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ISSN 2292-9754

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02.15.2016


चीन के कृषक जीवन की त्रासदी "द गुड अर्थ"

"पर्ल एस बक" विश्व की बीसवीं शताब्दी की विश्व विख्यात साहित्यकार हैं। इन्हें सन् 1938 में साहित्य का नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनकी अंग्रेज़ी में रचित कालजयी कृति "द गुड अर्थ" को सन् 1932 का पुलित्ज़र पुरस्कार के लिए चुना गया। यह पर्ल एस बक द्वारा सन् 1931 में रचित चीनी किसान जीवन की त्रासद गाथा है। "द गुड अर्थ" उपन्यास की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यह आज भी समूचे विश्व में हर साहित्य प्रेमी की पहली पसंद है। "पर्ल बक" (पर्ल कंफ़र्ट साइडेंस्ट्रिकर) का जन्म 26 जून 1892 में हिल्सबरो, पश्चिम वर्जिनिया, अमेरिका हुआ था। उनके पिता एब्स्लोम साइडेंस्ट्रिकर कट्टर ईसाई धर्मावलम्बी मिशनरी थे। मिशनरी के काम के लिए उन्हें चीन में तैनात किया गया था। मिशनरी के काम से छुट्टी लेकर वे अमेरिका आए थे। जन्म के बाद नवजात शिशु के लेकर पर्ल के माता-पिता अपने काम पर चीन लौट गए। 1896 में साइडेंस्ट्रिकर परिवार कियाङ्सू प्रांत के चिनकियांग नामक छोटे से पोर्ट शहर में रहने लगा। पर्ल बक ने इसी छोटे से शहर की संकरी गलियों में खेलते-कूदते बचपन बिताया। उसकी चीनी नर्स उसे बुद्ध और टाओ की कहानियाँ सुनाया करती थी और उसकी ट्यूटर उसे क्लासिकल चीनी भाषा सिखाती थी। उसकी माँ ने पर्ल को अंग्रेज़ी साहित्य से परिचय कराया और उसे लेखन की ओर प्रोत्साहित किया। सन् 1900 में छिड़े बॉक्सर आंदोलन में चीन में बसे विदेशियों और ईसाई मिशनरियों पर चीनी राष्ट्रवादियों द्वारा जब हमले शुरू हुए तो साइडेंस्ट्रिकर परिवार सुरक्षा के लिए कुछ समय तक शांघाई और फिर अमेरिका में रहकर चीन के अस्थिर और अशांत राजनीतिक माहौल एवं पश्चिमी देशवासियों के प्रति चीनियों विद्वेष के बावजूद चीन लौट आया। स्कूली शिक्षा शांघाई में प्राप्त कर 1910 में पर्ल ने अमेरिका में कॉलेज की शिक्षा पूरी की। सन् 1914 में वह अपनी बीमार माँ की देखभाल करने के लिए चीन आ गई। 1917 में पर्ल ने कृषि विशेषज्ञ "जॉन लोसिंग बक" से विवाह किया और वे दोनों उत्तरी चीन प्रांत में रहने लगे। पर्ल बक का ध्यान उस प्रदेश के जनजीवन में व्याप्त उदासी, अभाव और संघर्ष की ओर आकर्षित हुआ। उसने वहाँ के किसानों के संघर्षपूर्ण जीवन को समझने का प्रयास किया। चीनी लोकजीवन के प्रति गहरी संवेदनाओं ने ही उन्हें "द गुड अर्थ" उपन्यास लिखने को प्रेरित किया। पर्ल बक ने चीनी समाज की समस्त संवेदनाओं को आत्मसात कर लिया था। चीन में प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियाँ अत्यंत क्लिष्ट और विषम थीं। चीन और जापान के मध्य शत्रुता के कारण चीन को सामरिक और राजनयिक दृष्टि से बहुत कष्ट झेलना पड़ा था। चीन और अमेरिका, जापान के विरुद्ध मैत्री संबंध रखते थे। चीन की आर्थिक स्थिति गंभीर रूप से कमज़ोर थी। चीन का किसान सूखे से उत्पन्न अकाल और महामारी का शिकार होकर त्राहि त्राहि कर रहा था। चीन में साम्यवादी विचारधारा और शासन तंत्र के बढ़ते प्रभाव से विचलित होकर सन् 1935 में पर्ल बक अमेरिका लौट आईं। अमेरिका लौटने के बाद भी एशियाई समाज और संस्कृति ही उनके लेखन के केन्द्र में रही। राजनीतिक विश्लेषकों ने "द गुड अर्थ" उपन्यास को चीन-अमेरिका के राजनयिक संबंधों को प्रभावित करने वाली कृति के रूप में वर्णित किया। ऐसा माना जाता है कि इस कृति से जापान के विरुद्ध चीन और अमेरिका की मैत्री प्रगाढ़ हुई। उस समय तक एशिया में अमेरिका का प्रभाव नगण्य था। द गुड अर्थ में वर्णित चीनी परिस्थितियों ने अमेरिकी पाठकों में चीनी समाज के प्रति विशेष सहानुभूतिपूर्ण संवेदना जगाई। अमेरिका ने एशिया महाद्वीप में अपने वर्चस्व को स्थापित करने की दिशा में सोचना आरंभ कर दिया। "द गुड अर्थ" उपन्यास ने चीन के भीतर की अशांति, गृहयुद्ध, राजनीतिक उथल-पुथल और वहाँ घटित अकाल की भीषण विनाश लीला से संसार को अवगत कराया।

"द गुड अर्थ" का औपन्यासिक फ़लक अति विशाल और सुविस्तृत है। यह मूलत: वैंग लंग नामक एक चीनी किसान परिवार के संघर्ष और उतार-चढ़ाव की महागाथा है। उपन्यास का आरंभ वैंग लंग के विवाह से होता है। वैंग-लंग अपने गाँव के ह्वांग नामक एक ज़मींदार की हवेली में काम करने वाली ओलन नामक सुंदर दासी विवाह कर लेता है। दुर्व्यसनों के कारण ह्वांग अपनी सारी संपत्ति खोकर ऋणग्रस्त हो जाता है। वैंग लंग अपनी कड़ी मेहनत और श्रमशील पत्नी ओलन की मदद से पैसे जुटाकर ह्वांग की ज़मीन ख़रीद लेता है। ओलन तीन बेटों और तीन बेटियों को जन्म देती है। चीन में सूखे से भयानक अकाल पड़ता है। अन्न के अभाव और कुपोषण के कारण बड़ी लड़की मानसिक विकलांग हो जाती है। इस कारण वैंग लंग अपनी इस मानसिक विकलांग बेटी से सबसे ज़्यादा प्यार करता है। ओलन अपनी दूसरी बेटी को जन्म के समय ही मार डालती है ताकि सूखे और अकाल में परिवार के शेष लोगों को कुछ अन्न प्राप्त हो सके। सूखे के कारण अन्न के अभाव से लोग भूख से तड़प तड़प कर मरने लगते हैं। जब वैंग के घर में अन्न का एक कण भी नहीं बचाता तो ओलन बच्चों के लिए सूखे पेड़ की जड़ें पकाती है। सूखे और अकाल से पीड़ित लोग काम और अन्न की तलाश में अपने गाँवों को छोड़कर जाने लगते हैं।

वैंग लंग भी घर और ज़मीन के अतिरिक्त अन्य सामान अपने चाचा को बहुत कम दामों में बेचकर पत्नी और बच्चों समेत अत्यंत दीन अवस्था में सुदूर शहर की ओर चल पड़ता है। वह पहली बार धुआँ उड़ाती रेलगाड़ी देखता है जो पैसे लेकर मुसाफ़िरों को दक्षिणी प्रांत के किसी शहर को ले जा रही थी। शहर पहुँचकर वैंग लंग के बच्चे सड़कों पर भीख माँगते हैं और वैंग लंग सड़कों पर हाथ-रिक्शा चलाकर परिवार की भूख मिटाता है। वैंग लंग का पिता भी भीख माँगता फिरता है और कौतूहल से शहर को निहारता रहता है। शहर में वैंग लंग और उसकी पत्नी स्वयं को शहरवासियों से अलग-थलग पाते हैं। शहरवासियों के तौर-तरीक़े और बोल-चाल की शैली उनसे पूरी तरह भिन्न दिखाई देती है। वे उस शहरी वातावरण में स्वयं को अजनबी महसूस करते हैं। अपनी थोड़ी सी कमाई के अतिरिक्त शरणार्थी शिविरों से प्राप्त अन्न से वे अपना पेट भरते रहते हैं। दरिद्रता और भूखमरी के बीच उसे गाँव की याद सताती है। शहर में फौजी जवानों द्वारा पकड़े जाने का डर उन्हें सताता रहता है, इसीलिए वैंग लंग रात के समय माल ढोने का काम करता था। एक बार उसका बेटा कहीं से माँस चुराकर लाता है। वैंग लंग बेटे के इस कारनामे से क्रोधित होकर उसका लाया हुआ माँस उससे छीनकर फेंक देता है। किन्तु ओलन चुपके से उस माँस को लाकर पकाकर परिवार को खिलाती है। वैंग लंग उस दरिद्र अवस्था में बेटे को चोर नहीं बनने देना चाहता था। उन दिनों शहर में सड़कों पर रोज अन्न के लिए लूटमार और दंगे फसाद हुआ करते थे। वैंग लंग भी मजबूर होकर लूटमार की भीड़ में शामिल हो जाता है। वह एक धनी व्यक्ति को लूट लेता है, वह धनी व्यक्ति अपनी जान बचाने के लिए उसके पास का सारा पैसा वैंग लंग को दे देता है। उसी लूटमार में ओलन को भी एक धनिक के घर में बहुमूल्य हीरे ज़मीन पर पड़े मिलते हैं। वह उसे अपने सीने में छिपाकर वहाँ से भाग खड़ी होती है। रास्ते में उसे सैनिक पकड़ लेते हैं। सेना के जवान लुटेरों को पकड़ कर सड़क पर ही गोली मार देते थे। संयोग से ओलन सैनिकों की गिरफ़्त से बच जाती है। वैंग लंग भाग्यवश प्राप्त इस धन को लेकर अपने गाँव लौट आता है। वह गाँव पहुँचकर खेती करने के लिए बैल और अन्य सामान ख़रीदता है। वह खेती में काम करने के लिए मज़दूरों को लगाता है।

ओलन को मिले हुए हीरों वैंग लंग ज़मींदार ह्वान की हवेली और उसकी सारी ज़मीन ख़रीद कर अमीरों का जीवन प्रारम्भ कर देता है। वैंग लंग अपने बच्चों को स्कूल भेजता है और एक बेटे को कृषि के लिए अपने साथ रख लेता है। अकस्मात धनी होकर वैंग लंग भोग-विलास में डूबने लगता है। वह लोटस नाम की एक नर्तकी के मोहजाल में फँस कर पत्नी ओलन की अवहेलना करता जाता है और फिर एक दिन उससे दूर हो जाता है। वह नर्तकी लोटस के प्रेम में पड़ कर अपना दांपत्य जीवन नष्ट कर लेता है। ओलन के पास बचे हुए हीरों को वैंग लंग उससे माँग कर प्रेमिका लोटस को भेंट कर देता है। इससे ओलन दुःखी हो जाती है। वह धीरे-धीरे टूटने लगती है और अंत में वह उपेक्षित होकर दीन अवस्था में चल बसती है। मृत्यु से पहले वह अपने बड़े बेटे का विवाह कर देती है। ओलन की मृत्यु से वैंग लंग दुःखी हो जाता है, तब उसमें पत्नी के प्रति प्रेम और पश्चाताप का भाव जागता है।

वैंग लंग वृद्धावस्था में पहुँचकर ओलन की याद में एकांत जीवन व्यतीत करना चाहता है, किन्तु उनके बेटों में संपत्ति के लिए घमासान छिड़ जाता है। उपन्यास के अंत में वैंग लंग को पता चलता है कि उसके बेटे उसके घर और ज़मीन को बेच देने की योजना बना रहे हैं। वह अपनी ज़मीन से अलग नहीं होना चाहता था किन्तु वह अब कुछ नहीं कर सकता था। उसकी असहाय और करुण स्थिति में ही उपन्यास का अंत होता है। किसान का धन उसकी धरती ही होती है। किसान को उसकी धरती से जब बेदख़ल किया जाता है तब उसका जीवन बिखर जाता है। लेखिका ने उपन्यास के शीर्षक को सार्थकता प्रदान की है। "गुड अर्थ" एक प्रतीक है जो धरती को ही किसान की जीवन-शक्ति घोषित करती है। इस उपन्यास में सूखा और अकाल धरती से जुड़ी आपदाएँ हैं जिस कारण किसान और समूचा समाज भुखमरी के संकट में पड़ जाता है और समाज में अराजकता फैल जाती है।

"द गुड अर्थ" उपन्यास चीन के समूचे युग का इतिहास प्रस्तुत करता है।

पर्ल बक ने द गुड अर्थ के कथानक एवं पात्रों के माध्यम से तत्कालीन चीन के निम्न एवं शोषित वर्ग के संघर्ष को यथार्थता के साथ वर्णित किया है। लेखिका ने चीन में व्याप्त धार्मिक कट्टरता, नस्लवादी भेदभाव, स्त्रियों का शोषण, यौन उत्पीड़न तथा असमर्थ दीन दुखियों के प्रति शासनतंत्र के भेदभाव पूर्ण व्यवहार के प्रति गहरा रोष और प्रतिरोध प्रकट किया है। "पर्ल बक" ने इस उपन्यास का लेखन चीन के नैनकिंग नगर में रहते हुए एक वर्ष (1929) में पूरा किया। इस कृति की टंकित पांडुलिपि और अन्य संबंधित दस्तावेज़ सन् 1952 में न्यूयॉर्क स्थित अमेरिकन अकेडेमी ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स के संग्रहालय में प्रदर्शित की गई। वहाँ से यह पाण्डुलिपि अचानक ग़ायब हो गई जिसका उल्लेख लेखिका ने अपने संस्मरणों (1966) में किया है। सन् 1973 में पर्ल बक की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने इसके चोरी होने की पुष्टि की। सन् 2007 में फिलाडेल्फिया के एक निलाम घर ने इस पाण्डुलिपि की नीलामी की घोषणा की जिससे अमेरीकी पुलिस हरक़त में आई और इसे अपने अधीन कर लिया।

चीनी कृषक जीवन के संघर्ष पर आधारित इस महान उपन्यास को फ़िल्म के पर्दे पर उतारना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। उपन्यास के प्रकाशित होने के एक वर्ष के भीतर ही डोनाल्ड और ओवेन डेविस नामक लेखकद्वय ने इसका नाट्य रूपान्तरण किया। यह नाट्यकृति 1933 में ब्रॉडवे थियेटर में प्रदर्शित की गई जो कि बहुत लोकप्रिय हुई। इसे देखकर ही इर्विंग टेलबर्ग ने इसे फ़िल्म के रूप में प्रस्तुत करने का संकल्प कर लिया जो कि सन् 1937 में साकार हुआ। फ़िल्म के लिए सशक्त पटकथा लेखन का कार्य टेलबट जेनिंग्स, टेस स्लेसिंजर और क्लोडिन वेस्ट नामक तीन लेखकों ने किया। उपन्यास के विशाल फ़लक के अनुरूप ही फ़िल्म का भी फ़लक उतना ही सुवस्तृत और विशाल रखा गया। फ़िल्म में उपन्यास की मूलकथा को ही प्रस्तुत किया गया जब कि उपन्यास में कई प्रासंगिक कथाएँ भी मौजूद हैं। फ़िल्म मूलत: वैंग लंग और ओलन एवं उनके परिवार के संघर्ष और दुखों को ही प्रस्तुत करती है। इस फ़िल्म का निर्देशन सिडनी फ्रैंकलिन, विक्टर फ्लेमिंग और गुस्टाव मेकाटी नामक तीन निर्देशकों ने किया था। फ़िल्म में पॉल म्यूनी (वैंग लंग) और लुईज़ रायनर (ओलन), चार्ली ग्रेपविन (वैंग लंग के पिता), टिल्ली लोश (वेश्या-लोटस), वाल्टर कोनोली (वैंग लंग के मामा) ने अपने अभिनय कौशल से फ़िल्म को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया। विशेषकर दर्शक पॉल म्यूनी और लुईज़ रायनर के अभिनय से अभिभूत हो गए और विश्व भर में इनके अभिनय कौशल को सराहा गया। ओलन की चीनी भूमिका को एक अमेरिकी अभिनेत्री लुईज़ रायनर ने अविश्वसनीय रूप से साकार कर दिखाया। वास्तव में लुईज़ रायनर मूलत: जर्मन अभिनेत्री थी। हॉलीवुड (अमेरिका) में आने से पहले वह यूरोप में रंगमंच की सुप्रसिद्ध कलाकार थी। शेक्सपियर और बर्नार्ड शॉ के नाटकों की नायिकाओं की भूमिकाओं के लिए वह प्रसिद्ध हो चुकी थी।

उपन्यास का फ़िल्मी रूप बहुत ही मार्मिक और करुण बन पड़ा है जिसे देखकर दर्शकों के मन में पात्रों के प्रति भावुकता उभर आती है और आँसू बहाने लगते हैं। उपन्यास में वर्णित सूखे और अकाल को दिल दहला देने वाले दृश्यों में फ़िल्मकार ने दर्शाया है। अपने मृत बेटे की देह एक कुत्ते के मुंह में देखकर वैंग लंग दहाड़ मारकर रोता है। दर्शकों की संवेदना को ध्यान में रखते हुए इस दृश्य को फ़िल्म से हटा लिया गया। भूख की वेदना से त्रस्त बच्चों के लिए अपने घर में बँधे हुए भैंस को काट कर खाने के अन्य कोई उपाय नहीं था। मनुष्यों द्वारा मनुष्यों को खाने के समाचार मिल रहे थे। वैंग बच्चों की भूख मिटाने के लिए अपने ही पाले हुए भैंस को काटने के लिए छुरा लेकर बाड़े में आता है। भैंस की निरीह दयनीय आँखों में भरे पानी को देखकर उसे दया आ जाती है। वह दहाड़ मारकर रोने लगता है। परंतु अपने छोटे-छोटे बच्चों को बचाने के लिए कोमल हृदय की ओलन बहुत कठोर बन जाती है। वह वैंग के हाथों से छुरा लेकर भैंसे की हत्या कर देती है। ऐसे हृदय विदारक दृश्यों का फिल्मांकन फ़िल्म कला की दृष्टि से विलक्षण है। भोली-भाली दयालु प्रकृति की ओलन समय आने पर जिस तरह निर्दयी और कठोर बनाने वाली ओलन की भूमिका को लुईज़ रायनर ने अपने अद्भुत अभिनय कौशल से एक नई ऊँचाई प्रदान की है। फ़िल्म में उपन्यास में वर्णित घटनाओं को विस्तार से चित्रित किया गया है जो कि घटनाओं के प्रभाव को द्विगुणित करता है। फ़िल्म में उपन्यास के प्रसंग जीवंत हो उठे हैं। शहर का रूप बादल रहा था। क्रान्ति के बिगुल बज रहे थे। लेकिन क्रान्ति का सही अर्थ किसी को मालूम नहीं था। क्रान्ति के नाम पर लूटमार और अराजकता फैली थी। बाज़ार और दूकानों के साथ संपन्न लोगों की हवेलियाँ लूटे जाने लगे। भयंकर भूख की आग ने वैंग को भी चोर बना दिया। लूटपाट की आशा में ओलन भी भीड़ में घुसती है । एक बड़े राजप्रासाद में, हज़ारों लोग लूटने के लिए घुसते हैं। चारों ओर भगदड़ मचाती है और उसमें ओलन नीचे गिर जाती है। उसे रौंदते हुए लोग निकल जाते हैं। वह बेहोश हो जाती है। फ़िल्म में भगदड़ का दृश्य दर्शकों में भय और रोमांच पैदा करता है। इसे निर्देशन कौशल का अद्भुत नमूना माना गया है। इसका फिल्मांकन दर्शकों को चकित कर देता है। ओलन को जब होश आता है तो उसका नसीब बदल जाता है। उसके सामने भागदौड़ में किसी का गिरा एक बटुआ पड़ा होता है। उसमें अमूल्य हीरे होते हैं।

वह घबराते घबराते उस बटुए को सीने में छुपा लेती है। उसी समय उसे सैनिक पकड़ लेते हैं। सैनिक दंगाइयों को खंभों से बाँधकर गोलियों से मार रहे थे। संयोग से ओलन को छोड़ कर चले जाते हैं। इसके बाद वैंग अपने बच्चों सहित लूट का धन लेकर गाँव लौटता है। इस धन से वह नया जीवन शुरू करता है। वैंग के विलासी जीवन का चित्रण फ़िल्म को यथार्थता प्रदान करता है। उसका लोभी और मक्कार चाचा उसे दुर्व्यसनों में ड़ुबा देता है। वही वैंग को लोटस नामक सुंदर नर्तकी के पास ले जाता है। संपत्ति के नशे में चूर मदमस्त वैंग लोटस को अपने घर में लाकर रख लेता है। उसके लिए बाग़-बग़ीचे बनवा कर उसे ऐशो-आराम देता है। वैंग के इस व्यवहार से ओलन दुःखी और चिंतित रहने लगती है। वह अपने ग़रीबी के दिनों को ही इससे बेहतर मानती है। ओलन अपने चरित्रहीन पति और बच्चों की चिंता में डूब जाती है। लोटस वैंग के बड़े लड़के को भी अपने जाल में फाँस लेती है। यह प्रकरण फ़िल्म में अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है। फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण उपन्यास में वर्णित खड़ी फ़सल पर टिड्डी दल का हमला है। खेतों में खड़ी फ़सल पर विशाल आकार में टिड्डी दल का आक्रमण फ़िल्म का सबसे रोमांचक दृश्य है। अपनी फ़सल बचाने के लिए वैंग लंग गाँव वालों को लेकर घर से बाहर निकलता है। उसके आलस्य और विलास से शिथिल शरीर को पुन: मिट्टी की हूक सुनाई देती है। गाँव पर होने वाले घातक टिड्डी दल के आक्रमण का बारह मिनट तक चलने वाले इस दृश्य का फ़िल्मांकन सिनेमा के इतिहास में एक नवीन प्रयोग था। गाँव के पास की पहाड़ी की ओर से काले घुप्प बादलों जैसे लाखों टिड्डे उड़ते आते हैं। उनकी काली छाया सारी फ़सल पर पसर जाती है। फ़सल को नष्ट करते हुए उड़ते टिड्डी दल को भगाने के लिए गाँव वाले कई उपाय करते हैं। आग जलाते हैं, खड्डे खोदकर पानी उसमें भर कर रखते हैं, किन्तु अंत में हवा के रुख के बदलते ही तेज़ हवाएँ टिड्डी दल को उड़ाकर ले जाती है। टिड्डी दल को भगाने में कामयाब होने से वैंग लंग यशस्वी होता है। लेकिन ओलन रोग शय्या पड़ी-पड़ी चल बसती है। उसकी मुट्ठी में जकड़े हुए दो अमूल्य मोती नीचे गिर जाते हैं। थका हारा वैंग लंग अपने खेत में आता है। मुट्ठी भर मिट्टी हाथ में लेकर वह भर्राए गले से कहता है – “ओलन तुम ही मेरी सच्ची धरती माता हो।" ओलन की भूमिका के लिए लुईज़ रायनर को उस वर्ष, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। श्वेत-श्याम प्रारूप में निर्मित इस फ़िल्म की सिनेमाटोग्राफी उच्च कोटि की है। चालीस के दशक में हॉलीवुड में भी सिनेमा फोटोग्राफी बहुत विकसित अवस्था में नहीं थी परंतु इस फ़िल्म में बाहरी और भीतरी दृश्यों का फिल्मांकन बेजोड़ तरीक़े से किया गया। मानवीय संवेदनाओं को उभारने में फ़िल्म की प्रभावशाली सिनेमाटोग्राफी सहायक सिद्ध हुई।

हिंदी फिल्मों के महान निर्माता-निर्देशक महबूब खान ने "द गुड अर्थ" फ़िल्म से ही प्रेरित होकर पहले "औरत" फिर "मदर इंडिया" फ़िल्मों का निर्माण कर हिंदी सिनेमा की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया था। बिमल रॉय द्वारा निर्मित "दो बीघा ज़मीन" फ़िल्म पर भी "द गुड अर्थ" की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मदर इंडिया भारत की पहली फ़िल्म थी जिसे "ऑस्कर पुरस्कार" के लिए नामित किया गया था। "द गुड अर्थ" उपन्यास और फ़िल्म, दोनों में अद्भुत साम्य है। साहित्य और सिनेमा, दोनों प्रारूपों में कथा का निर्वाह एक समान हुआ है। फ़िल्म निर्माता ने फ़िल्मी रूपान्तरण में औपन्यासिक कथा वस्तु में कोई भी परिवर्तन नहीं किया और उसे मौलिक रूप में सविस्तार प्रस्तुत किया गया है। "द गुड अर्थ" फ़िल्म ने विश्व सिनेमा जगत में एक नया इतिहास रचा। आज भी यह एक अमर क्लासिक फ़िल्म के रूप में याद की जाती है।


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