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11.18.2007
 

राखी : छोटा सा रंग-बिरंगा धागा

एम.सी. कटरपंच

 आज सलूना का त्यौहार है, जिसे साधारणत: राखी का दिन अथवा रक्षाबंधन कहते हैं। यह एक ऐसा त्यौहार है, जिसकी किसी विशेष प्रांत अथवा क्षेत्र के लिये ही स्थानीय महत्व नहीं है, वरन्‌ समस्त भारत वर्ष के लिये यह स्थायी महत्व एवं उल्लास का दिन है। प्राय: प्रत्येक बहन अपने सभी छोट-बड़े भाई की कलाई में रक्षा सूत्र बाँधती है, जिसके रूप अनेक हैं और भाई अपने स्नेहमयी बहनों के प्रति श्रद्धावनत होकर रक्षा सूत्र की पृष्ठभूमि में एक शपथ लेते हैं, सदाचार, सद्‌व्यवहार और पवित्रता के उज्जवल धरातल पर वे किसी भी समय अपनी बहन की रक्षा पर तत्पर रहेंगे। इस राखी की साक्षी अपने महत्व को इस लंबे समय से अनवरत्‌ रूप से गुंजित करती आ रही है। व्यवहारिक रूप में राखी का इस पक्ष और जुड़ जाता है- भाई-बहन के पावन संबंध की शृंखला को स्वस्थ व सुदृढ़ संदर्भ में देखना।

दार्शनिक दृष्टिकोण से विचार करने पर राखी का एक छोटा सा धागा अपने कई अंगों को लेकर हमारे समक्ष उपस्थित होता है, जो स्वभावत: अपने प्रभाव को अधिक स्थायित्व प्रदान करता है। राखी का पीला डोरा सतोगुण का प्रतीक है और ज्ञान का सूचक। प्राचीनकाल में सन्यासी पीले (गेरुआ) वस्त्र धारण किया करते थे, जिनकी ज्ञान धारा आज भी यदा-कदा दृष्टिगत हो जाती है। ज्ञान का एक अन्य रूप प्रकाश भी है, जिसका रंग भी पीला होता है। ज्ञान कल्याणकारी रहता है। ज्ञानवान व्यक्ति हमेशा परोपकार के कार्यों में संलग्न रहता है। सूर्य की आलोकित पीली रश्मियाँ समस्त ब्रह्माण्ड को गर्मी और ऊर्जा प्रदान कर जीवन को विकसित करने में सहायक होती हैं। ज्ञान बुद्धि को प्रकाशित करता है और मस्तिष्क का स्वस्थ विकास भी। पीला रंग त्याग और बलिदान का भी प्रतीक है (मेरा रंग दे बसंती चोला)। रक्षाबंधन के दिन अपने भाई के हाथ में राखी का पीला धागा बांधकर बहन यह आशा करती है कि उसका भाई ज्ञानवान हो और समाज के हित में वह अज्ञान, अंधकार को दूर कर सतोगुणस्वरूप प्रकाशित करता रहे।

ज्ञान प्रतीक इस पीली राखी के बीच में लाल और हरे रंग की रुई भी लगी होती है, जो विभिन्नता का प्रदर्शन करके भारतीय संस्कृति के आवश्यक पहलू का उद्‌घाटन करती है। भारतीय संस्कृति एकरूपता में विश्वास नहीं करती। मानव जीवन के चार आश्रम (क्रमश: ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास) और चार वरणों (क्रमश: ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय व शुद्र) कदाचित अनेकरूपता के प्रतीक हैं। पीले रंग में लाल व हरा रंग अच्छा लगता है। मनोहरता के प्रसंग में लाल रंग, प्यार और प्रसन्नता का प्रतीक है, जबकि हरा रंग समृद्धि का द्योतक है। भाई के प्यार और प्रसन्नता तथा समृद्धि में ही बहिन की प्रसन्नता और समृद्धि निहित होती है। दोनों ही रंग शुभ समझे जाते हैं। वृक्षों की हरियाली प्रकृति पर समृद्धि ही मानी जाती है। रोली का लाल टीका तिलक भी भाई की प्रसन्नता की कामना का सूचक है।

आजकल इस राखी के भी अनेक नये-नये रूप सामने आ रहे हैं। फैशन और डिजाइन के हिसाब से विभिन्न प्रकार के आकारों में राखियाँ दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु चाहे राखी के रूप, आकार और प्रकार में कितने भी अंतर आयें, उन सभी में पीला, लाल व हरा रंग सम्मिलित होता है। इन तीन रंगों से बनी हुई राखी क्रमश: ज्ञान, प्रसन्नता और समृद्धि की त्रिवेणी है, जिसके पावन संगम स्थल पर अवगाहन करके अपने जीवन के उज्जवल तिराहे पर खड़े होकर तीनों दिशाओं का अवलोकन कर सकते हैं। कदाचित ये तीनों दिशाएँ मानव जीवन के तीन अध्याय बाल्यावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्था की सच्चाई को समझाती हैं।

भाई-बहन के पवित्र संबंधों की उद्‌घोषक यह राखी स्वयं में एक भावना और छिपाये हुए है - आत्म विश्वास की भावना। बहन अपने भाई के हाथों में राखी बांधकर अपनी रक्षा की इच्छा और आशा में विश्वास करती है। आखिर विश्वास में ही तो जीवन की सफलता का रहस्य छिपा हु है। अविश्वास की भावना स्नेह की आत्महत्या का हथियार है, इसलिये पवित्रता और आत्मविश्वास इस राखी के प्रमुख स्तंभ हैं, जिन पर ज्ञान, प्रसन्नता और समृद्धि का प्रासाद निर्मित होता है।

राजस्थान की महारानी पद्‌मिनी द्वारा मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर उसी आत्मविश्वास की भावना का परिचय दिया था, जिसमें भाई पर बहिन की रक्षा के दायित्व का बोध होता है। यह विश्वास इतिहास की एक जीती-जाती एक घटना है। राखी का यह छोटा सा रंग-बिरंगा धागा भाई और बहन के के प्रेम के प्रतीक के रूप में सदियों से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। रक्षा बंधन के इस त्यौहार में कोई जाति, कोई वर्ग, कोई क्षेत्र का प्रतिबंध नहीं है। सभी जाति और वर्ग के लोग इस त्यौहार को पूरे उल्लास एवं धूमधाम के साथ मनाते है। हर नगर और गाँव में हर बहन अपने भाई के हाथों में राखी बांधने के लिये जाती हैं और जो व्यक्तिगत रूप से नहीं जा पाती, वह डाक द्वारा भाई को राखी भेजती हैं। यह परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है।


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