इस देवदास के लिए बिमल रॉय ने नवेन्दु घोष से पटकथा (स्क्रीन-प्ले) लिखवाई और राजेंद्रसिंह बेदी से संवाद। बंगाल के ग्रामाञ्चल की विश्वसनीयता के लिए एस डी बर्मन के संगीत को चुना। पीसी बरुआ के "देवदास" को कुन्दन लाल सहगल, जमुना और राजकुमारी ने पर्दे पर पुन:सृजित किया, वहीं बिमल रॉय ने देवदास के पात्र के लिए दिलीप कुमार, पार्वती के लिए सुचित्रा सेन और चन्द्रमुखी के लिए वैजयंतीमाला का चयन किया। सन् 1979 में बंगाली में दिलीप रॉय के निर्देशन में सौमित्र चटर्जी, सौमित्रा मुखर्जी और सुप्रिया चौधरी के साथ देवदास का निर्माण किया गया।

शरत के उपन्यास देवदास का तेलुगु अनुवाद, तेलुगु भाषियों में अत्यंत लोकप्रिय हुआ। यह प्रकाशन काल में और कालांतर में भी आज तक साहित्य और सिनेमा प्रेमियों की पहली पसंद है और सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है। इसके अनगिनत संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और आज भी यह लोकप्रिय कथा साहित्य की श्रेणी में अग्रगण्य है। सन् 1953 में (26 जून 1953) में तेलुगु के सुविख्यात निर्माता डी एल नारायण और वेदांतम राघवैया के सशक्त निर्देशन में "देवदासु" नाम से फ़िल्म बनी जिसे तमिल में भी ध्वन्यांतरित (डब्बिंग) किया गया। इस फ़िल्म के पटकथा भी लेखक भी वेदांतम राघवैया ही थे। इस फ़िल्म की प्रमुख भूमिकाएँ अक्कीनेनी नागेश्वर राव (देवदास), सावित्री (पार्वती) और ललिता (चन्द्रमुखी) ने निभाई थीं। इस फ़िल्म का संगीत सी आर सुबबुरामन और विश्वनाथन-राममूर्ति ने दिया था। इस फ़िल्म की अवधि 190 मिनट है। भारतीय सिनेमा में तेलुगु में निर्मित "देवदास" का एक विशेष स्थान है और इसने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इस फ़िल्म की अनेकों विशेषताओं में कलाकारों का अभिनय कौशल, काथानुकूल गंभीर और दार्शनिक संवेदनाओं से भरपूर मर्मस्पर्शी संगीत से सजे गीतों की शृंखला और सशक्त संवाद प्रमुख हैं। ध्यातव्य है कि तेलुगु भाषा में देवदास का निर्माण हिंदी के बिमल रॉय के देवदास (1955) से पहले हुआ था। अकसर लोग हिंदी और तेलुगु के "देवदास" फ़िल्मों की तुलना करते हैं। सभी ने हिंदी से अधिक तेलुगु – देवदास को पसंद किया और सराहा है। कहा यह भी जाता है कि स्वयं अभिनय सम्राट दिलीप कुमार ने तेलुगु के कथानायक अक्कीनेनी नागेश्वर राव के अभिनय से प्रभावित हुए थे और उनके अभिनय की खुलकर प्रशंसा की। सन् 1974 में तेलुगु सिनेमा के प्रयोगधर्मी अभिनेता जी कृष्णा ने अपने ही बैनर तले पत्नी (अभिनेत्री) विजय-निर्मला के निर्देशन में तेलुगु में पुन: देवदास का निर्माण किया जिसमें मुख्य भूमिकाओं में क्रमश: कृष्णा स्वयं, विजय-निर्मला और जयंती ने अभिनय किया। यह फ़िल्म बुरी तरह विफल हुई। इसे दर्शकों ने नकार दिया।

हिंदी (बिमल रॉय) और तेलुगु (वेदांतम राघवैया) भाषाओं में निर्मित देवदास की तुलना करने पर यह स्पष्ट दिखाई दे जाता है कि अभिनय कला की दृष्टि से अक्कीनेनी नागेश्वर राव ने देवदास के पात्र को तेलुगु देवदास में जिस रूप में सहज रूप में जीवंत कर दिया वैसी स्वाभाविकता दिलीप कुमार के अभिनय में नहीं दिखाई देती। उनमें कृत्रिमता का पुट स्पष्ट दिखाई देता है। पटकथा भी तेलुगु में बहुत ही सशक्त है, हिंदी की तुलना में। संवादों में गहराई और गंभीरता के साथ-साथ देवदास की निराशावादी नियतिवादी दार्शनिकता फ़िल्म को गहन रूप से गंभीर बना देती है। अन्नीनेनी नागेश्वर राव ने स्वयं को इस भूमिका के लिए ढाल लिया था।

किन्तु यह तुलनात्मक भेद हिंदी और तेलुगु दोनों फ़िल्मों के दर्शकों को ही आभास होगा। तेलुगु फ़िल्म के सारे गीत बहुत ही अर्थगर्भित और निराशावादी दार्शनिकता को लिए हुए हैं। हिंदी फ़िल्म की गति भी अपेक्षाकृत धीमी है जब कि तेलुगु में यह गति धीमी होते हुए भी रोचकता को बनाए रखती है। आज भी तेलुगु भाषी दर्शक देवदास को पुन: पुन: देखने के इच्छुक दिखाई देते हैं। यह एक कालजयी फ़िल्म के रूप में तेलुगु सिनेमा जगत में ख्याति प्राप्त कर चुकी है।

शरत के उपन्यास देवदास की तुलना जब फ़िल्मों से की जाती है तो कई परिवर्तनों की ओर ध्यान आकर्षित होता है। चन्द्रमुखी के पात्र को फ़िल्मों में नर्तकी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। वह अपने नाच-गाने से मनचले अमीर पुरुषों का दिल बहलाती है। उपन्यास के विस्तार को फ़िल्म में समेट लिया गया है। जैसे चन्द्रमुखी के देवदास के गाँव ताल सोनापुर जाने का प्रसंग फ़िल्म मे नहीं शामिल किया गया वैसे ही देवदास की यात्राएँ, लाहौर, बंबई, इलाहाबाद, पटना, काशी आदि जगहों में उसके भटकाव को भी शामिल नहीं किया गया है। भाषिक अनुवादों में स्थानों और पात्रों के नामों में परिवेशगत परिवर्तन किए गए हैं जो कि अनुवाद को सार्थक और प्रभावशाली बनाते हैं। शरतचंद्र के कथ्य का पी सी बरुआ (हिंदी), बिमल रॉय (हिंदी) और वेदांतम राघवैया (तेलुगु) में सफलतापूर्वक निर्वाह किया है और फ़िल्म में उपन्यास के कथानक को ही संक्षेप में फ़िल्माया है। संवेदनाओं और भावनाओं की अभिव्यक्ति को उभारने के लिए सिनेमा माध्यम में पार्श्व संगीत और गीतों की आवश्यकता होती है। इन सभी फ़िल्मों में देवदास पार्वती और चन्द्रमुखी के मनोभावों अंतर्द्वंद्वों और मानसिक पीड़ा को परदे पर प्रभावशाली बनाने के लिए पार्श्व संगीत के साथ सार्थक गीतों को प्रभावशाली पृष्ठभूमि के साथ फ़िल्माया गया है। वास्तव में देवदास उपन्यास पर बनी फ़िल्मों ने देवदास उपन्यास को सभी भारतीय भाषाओं में लोकप्रियता प्रदान की। शरतचंद्र को अपनी रचना देवदास के प्रति चाहे जैसी भी भावना रही हो किन्तु भारतीय साहित्य में "देवदास" उपन्यास और इस पर बनी फ़िल्में चिरकालिक प्रसिद्धि और लोकप्रियता को प्राप्त हुई।

आधार ग्रंथ :

1 विष्णु प्रभाकर कृत आवारा मसीहा
2 शरतचंद्र कृत देवदास


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