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11.18.2007
 
कैला देवी का मेला : गीत और संगीत की गूँज
एम.सी. कटरपंच

राजस्थान और उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती शहर भरतपुर तथा बयाना के रेलवे केन्द्र के मध्य में एक स्टेशन कैला देवी का है, जिसे केवल झील का स्टेशन भी कहा जाता है क्योंकि इसके निकट ही एक सुरम्य प्राकृतिक छटायुक्त पानी की एक झील भी है, जिसे मोती झील के नाम से जानते हैं। इस झील के नाम के विषय में अनेक धारणाएँ हैं, जिनमें कुछ प्राचीन व्यक्तियों के अनुसार यह झील मोती प्राप्त करने के लिये प्रसिद्ध थी : कुछेक का कथन है कि इसमें भूतपूर्व भरतपुर नरेश का कोई मोती नामक पालतू कुत्ता डूब कर इस संसार से विदा हो गया था। अस्तु प्राकृतिक छटा के अतिरिक्त यह स्थान कैला देवी के मंदिर के लिये विख्यात है। जहाँ देवी के मेले त्यौहारों के विशेष समारोहों के अवसर पर देश के सुदूरवर्ती विभिन्न स्थानों से लाखों नर-नारी एकत्रित होते हैं। भक्तों का यह मेला यहाँ एक अनुपम इतिहास रखता है।

सबाई माधोपुर और गंगापुर के पास करौली नामक स्थान पर भी कैला देवी का एक मंदिर है और एस स्थान को भी कैला देवी का स्थान माना जाता है। वास्तव अधिक प्रसिद्धि तो करोली की कैला देवी को ही मिली है, परन्तु मोती झील की कैला देवी भी राजस्थान वासियों के लिये श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। नवरात्रि के दिनों में देवी के मंदिरों में गीत-संगीत की विशेष धूम रहती है। वातावरण कुमारियों और महिलाओं की सुरीली तानों से गूँजता रहता है। कोई दल इधर गा रहा है तो कोई दल उधर। कहीं महिलाएँ ढोलक पर थपकियाँ लगातर नृत्य गायन में मस्त हैं तो कहीं ग्रामीण पुरुष बासुरी के स्वर में लंगुरियों के गीत गुनगुना रहे हैं। भारतीय लोक संस्कृति के इस विशाल सांस्कृतिक समारोह में नवदुर्गा के अवसर पर विशेष अनुपम छटा छा जाती है।

नारियों में भक्ति की मात्रा अधिक पाई जाती है। देवी के लोक गीतों में नर-नारियों के मनोभावनाओं के दर्शन होते हैं। श्रद्धा और भक्ति छलकती है इन लोकगीतों में। लोकगीतों में ही परस्पर नाट्‌य भावना के अन्तर्गत संवाद भी सुनाई पड़ते हैं। एक स्त्री देवी के मेले में जाकर सम्मिलित होने के लिये उत्सुक है और अपने पति को इस देवी के मेले में चलने के लिये प्रेरित करती है परन्तु पति यह कहकर बहाना बनाकर देवी के मेले में जाने में आना-कानी करता है कि वे दोनों पति-पत्नी एक साथ मेले में कैसे जा सकते हैं, क्योंकि घर की सुरक्षा के लिये किसी न किसी का वहाँ रहना आवश्यक है। पति-पत्नी के परस्पर वार्तालाप को इंगित करता हुआ यह गीत देवी के मेले में जगह-जगह सुना जा सकता है -

चल पिया दोए मिल जाएँ, पूजै देवी जालपा ओ माय’ :

तू धन असल गवांर, दोउन चलवो ना बनै ओ माय

अपने रसीले एवं दृढ़ तक से वह अपने पति को देवी के मेले में जाने के लिये राजी कर लेती हैं। स्त्री के मधुर भक्ति भावों से देवी मैया अत्यन्त प्रसन्न हो जाती हैं और रात्रि को उनके सपने में आकर उन्हें आश्वासन देती हैं -

जती रे, घर की चिन्ता मत करियो,

मेरे लटक भवन चले आओ, जती रे :

घर पे बसाये दउगी जोगनी,

और दरवाजे लंगूर बलबीर, जती रे:

घर की चिन्ता मत करियो।

भैंस गयि्यन पै चित मत धरै,

 मेरे झटक भवन चले आओ, जती रे।

इस प्रकार स्वप्न में देवी माता से बहू-बेटी, अन्न, धन, दूध, घोड़ा बच्चे आदि की चिंता न करने का अपेक्षित आश्वासन प्राप्त करने पर पति कैला देवी के मेले में जाने के लिये तैयार हो जाता है और देवी के दर्शन के लिये चल देते हैं। स्त्रियाँ हाथों में हरी चूड़ियाँ पहनती हैं, जो उनकी समृद्धि के सुख और सौभाग्य की प्रतीक है : खुले हुए बाल, सिर पर कलश रखकर, हाथों में मेंहदी रचाकर एवं नवीन वस्त्रों से सुसज्जित होकर (पुरुष भी प्राय: पीले रंग के नये वस्त्र धारण करते हैं, जो दार्शनिक पृष्ठभूमि में ज्ञान के सूचक हैं) नंगे पैर पथवारी के मंदिर में जाकर सपरिवार पूजन करके देवी के भवन की ओर प्रस्थान करते हैं। रास्ते में भी देवी और लंगुरिया का स्मरण करते रहते हैं-

लंगुरिया तेरी धन खाय लई कारे नाग ने :

कछु खाई, कछु डस लई और कछु मारीय फुफकार,

बारे लंगुरिया तेरी धन खाय लई कारे नाग ने।

बाग तमाशे में गई, केले केले पे लिपट रहयो नाग, लंगुरिया तेरी धन ...........,

ताल तड़ागन में गई, साड़ी-साड़ी पे लिपट रहयो नाग लंगुरिया.........,

कोट कुआ पे मैं गई गगरी-गगरी पे लिपट रहयो नाग, लंगुरिया........।

और भी अनेक स्थानों पर उन्हें नाग की ही मूर्ति दिखाई पड़ती है। रास्ते में चलते-चलते जब पति-पत्नी हैरान हो जाते हैं और थक जाते हैं तब भक्ति भाव में आत्मविभोर होकर पत्नी देवी को उलाहना देती है-

ऐसी कहा महारानी,

तू तो बैठी विकट उजाड़न में :

हार हमेल गुदी खंग बारी,

अरी मेरो तो हरबा उलझो झाड़न में :

नाक, चुनी नकवेसर सोहो,

अरी मेरी नथली इरझी झाड़न में :

अगले ऊपर पिछले सोहे,

अरी मेरे दस्ते उरझे झाड़न में :

पांव भरत के भर-भर बिछुआ,

अरी मेरी अनबट इरझी झाड़न में :

सालू सरस रशमी लहंगा,

अरी मेरी चुनरी अटकी झाड़न में :

ऐसी कहा महारानी तू तो बैठी विकट उजाड़न में।

 

और उन कटीले जंगलों की अनेक आपत्ति और परेशानी के पश्चात्‌ उन्हें अंतत: कैला देवी के भवन दृष्टिगोचर हुए तो उनके मुँह से संतोष के स्वर निकले-

झील में करोली बारी अड़ रही, बारे लांगुरिया

और अड़ रही भवनन बीच लांगुरिया

झील में करोली बारी अड़ रही।

        आखिरकार भवन पर देवी के मंदिर में जा पहुँचते हैं भक्त। पूजा करके देवी का भोग लगाकर गीत गाया और देवी के सामना अपनी मनोकामना भी रख दी- बहुएँ लाड़-लड़ीन कू पूत दै, जगतारन मैया। घी का दीपक जलाकर देवी की आरती भी उतारी गई। पूजा-पाठ के पश्चात्‌ देवी के भवनों और नीचे प्रांगणों में नाचरंग मनाये जाते है। लोकगीतों की झड़ी सी लग जाती है वहाँ। सिरपर मटके रखकर जोगिन देवी के समक्ष नाचगान में मस्त हो जाती हैं-

लांगुरिया हंस मत अइयो काउ ओर ते :

ज्यों हंस आयो काउ ओर ते, तो मरूँगी जहर बिष खाय लांगुरिया ...........:

हरबा गढ़ाय दउ भारे मोल को, याय पहर चलो आय लांगुरिया...........

ज्यो हंस आयो काउ ओर ते, करूँगी देवी के आगे न्याय,

लांगुरिया हंस मत अइयो काउ ओर ते।

और अंतरआत्मा से देवी के स्वर में आवाज आई-

हाथ खरच दउगी, जंघियन बल दउगी,

गोद में झडूलो दउगी, खायबे कू खरिया दउगी,

बैठबे कू गाडी दउगी : अचक बुलाए, जाती तोय

भवन घंटा बाज रहे चारो ओर,

चौरासी घंटा बाज रहे भवनों में।

और इस आनंद के साथ उल्लासमय भक्तगण जब वापस अपने घर लौटते हैं तो उनकी आशा, आकांक्षा तथा मनोकामनाएँ इस प्रकार व्यक्त होती हैं -

दे दै लंबो चौक लांगुरिया, बरस दिना में आमेंगे :

अबके तों हम छोरा लाये, परके बहुअल लावेंगे :

अबके तो हम बहुअल लाये, परके नाती लावेंगे।

 

और फिर वातावरण ध्वनित होता है -

बोल केला मैया की जय


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