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| 11.18.2007 |
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जब लक्ष्मी धरती पर आई ! एम.सी. कटरपंच |
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दीवाली आई भी न थी कि पृथ्वी पर लोगों ने उसका समारोह मनाने की
तैयारियाँ प्रारंभ कर दी थीं। घर की सफाई,
दीवारों पर सफेदी और पुताई और फिर रंग-बिरंगे चित्रों से चमक-दमक बढ़ाई
जा रही थी। दीपावली पर लक्ष्मी जो आने वाली थी,
इस
धरती पर।
और लो,
आज
दीवाली आ ही गई। घर,
बंगले,
बाजार
और गली-गली आज दीपों की बहार,
प्रकाश का आलोक,
फुलझड़ी और फटाखों की धूम- नारद जी की वीणा बज उठी और वे सोचते हुए चल
दिये क्षीर सागर की ओर। मुबारक हो लक्ष्मीजी आपको दीवाली,
क्या
प्रभाव है आपका उन भूतल निवासियों पर कि हर जगह आपके नाम की धूम है। वे
सब आपके ही जाल में फंसे हुए हैं। नारद जी की लपलपाती जीभ लक्ष्मी जी
को मक्खन लगाने में तब्दील थी। चलो आओ,
आज
आपके भक्त पृथ्वी के निवासियों को देखें। चलो भी तो और नारदजी
लक्ष्मीजी को लेकर धरती की ओर चल दिये। नारद की वीणा एक बार झंकृत हो
उठी।
बम,
फटाखों का गगनभेदी स्वर उनके कानों में मार्ग में ही सुनाई दे दिया था।
दूसरी ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं पर जगमगाते हुए दीपों की प्रकाश पंक्ति
आलोकित हो रही थी। नारद की वीणा फिर झनझना उठी और होते-होते नारद जी ने
भूतल पर लक्ष्मी सहित अपना कदम रखा। आगे बढ़े - यह ऊँचा भवन,
चकमते
हुए हजारों दीप। अपने लंबे उदर पर हाथ फेरते हुए लालाजी और पैर से सिर
तक स्वर्ण आभूषणों में मंडित कुछ अधिक स्वस्थ सेठानी,
जो और
दिन तो कुछ शिथिल रहती थीं,
परन्तु आज जैसे अपनी भक्ति से वे लक्ष्मीजी को प्रसन्न करना चाहती थीं।
सेठजी टोपी पहने लक्ष्मी पूजा के लिये बैठे थे,
जैसे
उनके लिये ही यह कोई आफत हो,
परन्तु बाह्य रूप में हँसमुख दिखाई दे रहे थे। नारदजी से मन की बात
कहाँ छिपती
?
झट से
लक्ष्मीजी के कान में बोले - सेठ जी कह रहे हैं कि हे लक्ष्मी देवी कल
का बाजार भाव तेज हो,
ताकि
जो माल मैंने भर रखा है उस पर मुझे खूब मुनाफा हो। लक्ष्मी जी कहने
लगीं - नारदजी धरती का आदमी कितना स्वार्थी है। अपने लाभ के लिये
दूसरों का पेट काटना चाहता है। वाह रे,
मृत्यु लोक! नारदजी ने व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट से कहा - अभी क्या देखा
है अभी और आगे बढ़ो- पास की बैठक में एक मंडली जम रही थी। ताश पर दांव
लगाये जा रहे थे। शराब के दौर चल रहे थे। लक्ष्मीजी ने नारदजी से पूछा
- क्यों नारदजी,
यह
कार्यक्रम आज भी चल रहा है। तुम तो कहते थे लोगबाग मेरा पूजन करते हुए
मिलेंगे। लक्ष्मीजी के इस प्रश्न के उत्तर में नारदजी की वीणा बोल उठी
- रोजाना तो होता ही है,
परन्तु आज यह आयोजन विशेष रूप से होता है। इतने में बैठक में बैठा हीरा
बोल उठा - यह लो बीबी का हार और लगाओ दांव पर,
आज
दीवाली जो ठहरी। लक्ष्मीजी मुँह मोड़कर चल दीं।
आगे
बढ़ो-आगे बढ़ो तो बाजार में एकाएक भीड़ का जमघट देखकर रुकना पडा,
लक्ष्मीजी को। ओह यह क्या,
हँसता
खेलता,
भोला-भाला नन्हा सा बालक ट्रक से कुचलकर इस संसार से मुख मोड़ चला था।
मुँह में खून आ गया था,
परन्तु चेहरे पर जैसे मुस्कुराहट सी थी,
जैसे
पान खाकर वह हँस रहा हो,
जैसे
खून का घूँट पीकर उसे इस समाज पर उगलना चाह रहा हो,
वह।
जेब में दो अच्छे फटाखे और दो अधजले फटाखे रखे थे,
जो
उन्हें पुन: जलाने की आशा में अपने जेब में रख लिया था। एक फुलझड़ी रखी
थी और साथ ही दो रुपये का सिक्का उसके जेब में रखा था,
जो
शायद उसे लौटकर अपनी माँ को देना था। परन्तु हाय,
फुलझड़ी के फटाखों की कौन परवाह करता । उन्हें चलाने वाला ही स्वयं
चलता बना। बताया गया कि अपनी विधवा माता का इकलौता बेटा था,
वह।
ट्रक को पकड़ लिया गया,
परन्तु उसे बचाने के लिये भागदौड़ प्रारंभ हो गई। अपना कलेजा थामे
लक्ष्मीजी आगे चलती बनीं। लक्ष्मीजी आगे बढ़ी तो विशालकाय एक कोठी में
जाकर रुकीं। वहाँ एक भारी भरकम प्रौढ़ व्यक्ति आड़ा लेटा हुआ था।
टेलीफोन की घंटी बज उठी,
रिसीवर उठाकर कहने लगा - मर्डर केस है,
कोई
बात नहीं मेरे लिये एक मिनट का काम है। कम से कम पाँच लाख रुपये का
खर्चा आएगा। फांसी नहीं होने दूँगा,
लेकिन
हलो हलो आधी रकम अभी पहुँचाओ और उन्होंने चोंगा रख दिया। और बड़बड़ाने
लगा चलो अपनी दीवाली तो मन गई। थोड़ी ही देर में रुपयों से भरा एक
ब्रीफकेस लेकर एक व्यक्ति उन्हें दे गया। हँसते-मुस्कुराते हुए जैसे
उन्हें किसी का भय नहीं। पैसे का घमण्ड जो था। लक्ष्मीजी के मुँह से
बरबस ही निकल पड़ा कि इतना नैतिक पतन हो गया है नेताशाही का।
धिक्कार-धिक्कार। लक्ष्मीजी कोठी से बाहर आ गईं और उनका साथ नारदजी को
भी देना पड़ा।
बाबूजी एक रुपया,
एक
रुपया - एक सुंदर युवती जिसकी दशा जीर्ण थी,
पुकार
रही थी। फटे हुए वस्त्रों में से उसका यौवन झाँक रहा था। इधर से एक
रुपये,
उधर
से दो रुपये लेती हुई चली आ रही थी कि यहाँ आकर एकाएक रुक गई।
लक्ष्मीजी को भी नारदजी ने रोक लिया। दो अफसर थे - आँखों में इशारे हुए
और अंग्रेजी में गिटपिट। फिर क्या था। एक युवक आगे बढ़ा,
उस
युवती से बोला क्या चाहिये। वह युवती पुन: कह उठी बाबूजी एक रुपया।
युवक ने दस रुपये का नोट दिखाकर उसे कहा लेगी और एक नजर युवती ने नोट
पर डाली तथा एक नजर युवक पर और फिर सिर झुका लिया। जैसे अपने पेट की
ज्वाला को मापने का प्रयत्न कर रही हो,
वह।
वह युवती उन अफसरों के साथ चल दी - नारी की सतीत्व का अपहरण- यह
बलात्कार नहीं देखा जाता- लक्ष्मीजी काँप उठीं,
परन्तु नारदजी की वीणा के स्वर ने उनके आवेश को शांत कर दिया।
अब
बाजार का चौराहा आ गया था,
जहाँ
नारदजी अधिक रुकना चाहते थे। एक ओर - "दादा मुझे यह खिलौना दिलाओ,
दिलाओ
दादा - दिलादो न’
बालक
उंगली पकडकर जिद कर बैठा। दादा बोला कैसी रोशनी हो रही है - दीपक,
बिजली
- सब कुछ बालक का ध्यान हटाने की कोशिश असफल रही और वह बालक खीज उठा-
यही लूँगा बस यही और कुछ नहीं। परन्तु दादा कैसे बतायें कि उसका जेब
खाली है- पैसे नहीं है उसके पास। कुछ अस्मंजस में किंकर्तव्यविमूढ़ सा
वह खड़ा हो गया और जब लक्ष्मीजी की दृष्टि दूसरे कोने पर गई तो -
’बोलो
बेटे क्या लोगे,
कितने
भी खिलौने ले ले। मिठाइयाँ भी,
फुलझड़ियाँ भी,
जो
चाहो सो ले लो,
सभी
कुछ।’
सेठजी
अपने छोटे से बालक से कह रहे थे,
जो
अकडू बने खड़े थे,
जो
कुछ भी चीज लेने को तैयार नहीं थे। नारदजी के मुँह से निकल पड़ा -
’बाजार
के दोनों किनारों पर कितना अंतर है। दोनो बालक हैं,
पवित्र और स्वच्छ परन्तु यह असमानता पारिवारिक स्तर की इतनी भिन्नता,
छी:"
और पैर कुछ गतिशील हो गये।
नुपरों की मधुर झनकार सुनकर लक्ष्मीजी को रुक जाना पड़ा। ऊपर अड्डा था।
नाचगाने चल रहे थे,
एक ओर
और दूसरी ओर पान चबाती हुई एक प्रौढ़ महिला थी,
जो
क्रम से एक-एक को बुलाकर दूसरी ओर भेजती थी। कोई दस-दस रुपये के नोट
फेंकता तो कोई शराब का घूंट लेकर पचास रुपये दे रहा था और वह बाला,
जो
किसी कुलीन घर की मालूम पड़ती थी,
परन्तु अब इस व्यवसाय में आ गई थी। अदब से सलाम करके मुस्कुराती जा रही
थी। ओह नारित्व की ये नीलामी - घृणा से जिसे लक्ष्मीजी ने मुँह बिदका
दिया। अधिक साहस न था वहाँ रुकने का। वह सामने होटल है,
जहाँ
डिस्को चल रहा है। संगीत की धुरी पर पैर उठ रहे थे,
आलिंगन हो रहा था और क्या कुछ नहीं। बाहर खड़े कुछ युवकों की बीच
अंतराष्ट्रीयता पर वार्तालाप कर रही थी -
’भारत
को अमरीका की दोगली नीति समझ लेनी चाहिये,
वह
पाकिस्तान को परदे के पीछे से उकसाता है और हमसे कहता है कि शांत रहो।
वार्तालाप चलता रहा और लक्ष्मीजी पास की गली में मुड़ गईं। नारदजी से
बोली चलो अब वापस क्षीरसागर। बहुत देख लिया हमने इस धरती का नजारा। आज
के दिन जहाँ हमारी पूजा करने का ढोंग रचते हैं,
वहीं
दूसरी ओर हमारे ही बलबूते पर अन्याय और अत्याचार का वातावरण बना हुआ है,
इस
धरती पर। अब मुझे कभी धरती पर मत लाना और लक्ष्मीजी चलीं गईं।
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