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| 11.18.2007 |
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इतिहास का एक अनजाना पृष्ठ - कन्यादह एम.सी. कटरपंच |
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राजस्थान के गौरवमयी इतिहास में बलिदान,
त्याग
और मान-मर्यादा के लिये अपने जीवन की आहुती देने वाले अनेक सूरवीरों और
वीरांगनाओं की साहस भरी कहानियाँ अंकित हैं। महाराणा प्रताप का कभी न
झुकने वाला व्यक्तित्व,
राणा
सांगा का अद्भुत पराक्रम,
जयमल
और पत्ता का बलिदान,
अमर
सिंह और दुर्गादास की बहादुरी,
भामा
साह का त्याग और परमवीर मेजर शैतान सिंह की प्रेरणादायक गाथाएँ यदि
दोहराई जाती हैं तो दूसरी ओर चित्तौड़ की उस महारानी पद्मिनी के जौहर
की अद्वितीय दुहाई दी जाती है,
जिन्होंने अपने सतीत्व की रक्षा के लिये अग्नि की धधकती ज्वालाओं में
कूदकर प्राण त्याग दिये- जिन्हें अपने रूप और सौंदर्य के भूखे
अलाउद्दीन खिलजी को अपने शरीर के पास तक नहीं आने दिया। अपने पति को
अपने प्यार की निशानी स्वरूप अपना सिर काट कर भेजने वाली रानी हाड़ा की
हिम्मत और आत्मोत्सर्ग की घटनाएँ आज भी हमारी जबान पर स्थित हैं। ऐसी
ही एक और राजस्थानी कन्या की कहानी है,
जिसने
अपनी कौमार्य की रक्षा के लिये जल में कूदकर समाधि ग्रहण की - जिसने
अपने जन्म भूमि के गौरवशाली इतिहास को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये
अपने प्राण दे दिये। कन्या की जल समाधि के स्थान को
’कन्यादह’
का
नाम दिया गया,
हो आज
दूर,
बहुत
दूर एक कोने में उपेक्षित पड़ा हुआ है।
दिल्ली-बंबई रेलमार्ग पर स्थित कोटा शहर दो कारणों से प्रसिद्ध है- एक
तो चंबल नदी पर बनाये गये बांधों,
राणा
प्रताप सागर बांध तथा अणु विद्युत के रावत भांटा के विद्युत उत्पादन
केन्द्र के कारण तथा दूसरे चम्बल के अंचल में हो रहे औद्योगीकरण के
कारण। वहाँ नहरों के जाल बिछाये गये हैं तथा अनेक बड़े-बड़े उद्योग
स्थापित हुए हैं। फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाले धुएँ,
चपलता
से प्रवाहित होते चम्बल नदी के जल की कल-कल-छल-छल का स्वर और उस पर बने
हुए ऊँचे बांध यहाँ आने वाले पर्यटकों और सैलानियों को केवल अपने में
ही उलझाये रहते हैं। उन्हें आगे बढ़ने का मौका ही नहीं देते। लेकिन यदि
आप कोटा से बारांबाली सड़क पर बारां से आगे चलें तो दाहिनी ओर एक बोर्ड
लिखा मिलेगा
’कन्यादह’
और उस
पर एक तीर का निशान होगा। उसी तीर के निशान की ओर मुख्य सड़क से लगभग 5
किलोमीटर एक कच्ची सी सड़क जाती है,
जो
आपको एक मुनि के आश्रम तक ले जाएगी,
जहाँ
एक स्कूल चलता है- गुरूकुल जैसा स्कूल । यह कन्यादह पाठशाला है ओर उसके
निकट ही है,
पहाड़ी पर एक चट्टान जहाँ से उस कन्या ने कूदकर जल समाधि ली थी,
अपने
कौमार्य की रक्षा की थी।
इस
स्कूल के पीछे ही एक नदी बहती है- विलास नदी,
और
विलास नदी के दूसरी तट पर पहाड़ी के पृष्ठ भूमि पर बसा हुआ एक छोटा सा
गाँव जिसका नाम भी नदी के नाम के सहारे
’विलास’
पड़
गया है। मुश्किल से सौ-सवा सौ घरों वाला विलास गाँव उपेक्षित सा होकर
सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है,
लेकिन
वहाँ बिखरे हुए खण्डहर और खंडित मूर्तियाँ अपनी कहानियाँ सुना रही हैं।
वे भग्नावशेष आज मूक हैं,
खामोश
हैं,
परन्तु अपनी मूकता में जैसे उनको बहुत कुछ कहने को उनके पास। राजस्थान
के इतिहास के पृष्ठों से अनजान इस गाँव की कहानी सनसनी पैदा करने वाली
है। रोमांचित करने वाली है। विलास गाँव के बुढ़े सरदारों और बुजुर्गों
की कहानियों में भरी पड़ी है,
उस
कन्या के अद्वितीय साहस और आत्मोत्सर्ग की भावना,
जिसका
नाम उसके अनुपम रूप और सौंदर्य के आधार पर रूपमती था। वहाँ प्रचलित
किंवदन्तियों में बसी हुई यह कन्या रूपवती अमर बन गई है। इतिहास में
इसका उल्लेख प्राप्त नहीं होता,
लेकिन
यह कन्यादह के आस-पास के गाँव में लोक कथा के रूप में सुनाई जाती है।
विलास गाँव के एक बुढ़े मुखिया ने,
जिसके
सिर पर हाड़ौती का उन्नत साफा बंधा था और चेहरे पर जीवन की कठोर तपस्या
की रेखाएँ दृष्टिगत होती थीं,
कन्यादह की कहानी हमें इस प्रकार सुनाई
’आज
से सैकड़ों वर्ष पहले की बात है,
साहब।
यहाँ हमारा राज्य था,
हिन्दुओं का राज्य। मरहठों ने यहाँ कई बार आक्रमण किये। कोटा-बूँदी तक
ही नहीं,
वे
आगे बढ़ कर केलवाड़ा तक आ गये। परन्तु उन्हें हाड़ा राजपूतों की संगठित
शक्ति के समक्ष लौटना पडा। यह इलाका यहाँ की समृद्धि के लिये प्रसिद्ध
था। अत: शासकों की आँखें इस क्षेत्र पर लगी हुई थीं। फिर एक बार मुगल
सेना ने भारी तादाद में धावा बोल दिया। यहाँ के मंदिरों और मूर्तियों
को तोड़ा गया और बलपूर्वक धर्म परिवर्तन कराया गया। इसी गाँव की एक
कन्या कुमारी रूपवती की सुन्दरता पर मुगल सेनापति रीझ गया और उसे अपनी
पत्नी बनाने की लालसा करने लगा। एक दिन जबकि वह कन्या रूपवती नदी पर जा
रही थी कि मुगल सिपाहियों ने उसका पीछा किया और पहाड़ियों के नीचे उसे
जंगल में पकड़ लिया। रूपवती को उन्होंने डराया,
धमकाया और फुसलाया,
परन्तु राजपूती आन उसे सहन नहीं कर पाई। रूपवती ने सिपाहियों के समक्ष
समर्पण करने से इंकार कर दिया। मुगल सिपाहियों ने रूपवती को अकेला और
असहाय अवस्था में देखकर अपने सेनापति को बुला भेजा। वासना भरी आँखों को
अपनी ओर बढ़ते आते देख रूपवती वहाँ से नदी की ओर भाग निकली। सिपाहियों
ने समझा कि वह आखिर जाएगी,
कहाँ
?
राजपूती कन्या तेजी से दौड़ती जा रही थी,
और
उसका पीछा कर रहे थे मुगल सिपाही।
नदी के ऊपर एक पहाड़ी चट्टान पर आकर वह एकाएक रुक गई। कुछ देर
वह झिझकी,
परन्तु तुरन्त उसका खून खोला- उसका मन बोला - अपने सतीत्व की रक्षा के
लिये मरमिट- नदी में कूद जा। और इसके पूर्व कि उन मुगल सिपाहियों के
हाथ उसे स्पर्श भी कर सकें,
वह
तेजी से नदी में कूद गई। बहती हुई उत्ताल जल-तरंगों में अमर समाधि
ग्रहण कर ली,
उस
कन्या ने। धन्य है वह रूपवती,
जिसने
अपने सम्मान और कौमार्य की रक्षा के लिये स्वयं की नदी की लहरों में
समर्पित कर दिया। इसलिये बाबू साहब इसका नाम कन्यादह पडा है।’
गुरूकुल के आचार्य स्वामीजी ने एक अन्य अधिकारी (अध्यापक) को हमारे साथ
कर दिया और बोले,
’जाइए
देखकर आइए,
उन
खण्डित देव-प्रतिमाओं और
देवालयों को,
जो आज
अपनी विवशता की कहानी सुना रहे हैं।’
मैं
कन्यादह स्कूल और विलास गाँव में उस समय गया था,
जब
मैं कोटा में सहायक जनसंपर्क अधिकारी के रूप में पदस्थ था। अपने चपरासी
और प्रोजेक्ट ऑपरेटर को साथ लेकर हम उन अध्यापकजी के साथ स्कूल के
आस-पास का इलाका देखने चल दिये। विलास नदी का पानी हमने थर्मस में भरा
और अपने ऑपरेटर,
ड्रायवर तथा फोटोग्राफर को लेकर हम आगे बढ़ गये। नदी पार की और ऊँची
पहाडी पर चढ़ने लगे,
वह
चढ़ाई बडी कठिन और भयंकर है। टूटे-फूटे पत्थरों के ढेर रास्ता रोके हुए
हैं। अत: वहाँ उठकर,
बैठकर
चढ़ते चले गये। वहाँ हमने देखा कि सैकड़ों मूर्तियाँ टूटी-फूटी पड़ी
हैं- मलबे के नीचे दबी हुई हैं। कुछ मंदिर से खड़े हैं खंडित,
जिनके
खम्बों पर पत्थर ऐसे रखें हैं कि अब गिरे,
अब
गिरे। गणेश,
हनुमान,
देवी
तथा शिव के प्रतिमाओं के भग्नावशेष वहाँ खूब पड़े हैं। मंदिर के खम्बों
और छत्तों (जो जीर्ण-शीर्ण पड़ी थीं) पर खुदाई और पच्चीकारी बड़ी
आकर्षक लगती है। वहाँ हजारों की संख्या में मूर्तियाँ पड़ी हैं,
जिनकी
वहाँ कोई देखभाल नहीं हो रही है। उन प्रतिमाओं को सुरक्षित रखे जाने की
आवश्यकता है। पत्थरों में कटाई करके अंदर ही अंदर प्रतिमाएँ बनाई गई
हैं।
कन्यादह पाठशाला की कहानी भी कम रोचक और अजीब नहीं है। पंजाब के किसी
गाँव का एक नवयुवक सांसारिक आपदाओं से त्रस्त होकर शांति की खोज में
निकल पड़ा। हजारों मील घूमता-घूमता वह नवयुवक कन्यादह के बीहड़ और
निर्जन जंगल में आ गया। शेर,
बघेर
और जंगली जानवरों से निर्भय होकर उसने वहाँ तपस्या की- भक्ति की। शेर
वहाँ आते और जाते,
परन्तु इस तपस्वी से कभी कुछ न कहते। अनेक वर्षों तक घनघोर जंगल में
साधना करने वाले इस नवयुवक को अब एक धुन सवार हुई। वहाँ एक पाठशाला
खोलने की और अकेला ही वह तपस्वी लग पड़ा एक झोपड़ी बनाने में। दो-चार
बालकों से जिस पाठशाला का श्रीगणेश हुआ,
वहाँ
लगभग 50 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे,
जब हम
कन्यादह गये थे। इस पाठशाला ने गुरूकुल का रूप धारण कर लिया है। वहाँ
विद्यार्थी रहते हैं और अध्ययन करते हैं। पंजाब से आये उस नवयुवक
तपस्वी ने जिस पाठशाला का निर्माण किया वह उम्मीद लगाये हुए है कि एक
दिन उनका गुरूकुल उनके सपनों के अनुरूप बड़ा गुरूकुल का रूप ग्रहण
करेगा। देखते हैं कि उस
तपस्वी का सपना कब साकार होता है। लेकिन हाड़ोती के अतीतकालीन शौर्य,
समृद्धि और वैभव की अमर कहानी कहती वहाँ पड़ी प्रतिमाएँ रूपवती कन्या
की कहानी को कितने दिनों तक अपने अंतरमन में छिपाये रखेंगी?
कन्यादह उस वीर बाला उस रूपवती के आत्मोत्सर्ग का स्थान बन गया है,
जो
इतिहास के पन्नों से दूर होकर आज भी लोक इतिहास में अमर है।
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