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| 11.18.2007 |
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भाड़ में जाय तुम्हारा होली विशेषांक एम.सी. कटरपंच |
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जब कभी कोई त्योहार हो,
उत्सव
हो,
पर्व
हो अथवा कोई विशेष व्यक्ति या घटना को महत्व देना हो तो साधारणत:
प्रत्येक समाचार पत्र अपना विशेषांक या परिशिष्टांक प्रकाशित करते हैं।
संपादक अपनी सारी योग्यता,
सूझबूझ और कमाल करिश्मा दिखाने के लिये उन विशेषांकों में जी-जान तो
लगाते ही हैं,
साथ
ही रात-दिन भी एक कर देते हैं। और जब वह विशेषांक पाठकों के समक्ष जाता
है,
तो
पाठकों की तीक्ष्ण बुद्धि अन्य पत्रों की तुलना में उसका स्तर अंकित
करते हैं। फिर क्या यदि अच्छा बन पड़े तो प्रशंसा पत्रों के ढेर लग
जाना स्वाभाविक है- जिधर भी संपादक जी निकल गये,
बिना
बधाई प्राप्त किये बिना नहीं रह सकते। इतना ही नहीं बाजे वक्त तो
तरक्की का भी मौका मिल जाता है संपादक जी को। यूँ विशेष एलांउस मिल
जाना कोई असाधारण बात नहीं है।
एक
बार हमें भी होली विशेषांक निकालने का आदेश हमारे प्रधान संपादक ने
हमें दिया,
उन
दिनों जबकि हम दिल्ली के एक दैनिक समाचार पत्र में सह सम्पादक थे। उनने
सोचा कि अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का एक अच्छा अवसर हाथ आ लगा है तो क्यों
चूके
?
सच
मानिये बीस-पच्चीस दिन पहले से ही मेहनत करना शुरू कर दिया। अपने बहुत
से लेखक बंधुओं को पत्र लिख दिये कि वे अच्छी रचनाएँ विशेषांक के लिये
शीघ्र भेज दें- पारिश्रमिक अच्छा दिलवा देंगे। कुछ दिनों बाद हमारे
अखबार की डाक में हमारा नाम प्रमुख रहने लगा। रचनाएँ आना शुरू हुई और
कुछ ही दिनों में ढेर सारी सामग्री सामने आ गई। दिन रात रचनाओं को पढ़ते,
कलम
चलाते,
रचनाओं में संशोधन,
परिवर्तन व अन्य संपादन कार्य करते रहे और छपने को देते रहे। साथ ही
साथ मेकअप भी हमीं कराते रहे,
काम
चलता रहा और लो,
बस
होली का एक दिन ही शेष रह गया। यूँ हमारा होली विशेषांक भी तैयार हो
चला था। टाइटल पेज का डिजाइन बनना बाकी था। इस पेज पर ही एक कविता देनी
थी। सोचा किसकी और कौन सी कविता दूँ। तुरन्त ही ध्यान आया कि क्यों न
कुमारी कविता की ही एक कविता इस पेज पर दे दें। कविता मेरे साथ ही
कॉलेज में पढ़ती थी और पता नहीं जाने क्यों मेरी पत्रकारिता की प्रशंसा
ही किया करती थी। उनको किसी प्रकार अनुग्रहीत भी तो किया जाय। यही सब
कुछ विचार करके हमने निश्चय किया कि कुमारी कविता की कविता के साथ उनका
एक चित्र भी छाप दें। तभी प्रधान संपादक जी का टेलीफोन आ पहुँचा। बोले
’महेश
जी देखो अभी टाइटल पेज तो नहीं बना है न
?
यह एक
गीत भेज रहा हूँ। डिजाइन के साथ टाइटल पेज पर इसे फिट कर देना। जल्दी
कराओ क्योंकि डाक के अंक शाम तक छप जाना चाहिये। हम केवल इतना भर कह
सके कि
’यस
सर’
टन-टन-टन टेलीफोन फिर बज उठा। अब और कौन सा गीत भेज रहे हैं,
चीफ
एडिटर महोदय
?
मैं
झल्ला उठा और साथ ही रिसावर भी हमें उठा लेना पडा- हलो! महेश बोल रहा
हूँ। और जवाब मिला हाँ मैं कविता बोल रही हूँ। शाम को 6 बजे मैं एक
पार्टी दे रही हूँ अपनी सहेलियों के साथ। तुम्हें आना होगा,
हाँ
अशोका में- जरूर-जरूर आना- वेट करूँगी- ओके और झट से टेलीफोन काट दिया।
शाम के पाँच बज चुके थे। परन्तु चीफ एडीटर महोदय का गीत अभी तक नहीं
आया था। 6 बजे मुझे अशोका में पार्टी में शामिल में होना है अपनी कला
और प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन करने का अच्छा मौका है। सवा पाँच,
साढ़े
पाँच और छ: बज गये परन्तु ना प्रधान संपादक जी आये और न ही उनका गीत।
पार्टी में भी कैसे जाए
?
अभी
तक मेहनत करके जी-जान एक करके प्रधान संपादक पर अपना प्रभाव जमा पाया
हूँ और अब यदि छोड़ कर चला जाऊँ तो सारा गुड़-गोबर एक हो जाएगा। हम
आखिरकार पार्टी में नहीं गये। कोई आठ बजे रात को संपादक जी का भेजा हुआ
गीत आया कुमारी कुमुद का। हमारा सारा क्रोध गीतकार के नाम ने समाप्त कर
दिया और हम अपने काम में लग गये। रात के कोई बारह बजे डाकवाला अंश हमने
डिस्पैच किया और घर चल दिये हमने सोचा कि कविता से छमा मांग लेगें जिसे
वे शीघ्र ही हमारे श्रम व कला के बदले स्वीकार कर लेगीं। सुबह हम कविता
से मिलने गये। कविता के बंगले में जैसे ही हम घुसे तो हमें हक-बक रह
जाना पड़ा अभी क्यों आये हो- मत आते- फुर्सत मिल गई- वादा करके मुकर
गये- परन्तु हमें तो अपने काम पर और स्वयं अपने आप पर विश्वास था कि
हमारे होली विशेषांक को देखकर वे सब
कुछ
भूल जाएँगी।
’हम
इसलिये नहीं आ सके’
कहकर
होली विशेषांक की एक प्रति कविता जी के समक्ष रख दी। उन्होंने आव न
देखा ताव और झट से फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर डाला और बस इतना कहा -’भाड़
में जाय तुम्हारा होली विशेषांक’। |
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