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ISSN 2292-9754

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03.27.2015


द्वितीय महायुद्ध में नस्लवादी हिंसा का दस्तावेज़ : शिन्ड्लर्स लिस्ट

मानव सभ्यता के इतिहास में दो दुर्दम्य विश्वयुद्ध मानवता के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध का इतिहास मनुष्य की बर्बरता और नस्लवादी पैशाचिकता से युक्त नरमेध का कलंकित इतिहास है। संसार के सबसे कुख्यात और बर्बर तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर के उत्थान और पतन की गाथा विश्व इतिहास में अविस्मरणीय है। जर्मनी, यूरोप का एक छोटा सा देश जिसने चालीस के दशक में समूचे विश्व को अपनी क्रूरता और हैवानियत से दहला दिया था। हिटलर, जर्मनी का एक क्रूर अति-राष्ट्रवादी सेना नायक और स्वयंभू राष्ट्राध्यक्ष था। जर्मन जाति को वह संसार की सर्वश्रेष्ठ ‘आर्य नस्ल’ मानता था। उसके मन-मस्तिष्क में यह धारणा स्थायी रूप से घर कर गई थी कि जर्मन नस्ल की पवित्रता को यहूदी जाति अपवित्र कर रही है। इसीलिए उसे यहूदी नस्ल से अकल्पनीय घृणा और हिकारत थी। वह पृथ्वी पर से यहूदी नस्ल को मिटा देना चाहता था। सर्वप्रथम वह यूरोप को यहूदी मुक्त करना चाहता था। वह जर्मनी में बसे यहूदियों को अपने देश के पतन और पराजय का कारण मानता था। वह हर उस आर्येतर नस्ल को दुनिया से ख़त्म कर देना चाहता था जो जर्मन राष्ट्र की अस्मिता को प्रभावित करते हैं। उसकी महत्त्वाकांक्षा समस्त यूरोप को जर्मनी के अधीन कर उस पर तानाशाही शासन स्थापित करने की थी। द्वितीय महायुद्ध के दौरान वह यूरोप के विजित राष्ट्रों से यहूदियों को छाँटकर उन्हें अज्ञात ठिकानों पर ले जाकर, हिंसक तरीकों से मौत के घाट उतार देता था। उसके बाद उनकी लाशों के अंबार को आग में जला देता था। कालांतर में जब यह नरमेध बहुत बड़े पैमाने पर होने लगा तो उसने लाशों के अंबारों को जल्द से जल्द जलाकर भस्म कर डालने के लिए, विद्युत भट्टियाँ निर्मित कीं। इसमें हज़ारों की तादाद में लाशों को एक साथ भस्म कर, राख को आसपास के प्रदेशों में बिखेर दिया जाता था। हिंसा का यह घिनौना कृत्य गुप्त यातना शिविरों में युद्ध के अंत तक चलता रहा।

शिन्ड्लर्स लिस्ट उपन्यास एक ऐसे ही कुख्यात यातना शिविर की दारुण, करुण और हैरतंगेज़ सत्य कथा है। यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। इसमें उल्लिखित घटनाएँ सन् 1940 से 1945 के मध्य द्वितीय महायुद्ध के दौरान घटित हुईं थीं। हिटलर ने अपने अत्यंत विश्वासपात्र नरमेध विशेषज्ञ सेनानी ‘हिमलर’ को सारे यूरोप के यहूदी समुदाय को नेस्तनाबूद करने का काम सौंपा था। ‘हिमलर’ एक दुर्दांत, कठोर और खूंखार हिंसात्मक प्रवृत्ति का नर रूपी राक्षस था, जो निर्दोष स्त्री-पुरुष और बच्चों का कत्ल कराने में पैशाचिक आनंद प्राप्त करता था। उसने जर्मन सेनाओं द्वारा विजित यूरोपीय प्रदेशों में लगभग बाईस कुख्यात यातना शिविरों को स्थापित किया था जिसमें अंधेरे बंद कमरों में ज़हरीली गैस छोड़कर लोगों को मार डाला जाता था, फिर उनकी लाशों को विद्युत शवदाह गृहों में भस्म कर दिया जाता था। इस कुकृत्य के लिए विशेष सैनिक दस्ते तैयार किए गए थे। यह सारा नरमेध गुप्त रूप से सुदूर घने जंगलों में स्थापित यातना शिविरों में सम्पन्न किया जाता था। इस क़त्लेआम की भनक बाहरी दुनिया को युद्ध के अंत तक नहीं मिली। ऐसे कुख्यात यातना शिविरों में सबसे भयानक कत्लखाना पोलैंड में स्थित ‘आशविट्ज’ का माना जाता है, जहाँ सोलह लाख यहूदियों को गैस कोठरियों में मौत के घाट उतारा गया जिनमें 27 यूरोपीय देशों के यहूदी शामिल थे। ट्रिब्लिंका, रीगा, डाखा और सेक्सेन होजन आदि कुख्यात क़त्लगाह यूरोप के विभिन्न प्रदेशों में गुप्त रूप से युद्ध के दौरान यहूदियों का क़त्ल कर कर रहे थे। इस मामले में हिटलर का ख़ुफ़िया तंत्र इतना मज़बूत था की बाहरी दुनिया को इस नर मेध की भनक भी नहीं लगने दी गई।

हिटलर के वफ़ादार हत्यारे सेना नायकों में हिमलर के अलावा, हाइड्रिच, रोशमेन, गोबेल्स, रूडाल्फ हेस आदि प्रमुख थे जिन्हें यहूदियों को मारने के विशेष अधिकार प्राप्त थे। इनके नाम से ही लोग काँप उठते थे। हिटलर ने सेना भीतर एक और सेना को संगठित किया था जिन्हें किसी को भी ख़त्म करने एवं गिरफ़्तार करने का अधिकार हासिल था। इस फौजी दस्ते से हर कोई ख़ौफ़ खाता था। इन्हें एसएस फोर्स कहा जाता था। हिमलर इसी एसएस दस्ते का कमांडर था। एसएस सैनिक अफसर सीधे हिटलर से संपर्क रखते थे और वे हिटलर के सबसे वफ़ादार फौजी बल थे। ये सारे सैनिक बर्बरता और निर्ममता के लिए कुख्यात थे। इनकी कल्पना से ही जन-समुदाय थर्रा जाता था। इन एसएस सैनिकों को ही जर्मनी और पड़ोस के विजित प्रान्तों से यहूदियों को एकत्रित करने का काम सौंपा गया था।

द्वितीय महायुद्ध की विभीषिका और विध्वंस विषयक साहित्य को ‘हालोकॉस्ट लिटरेचर’ अर्थात विध्वंस का साहित्य कहा जाता है। 30 अप्रैल 1945 को हिटलर की आत्महत्या से द्वितीय महायुद्ध समाप्त हुआ। पराजित जर्मन सेना ने मित्र-राष्ट्रों (इंग्लैंड, रूस, अमेरिका) की सम्मिलित सेना के आगे आत्म-समर्पण कर दिया। जर्मनी की करारी हार से आधुनिक जगत में एक नए युग का प्रारम्भ हुआ। युद्ध समाप्त होते ही गुप्त यातना शिविरों में बंद लाखों यहूदियों को मित्र राष्ट्र की सेनाओं ने मुक्त कर दिया। इन यातना शिविरों से जीवित बचे हुए लोगों की लोमहर्षक दास्तानें ‘हालोकॉस्ट लिटरेचर’ (विध्वंस का साहित्य) के रूप में दुनिया के सामने आईं। हिटलर के यातना शिविरों में सबसे बड़ी संख्या में पोलैंड के यहूदी मारे गए थे। हिटलर का सबसे बड़ा और सबसे कुख्यात यातना शिविर ‘आशविट्ज’ पोलैंड में ही ‘क्रेकोव’ शहर के निकट आशविट्ज नामक गाँव में स्थित है। युद्ध की समाप्ति से पहले ही जर्मन फौजों को पराजय का अनुमान होते ही वे इन यातना शिविरों को ध्वंस करके भाग खड़े हुए। बड़ी संख्या में एसएस साइंक अफसरों को गिरफ्तार कर उन पर ‘मानवता विरोधी अपराधों’ (क्राइम्स अगेन्स्ट ह्यूमेनिटी) के लिए न्यूरमबर्ग शहर में विशेष अदालतों का गठन करके उन्हें फांसी की सज़ा दी गई। इस जाँच को ‘न्यूरमबर्ग ट्रायल्स’ कहा जाता है। बहुत सारे एसएस फौजी अफसर किसी तरह भाग कर दक्षिण अमेरेकी देशों में भेष बदलकर रहने लगे। आज भी उन भगोड़ों की तलाश जारी है।

पोलैंड में स्थित ‘आशविट्ज’ का यह क़त्लगाह जर्मन फौजों के अमानुषी अत्याचारों का साक्षी बनकर आज तक खड़ा है। अभी तक आशविट्ज में जलाए हुए लाखों शवों की दुर्गंध वहाँ की हवाओं में व्याप्त है। यह सारा प्रदेश उसी भयावहता को समेटे हुए दग्ध शवों के बिखरे राख़ से आप्लावित है। यहाँ मारे गए लोगों के सामान, संदूकें, कपड़े, जूते, चश्मे, सिर के बाल, घड़ियाँ आदि शिविर के कमरों में बंद पड़े हैं।

आधुनिक यूरोपीय साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा ‘द्वितीय महायुद्ध के विध्वंस की घटनाओं और युद्ध के विभिन्न मोर्चों पर घटी घटनाओं के वृत्तान्तों से भरा पड़ा है। विशेषकर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस पोलैंड, चेक गणराज्य, सर्बिया, हंगरी, बुल्गारिया, रोमानिया और जर्मनी के रचनाकारों ने विपुल मात्रा में एक ओर मानव संहारक युद्ध विरोधी साहित्य की रचना की है तो दूसरी ओर द्वितीय महायुद्ध में घटित यहूदी संहार के इतिहास को भी रचा है। कार्नीलियस रेयॉन द्वारा रचित राईज़ एंड फॉल ऑफ थर्ड राईख, हरमन वाऊख द्वारा रचित वार एंड रिमेम्बरेंस, विंस्टन चर्चिल द्वारा रचित हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड वार टू (द्वितीय महायुद्ध का इतिहास) आदि महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं। द्वितीय महायुद्ध में जर्मन यातना शिविरों (कोंसट्रेशन कैंप) में बंधक यहूदियों के जीवन के अंतिम दिनों को चित्रित करने वाले उपन्यासों की संख्या बहुत अधिक है। यह एक पृथक औपन्यासिक विधा के रूप में यूरोप में पहचानी जाती है। महायुद्ध के विध्वंस साहित्य के कथाकारों में एलिस्टर मैकलीन, फ़्रेडरिक फोरसिथ, जैक हिग्गिंस, इर्विंग वेलेस आदि प्रमुख हैं।

इसी क्रम में एक आस्ट्रेलियाई लेखक ‘थॉमस केनेली’ द्वारा सन् 1982 में रचित उपन्यास ‘शिन्ड्लर्स आर्क’ ने साहित्य जगत में हलचल मचा दी। इस उपन्यास को बुकर पुरस्कार प्राप्त हुआ। गौरतलब है कि इस उपन्यास का अमेरिकी संस्करण ‘शिन्ड्लर्स लिस्ट’ के नाम से प्रकाशित हुआ और इसी नाम से विश्व में यह चर्चित हुआ।

शिन्ड्लर्स लिस्ट जर्मनी के गुप्त कत्लगाहों में जारी नरमेध की घटनाओं पर आधारित एक दिल दहला देने वाला ऐतिहासिक उपन्यास है। इस पर बनी फिल्म भी उतनी ही रोमाँचक और भयावह है। वैसे तो थॉमस केनेली द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या काफी है परंतु उन्हें विश्वख्याति ‘शिन्ड्लर्स आर्क अथवा शिन्ड्लर्स लिस्ट’ से ही प्राप्त हुई। थॉमस केनेली को इस उपन्यास को लिखने के लिए प्रेरित करने वाला शख्स था - पोल्डक फेफरबर्ग नामक एक यहूदी जो यातना शिविर से जीवित बच निकला था। पोल्डक फेफरबर्ग ने पोलैंड के यातना गृह में ऑस्कर शिन्ड्लर को यहूदियों को बचाने के प्रयास में देखा था। वह शिन्ड्लर के सहायक के रूप में काम कर चुका था। फेफरबर्ग ‘ऑस्कर शिन्ड्लर’ के जीवन को दुनिया के सामने लाना चाहता था। उसने कई अमेरिकी फ़िल्मकारों और टीवी से जुड़े लोगों को ऑस्कर शिन्ड्लर की कहानी बताने की कोशिश की थी किन्तु वह सफल नहीं हो सका था। फेफरबर्ग चाहता था कि जर्मन फौजों के द्वारा गुप्त यातना शिविरों में जो भीषण नर संहार हुआ है उसे वह प्रत्यक्ष साक्ष्य बनकर दुनिया के सामने लाए। वह ‘ऑस्कर शिन्ड्लर’ के उस मानवीय स्वरूप को लोगों को बताना चाहता था जिससे वह मसीहा बन गया।

सन् 1980 के अक्तूबर महीने में थॉमस केनेली लॉस एंजिलीस के बेवरली हिल्स की एक दुकान में कुछ चीज़ें खरीदने के लिए गया था। उस दुकान का मालिक फेफरबर्ग था। बातचीत के दौरान जब फेफरबर्ग को पता चला कि थॉमस केनेली एक उपन्यासकार है, तो उसने थॉमस केनेली की बाँह पकड़कर कॉन्सेंट्रेशन कैंप में गुज़रे हुए यातनामय दिनों की चर्चा करता है। साथ ही वह यहूदियों के संरक्षक ‘ऑस्कर शिन्ड्लर’ का ज़िक्र करता है जिसे वह दुनिया को दिखाना चाहता था। थॉमस केनेली को शिन्ड्लर से संबंधित दस्तावेज़ों को दिखाकर फेफरबर्ग उनसे ‘ऑस्कर शिन्ड्लर’ के जीवन पर उपन्यास रचने की प्रार्थना करता है। काफी लंबी चर्चा के बाद फेफरबर्ग, केनेली को इस काम के लिए मनाने में सफल हो गया। थॉमस केनेली ने इस कार्य को गंभीरता से लिया और उसने उपन्यास लेखन के लिए फेफरबर्ग को अपना मार्गदर्शक और सलाहकार बना लिया। केनेली ने फेफरबर्ग के साथ मिलकर पोलैंड के क्रेकोव और उससे जुड़े अन्य स्थलों को देखा और ऑस्कर शिन्ड्लर के जीवन से संबंधित अन्य सामग्री एकत्रित की। क्योंकि फेफरबर्ग स्वयं यातना शिविर में घटित की दर्दनाक नर संहार का प्रत्यक्ष साक्षी था, इसलिए केनेली को ‘शिन्ड्लर्स आर्क’ उपन्यास रचने में इससे बहुत सहायता मिली।

थॉमस केनेली ने ‘शिन्ड्लर्स आर्क’ उपन्यास को फेफरबर्ग को समर्पित किया है जिसकी सतत प्रेरणा और दृढ़ाग्रह से ही यह उपन्यास संभव हो सका।

‘शिन्ड्लर्स लिस्ट’ ऑस्कर शिन्ड्लर के जीवन पर आधारित उपन्यास है जो मुख्यत: द्वितीय महायुद्ध के विध्वंस के एक विशेष पक्ष को ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत करता है। इसके केंद्र में एक ओर हिटलर की यहूदी विध्वंसक सेना और उसके अफसरों की क्रूरता का आँखों देखा हाल है तो दूसरी ओर वह निरीह निर्दोष यहूदी समुदाय है जो इस जघन्यता का शिकार है। इन दोनों के बीच उपन्यास का कथा नायक ऑस्कर शिन्ड्लर है। उपन्यास का प्रतिनायक एमोन गोएट नामक एक अत्याचारी एसएस कमांडेंड है जिसे पोलैंड में ‘प्लाजोव’ नामक यातना शिविर के निर्माण का काम सौंपा गया है। हिटलर की सेनाएँ पोलैंड को अपने अधीन कर चुकी थी। विजित प्रदेश में हिटलर की एसएस फौज ने पोलैंड के शहरों और गाँवों से यहूदी लोगों की शिनाख्त कर उन्हें इतर जन समूहों से अलग कर दिया जाता है। यहूदियों को एक बाँह पर डेविड के सितारे का निशान धारण करना अनिवार्य था ताकि लोगों को उनके यहूदी होने का पता चल सके।

इन यहूदी समूहों को उनके घरों और इमारतों से खदेड़कर उन्हें शहर के एक हिस्से में विशेष रूप से निर्मित दड़बेनुमा तहख़ानों (घेट्टो) में ठूँस दिया जाता है। प्लाजोव में यातना शिविर के तैयार होते ही उन घेट्टो को खाली कराकर यहूदियों को प्लाजोव यातना शिविर में स्थानांतरित करने का काम प्लाजोव शिविर के कमांडेंड एमोन गोएट को सौंपा गया था। यहूदी समूह को रेलमार्ग से बिना हवा-पानी के मालगाड़ी के डिब्बों में बंद करके प्लाजोव लाया जाता है। उपन्यास में एमोन गोएट द्वारा प्लाजोव शिविर में उसकी दिनचर्या, उसके द्वारा बात-बात पर यहूदी कामगारों को अपने मनोरंजन और फितूर के लिए जब चाहे तब जहाँ चाहे वहाँ, उन पर गोलियाँ चलाकर उन्हें मार गिराना था। वह सुबह उठते ही अपने विला की बालकनी में खड़े होकर अंगड़ाइयाँ लेता हुआ नीचे शिविर में काम करने वाले यहूदी कामगारों पर राइफल से बेपरवाह गोलियाँ दागता रहता है।

एमोन गोएट के बरक्स ऑस्कर शिन्ड्लर है जो यातना शिविर में एसएस अफसरों के अत्याचारों के शिकार यहूदियों के प्रति सहानुभूति रखता है। शिन्ड्लर एक पूंजीपति कारोबारी है जिसकी रुचि युद्ध की स्थितियों में अपने कारोबार में अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहता है। वह सस्ती मज़दूरी के लिए युद्ध बंदियों से अपने कारखानों में काम कराता था। वह प्लाजोव में एक एनेमिल के बर्तनों का कारख़ाना स्थापित करता है और यातना शिविर में मौजूद यहूदियों को अपने कारखाने में काम पर रख लेता था। शिन्ड्लर के कारखाने में काम करने वाले मज़दूर यातना शिविर के अत्याचारों से कुछ समय के लिए बच जाते थे और उनकी मौत टल जाती थी। शिन्ड्लर अपने व्यापार और उद्योग के संचालन के लिए आयज़ाक स्टर्न नामक एक स्थानीय यहूदी को सहायक के रूप में नियुक्त कर लेता है। आयज़ाक स्टर्न, ऑस्कर शिन्ड्लर का विश्वासपात्र आत्मीय सेवक और मित्र की भूमिका निभाता है। स्टर्न भी अपनी ओर से कई लाचार बूढ़े यहूदी लोगों को फर्जी कागज़ात के आधार पर शिन्ड्लर के कारखाने में दाखिल करवाता है। वह शिन्ड्लर के लिए अत्यंत उपयोगी कर्मचारी की भूमिका अदा करता है। यहूदी समाज में स्टर्न के संपर्क अमीरों से भी थे। वह इन संबंधों से शिन्ड्लर के व्यवसाय के लिए धन लाता था। शिन्ड्ल्रर जर्मन अफसरों को भारी रक़म, महँगे शराब और अन्य प्रकार के कीमती उपहार देकर उनसे अपने कारखाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा यहूदी कैदियों को प्राप्त करता था। उन यहूदी स्त्री-पुरुषों को वह अपने कारखाने में मज़दूरी देकर उनकी अच्छी देखभाल करता था। इस कारण अधिक से अधिक यहूदी बंधक शिन्ड्लर के कारखाने की चारदीवारी में पहुँचना चाहते थे। ऑस्कर शिन्ड्लर अपने प्रभाव से जर्मन फ़ौजियों से ‘डायरेक्टर’ का पद हासिल कर लिया था। उसकी आवाज़ एसएस अफसर भी सुनते थे। उसका रुतबा दिनों दिन प्लाजोव में एमोन गोएट के दायरे में भी बढ़ने लगता है। एमोन गोएट महादुर्व्यसनी और ऐयाशी प्रकृति का निर्दयी व्यक्ति था। वह सनकी और ज़िद्दी स्वभाव का सिरफिरा एसएस अफसर था। उसे संतुष्ट करना बहुत मुश्किल था किन्तु शिन्ड्लर उसे अकूत धन देकर बहला-फुसलाकर ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में यहूदियों को अपने संरक्षण में ले जाने का प्रयास करता था।

जैसे ही प्लाजोव का शिविर तैयार हो जाता है तो घेट्टो में जी रहे यहूदी समूहों को प्लाजोव शिविर में ले जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। शिन्ड्लर जर्मन सैनिकों को स्त्री परुषों और बच्चों पर सड़कों पर और मकानों में घुसघुसकर गोलियाँ बरसाते हुए देखता है। दौड़ते, भागते स्त्रियाँ और नन्हें नन्हें बच्चों को गोलियों से भुनते हुए देखता है। हत्यारे सैनिकों की गोलियों से बचने के लिए औरतें और बच्चे मकानों के भीतर ऐसी स्थिति में छिपने के लिए बनाए गए अलमारियों, दीवारों के भीतर बनाए गए खोहों, पाखानों में मलमूत्र के भीतर घुसकर छिपने का यत्न करते हैं। छोटे-छोटे मासूम बच्चे दौड़ रहे हैं और उन पर पीछे से गोलियों की बौछार होती है।

परंतु उन सब जगहों पर जर्मन सैनिक अंधाधुंध गोलियाँ बरसाकर सबको हताहत कर देते हैं। जो कोई भी भागने या छिपने की कोशिश करता है उसे वहीं गोलियों से भूनकर रख दिया जाता है। अमीर घराने के लोग अपनी संपत्ति को जर्मन सैनिकों के हवाले कर उनके साथ निकल पड़ते हैं। हीरे और सोने की चीज़ों को वे मुँह में, दाँतों के नीचे दबाकर या शरीर के गुप्त अंगों में घुसाकर छिपा लेते थे। इन बेचारों को इस बात का थोड़ा भी अनुमान नहीं था कि उन्हें यातना शिविर की गैस-कोठरियों में ज़हरीली गैस के हवाले कर दिया जाएगा। गोएट अपने एसएस सैनिकों के साथ कभी-कभार अचानक शिन्ड्लर के कारखाने भी आ धमकता था और वहाँ मशीनों पर कार्यरत मज़दूरों के काम की जाँच करने लगता। उसे जो कामगार नहीं भाता उसे गोली मारकर चला जाता था। धीरे-धीरे शिन्ड्लर की सहानुभूति यहूदी बंधकों के प्रति बढ़ती जाती है। उसमें भारी परिवर्तन आता है और वह अब अपने मुनाफे से ज़्यादा यहूदी बंधकों को बचाने का अभियान शुरू कर देता है। आयज़ाक स्टर्न उसकी मदद करता है।

समय के साथ जर्मनी युद्ध में हारने लगता है। मित्रराष्ट्र की सेनाएँ कई मोर्चों पर जर्मन सेनाओं को बुरी तरह पराजित करती हैं। रूसी मोर्चे पर हिटलर की सेनाओं को करारी हार का सामना करना पड़ता है। जर्मनी को जब पराजय के संकेत मिलने लगते हैं तो वह एकाएक प्लाजोव के बंधकों को आशविट्ज के कुख्यात यातना शिविरों को स्थानांतरित करने के आदेश दिए जाते हैं। शिन्ड्लर को जैसे ही यह ख़बर मिलती है वह गोएट से अपने कार्मिकों को लेकर अपने गृहनगर ज़्विट्टो-ब्रिन्निट्ज में एक नया गोला-बारूद का कारख़ाना खोलने की अनुमति माँगता है। इसके लिए गोएट उससे बहुत भारी रकम की रिश्वत लेकर उसे अपने मज़दूरों को ले जाने की अनुमति दे देता है। शिन्ड्लर और स्टर्न दोनों मिलकर प्लाजोव से ज़्विट्टो-ब्रिन्निट्ज ले जाने वाले यहूदी कामगारों की सूची तैयार करते हैं। यही सूची ‘शिन्ड्लर्स लिस्ट’ कहलाती है। शिन्ड्लर के यहूदी कार्मिकों से भरी मालगाड़ी प्लाजोव से चल पड़ती है लेकिन गल्ती से यह गाड़ी ‘आशविट्ज’ पहुँच जाती है। तब शिन्ड्लर आशविट्ज के कमांडेंड को थैली भर अनमोल हीरों की रिश्वत देकर उस गाड़ी को ज़्विट्टो-ब्रिन्निट्ज़ ले जाने में सफल होता है। नई जगह पर वह एसएस सैनिकों को अपने कारखाने से दूर ही रखता है, उन्हें कारखाने में घुसने तक नहीं देता। वह यहूदियों को अपनी धार्मिक पद्धति से प्रार्थना की सुविधा मुहैया कराता है। अपने कारखाने के मज़दूरों को युद्ध के अंत तक जीवित रखने के लिए वह अपनी सारी कमाई और संपत्ति लगातार जर्मन अफसरों को रिश्वत के रूप में समर्पित करता ही रहता है। वह कारख़ाना वास्तव में कोई गोला बारूद अथवा किसी भी किस्म की युद्ध सामग्री नहीं तैयार करता है। कारखाने को सात महीनों तक शिन्ड्लर बिना किसी उत्पादन के यूँ ही चलाता है। वह जर्मन अफसरों को दिखाने लिए बाहर से विस्फोटकों के बाहरी ‘खोल’ (शेल) अन्य कंपनियों से खरीदता रहता है। सन् 1945 तक पहुँचते पहुँचते शिन्ड्लर की सारे संपत्ति ख़त्म हो जाती है, ठीक उसी समय जर्मनी पराजित होकर आत्मसमर्पण कर देता है। युद्ध का अंत हो जाता है।

नाज़ी पार्टी के सदस्य और युद्ध से मुनाफ़ा कमाने वाले कारोबारी के रूप में रूसी सेनाओं के हाथों में पड़ने से बचने के लिए शिन्ड्लर को अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से निकल भागना आवश्यक था। उस पराजय में भी जब एसएस सैनिक बचे हुए यहूदी बंधकों को मार डालना चाहते हैं तो शिन्ड्लर उन जर्मन सैनिकों को निर्दोष लोगों की हत्या के कलंक से बचने और मनुष्य के रूप में अपने परिवार में लौटने की सलाह देकर उन्हें विदा करता है। वह भी बचे हुए अपने मज़दूर यहूदियों से विदा लेना चाहता है। वह किसी अमेरिकी सैनिक ठिकाने पर जाकर आत्मसमर्पण कर देना चाहता था। कारखाने के यहूदी उनके जीवन को बचाए रखने वाले मसीहा को आँसुओं से नाम आँखों से भावभीनी विदाई देते हैं। विदाई के समय उस कारखाने का जेरेय नामक मज़दूर अपने सोने की दाढ़ उखाड़कर निकालता है। उसे पिघलाकर उसकी अँगूठी बनाता है। कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में वह अँगूठी शिन्ड्लर को भेंट की जाती है। उस पर हिब्रू भाषा में लिखी एक पंक्ति आयज़ाक स्टर्न पढ़ता है, और उसका मतलब शिन्ड्लर को बताता है, "जो कोई एक इंसान की जान बचाता है वह सारी दुनिया को बचाता है।" शिन्ड्लर चलते हुए अपने सहायक और मित्र स्टर्न को पकड़कर फूट-फूटकर रोता है और कहता है कि वह इससे भी अधिक करना चाहता था। दूसरी सुबह रूसी सेना वहाँ पहुँच जाती है और उन सभी बंधकों को आज़ाद होने का ऐलान करती है। वे यहूदी कारखाने से बाहर निकलकर पड़ोस के गाँव की ओर चल पड़ते हैं।

उपन्यास की कथा का इस प्रसंग के साथ अंत होता है। प्रस्तुत उपन्यास केवल ऑस्कर शिन्ड्लर की ही जीवनी मात्र नहीं है बल्कि यह क्रेकोव और उसके आसपास फैले हुए सैकड़ों ‘घेट्टो‘ में नारकीय जीवन बिताए यहूदी समूहों की भी है। यह प्लाजोव के कमांडेंड एमोन गोएट के जीवन को भी पूरी असलियत के साथ शीतरित करता है। युद्ध समाप्ति के बाद एमोन गोएट को फाँसी पर लटका दिया जाता है। ऑस्कर शिन्ड्लर का शेष जीवन आर्थिक संकट में बीत जाता है। वह पत्नी से अलग होकर फ्रेंकफ़र्ट एक छोटे से फ्लैट में रहने लगता है। किन्तु जर्मन लोगों के उसके प्रति नफ़रत भरे व्यवहार के कारण वह जीवन के अंतिम दिन इज़राइल में गुज़ारता है जहाँ 1974 में उसकी मृत्यु हो गई। उसे उसकी इच्छानुसार उसके मित्र पोल्डक फेफरबर्ग की सहायता से जेरूसलम में दफ़ना दिया गया।

शिन्ड्लर्स लिस्ट के प्रकाशन के पश्चात पोल्डक फेफरबर्ग ने ही हॉलीवुड के निर्माता निर्देशक ‘स्टीवेन स्पीलबर्ग को थॉमस केनेली के इस उपन्यास पर फिल्म बनाने के लिए राज़ी किया था। स्पीलबर्ग स्वयं यहूदी होने के कारण भावनात्मक रूप से उन घटनाओं से जुड़े थे। फेफरबर्ग स्पीलबर्ग की माँ से परिचित थे इसलिए उन्होंने इस परिचय का उल्लेख करते हुए स्टीवेन स्पीलबर्ग को ‘शिन्ड्लर्स लिस्ट’ फिल्म बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। फिर भी स्टीवेन स्पीलबर्ग प्रथम दृष्ट्या इस विषय पर फिल्म बनाने के उत्सुक नहीं थे क्योंकि वे यहूदी संहार के प्रकरण को भुला देना चाहते थे। अंतत: स्टीवेन स्पीलबर्ग ने पोल्डक फेफरबर्ग की प्रेरणा से थॉमस केनेली के उपर्युक्त उपन्यास को शिन्ड्लर्स लिस्ट के नाम से सन् 1993 में निर्मित किया हालाँकि इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की पहल फेफरबर्ग द्वारा सन् 1963 से ही चल रही थी। स्पीलबर्ग के तैयार होते ही हॉलीवुड के यूनिवर्सल स्टूडियो ने फिल्म बनाने के अधिकार उपन्यासकार से खरीद लिए। स्पीलबर्ग ने इस फिल्म को रंगीन न बनाकर श्वेत-श्याम रंग में बनाया है। इस फिल्म को वृत्तचित्रात्मक (डाक्यूमेंट्री) शैली में निर्मित किया गया क्योंकि इसकी विषयवस्तु मृत्यु और शोक से पूर्ण है। मृत्यु का कोई रंग नहीं होता, वह कालिमा लिए होती है। जीवन रंगीन होता है मृत्यु नहीं। यह फिल्म मृत्यु की भयावहता और कालिमा को दर्शाती है इसीलिए इसे रंगहीन काला-सफ़ेद जामा पहनाया गया है। स्पीलबर्ग का यह विचार अपने आप में चौंका देने वाला सच है। इसे युद्ध का शोक फिल्म कहना मुनासिब होगा। उपन्यास में वर्णित घटनाओं को यथावत फिल्माने के लिए पोलैंड के क्रेकोव शहर और उसके आसपास के इलाकों में विस्तार से बहत्तर दिनों तक इसकी शूटिंग चली। फिल्म में आशविट्ज में स्थित कॉन्स्ट्रेशन कैंप के वर्तमान परिसर को फिल्माया गया क्योंकि यहीं पर वे सारी दुर्दांत और लोमहर्षक घटनाएँ घटित हुई थीं। इस फिल्म की फोटोग्राफी विशेष महत्त्व रखती है। फिल्म के लिए आशविट्ज और प्लाजोव के यातना शिविरों में घटी हुई घटनाओं को पुन:सृजित किया गया। यह पुन:सृजन अत्यंत प्रभावशाली और स्वाभाविकता लिए हुए है।

विशेष तकनीक और फोटोग्राफी के द्वारा द्वितीय महायुद्ध काल के उस भयावह मृत्युबोधक वातावरण को प्रस्तुत किया गया है जो की दर्शकों के मन-मस्तिष्क पर प्रभाव डालता है। इस फिल्म के सिनेमाटोग्राफर सुविख्यात यानुस्ज़ कमिन्स्की हैं। कमिन्स्की इस फिल्म के चित्रांकन को कालातीत स्वरूप प्रदान करना चाहते थे। इस फिल्म के प्रमुख पात्रों के लिए निर्देशक स्पीलबर्ग ने बहुत सावधानी से कलाकारों और अभिनेताओं का चयन किया। ऑस्कर शिण्ड्लर के लिए उन्हें ऐसा चेहरा चाहिए था जो बड़ा स्टार न हो और जो साधारण सा दिखाई दे परंतु जो कद्दावर और प्रभावशाली हो। अंत में बहुत तलाश के बाद उन्होंने ब्रिटिश अभिनेता लियाम नीसन को ऑस्कर शिन्ड्लर के केंद्रीय पात्र के चुन लिया। शिन्ड्लर के सहायक आयज़ाक स्टर्न की भूमिका में बेन किंग्सले (गांधी की भूमिका जिन्होंने निभाई थी) ने बहुत ही स्वाभाविक अभिनय किया है। एमोन गोएट की भूमिका में हॉलीवुड के कठोर और निर्दयी चेहरे वाले रेल्फ फीनिस ने उस अत्याचारी एसएस कमांडेंट को पर्दे पर जीवित कर दिया है। इस पात्र की हिंसात्मक प्रवृत्ति के प्रति दर्शकों के मन में डर के साथ घोर नफ़रत और आक्रोश का भाव जागता है। इसमें सैकड़ों की संख्या में छोटे कलाकारों को शामिल किया गया। इस फिल्म के निर्माता मण्डल में स्टीवेन स्पीलबर्ग के साथ जेराल्ड आर मोलेन और ब्रेंकों लुस्टिग भी हैं। इस फिल्म की निर्माण लागत 22 मिलियन डॉलर है।

स्टीवेन स्पीलबर्ग ने फिल्म की अंतर्वस्तु में कोई परिवर्तन नहीं किया, उन्होंने उपन्यास को ही पूरी तरह से हूबहू उसी रूप में फिल्माया है। यह इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि और विशेषता है। चूँकि उपन्यास भी सच्ची घटनाओं को प्रस्तुत करती है इसलिए यह फिल्म ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन गया है। यह फिल्म एमोन गोएट के अत्याचारों को जिन दृश्यों में प्रस्तुत करती है वे बहुत ही मार्मिक और जुगुप्सा उत्पन्न करने वाले हैं। प्लाजोव शिविर में यहूदी औरतों और मर्दों को नंगा सामूहिक रूप से उनकी स्वास्थ्य जाँच की जाती है और स्वस्थ पुरुषों और स्त्रियों को काम पर लगाया जाता है जब कि रुग्ण और अस्वस्थ लोगों को पहले गैस कोठारी में भेज दिया जाता है। फिल्म में गैस कोठरियों से मरणोपरांत निकाले गए लाशों के अंबार को आग लगाने के दृश्य दिल को दहला देते हैं। उन लाशों को भी संगीनों से घोंप-घोंप कर किसी के भी जीवित न रह जाने की तसल्ली की जाती है। लाशों के अंबारों को आग लगाने वाले कैदियों को भी वहीं पीछे से गोली मारकर ढेर कर दिया जाता है और उनकी लाशों को भी उन्हीं लाशों के अंबार में धकेल दिया जाता है।

फिल्म का वह हिस्सा दर्शकों को भी भीतर तक जख़्मी कर जाता है, जहाँ एक माँ अपनी बच्ची को लेकर छिपने के लिए संडास के अंदर झाँकती है। तब पहले से वहाँ बैठी एक औरत चीखती है – "मैं केवल तुम्हारी बेटी को अंदर ले सकती हूँ, तुम्हें नहीं।" वह माँ अपनी बच्ची को उस औरत के हवाले करके चली जाती है और बाहर गोलियों की शिकार हो जाती है। माता-पिता जब अपने बिछुड़ते बच्चों के लिए चीखते-चिल्लाते हैं तो उन पर बर्बरतापूर्वक गोलियाँ बरसाई जाती हैं, प्लाजोव और आशविट्ज के यातनागृहों में घटी ये वारदातें मानवता को शर्मिंदा करने वाली हैं जिन्हें फ़िल्मकार ने निडर होकर दुनिया के सामने रखा है।

यातना शिविर में यहूदी समूह के आगे आगे जेनिया नाम की एक छोटी सी प्यारी सी लड़की लाल रंग का फ्रॉक पहने हुए चलती जा रही थी। केवल उस लड़की के फ्रॉक को ही फिल्म में लाल रंग का दिखाया है जब की शेष दृश्य सारे श्वेत-श्याम रंग में हैं। कुछ ही देर बाद लाशों को लेकर जाती हुई ठेला गाड़ी में लाशों के ढेर पर वह लाल फ्रॉक पड़ा हुआ दिखाया गया है। यह प्रतीकात्मकता दर्शकों को छू लेती है। फिल्म में शिन्ड्लर और गोएट के वार्तालाप भी बहुत प्रतीकात्मक और विशेष अर्थ को लिए होते हैं। एक बार एमोन गोएट से पूछता है कि "वे हमसे क्यों डरते हैं?" एमोन कहता है – "हमें उन्हें मार डालने का अधिकार है इसलिए!" शिन्ड्लर कहता है – "नहीं, तुम्हें उन्हें बिना बताए और बिना चेतावनी के मारने का अधिकार है इसलिए।"

हेलेन नामक अपनी युवा नौकरानी पर एमोन गोएट फ़िदा था किन्तु उस पर वह भयानक अत्याचार करता था, क्योंकि वह यहूदी थी। वह उसे किसी भी हाल में छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। एक बार शिन्ड्लर से हेलेन कहती है – "न जाने वह कब मुझे मारेगा। मुझे यह पता नहीं है कि वह मेरे किस काम के लिए मुझे छोड़ेगा और किस काम के न करने से मुझे मार डालेगा।" हर पल हेलेन गोएट के हाथों मारे जाने की आशंका में जीती रहती है। शिन्ड्लर्स लिस्ट वाली रेल जब रास्ता भटककर आशविट्ज पहुँच जाती है तो रेल के डिब्बों से झाँकती स्त्रियों को खिड़की के बाहर एक लड़का दिखाई देता है जो इशारे से अपने गले पर तिरछी उँगली चलाकर बताता है कि वहाँ उन्हें मार डाला जाएगा। इसी समय वहाँ उन्हें दूर से उठता हुआ घना काला दुर्गंधयुक्त धुआँ दिखाई देता है जो कि वहाँ के गैस चिमनियों से निकल रहा था। उस रेल से लोगों को उतारकर महिलाओं के बाल काटे जाते हैं, उन्हें नग्न कर एक बड़ी कोठारी में भर दिया जाता है। तब उन लोगों को गैस चैंबर का अनुमान होने लगता है। बिजली चली जाती है, घना अँधेरा छा जाता है। सभी महिलाएँ जान बचाने के लिए चीखने लगती हैं। एक दूसरे को चूमने लगती हैं, तभी उनके सिर पर पानी के फव्वारे फूटते हैं। उन्हें वहाँ से बाहर निकाल लिया जाता है। ऑस्कर शिन्ड्लर सही समय पर पहुँचकर उन्हें बचा लेता है। फिल्म में यह दृश्य दर्शकों को रोमाँच से भर देता है। हिटलर के यातना शिविरों में यहूदियों पर हुए अत्याचारों पर कुछ और फिल्में भी बहुचर्चित रहीं जिनमें प्रमुख हैं ‘डायरी ऑफ ऐन फ्रैंक, लाईफ इज़ ब्यूटीफुल और पियानिस्ट’।

फिल्म के अंत में कहानी के समाप्त होते ही दृश्य रंगीन हो जाता है जिसमें फिल्म के सभी कलाकार ‘ऑस्कर शिन्ड्लर’ की कब्र पर फूल चढ़ाते हुए दिखाई देते हैं। यह ऑस्कर शिन्ड्लर के प्रति एक भावनात्मक श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत की गई है।

शिन्ड्लर्स लिस्ट 30 नवंबर 1993 को रिलीज़ हुई और इसने दुनिया भर में हलचल मचा दी। उम्मीदों से कहीं अधिक इस फिल्म ने पैसा कमाया। प्रथम संस्कारण में इस फिल्म से 321 मिलियन डॉलर की कमाई हुई। इसे बारह श्रेणियों में ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामाँकित किया गया, जिनमें से इसे सात ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त हुए जिनमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म, निर्देशन, पटकथा, पार्श्व संगीत शामिल हैं। एक बार फिर स्टीवेन स्पीलबर्ग ने शिन्ड्लर्स लिस्ट जैसी आधुनिक युगीन ऐतिहासिक वृत्तचित्रात्मक फिल्म बनाकर अपने अभूतपूर्व निर्देशन कौशल से विश्व सिनेमा जगत को अचंभित कर दिया।

द्वितीय महायुद्ध की विभीषिका की पृष्ठभूमि में हिटलर की नस्लवादी नफ़रत और नरमेध से रूबरू होने के लिए यह फिल्म एक रोमाँचक अविस्मरणीय अनुभव है। इस फिल्म को देखने के लिए ठोस, साहसी, दिल और जिगर चाहिए।


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