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11.18.2007
 
होली का त्यौहार : उड़त गुलाल लाल भयो अंबर
एम.सी. कटरपंच

राधा हिन्दी साहित्य की सबसे अधिक रोमांटिक नायिका है, जो जयदेव, चंडीदास, विद्यापति और सूरदास की काव्यधारा में सरोज की तरह विकसित हुई है। जयदेव की राधा प्रेमविहुला है- प्रगलभा है। गीतगोविन्द ने ही सबसे पहले राधिका का स्पष्ट नुपुरसिंजन गाया। विद्यापति की राधा में रूप लावण्य की दीप्ति है- उसमें जैसा रूप है वैसा ही है उसके हृदय की लीला, उसका विभ्रम। चंडीदास ने राधा को विशुद्ध प्रेम की प्रतिमा माना है- वह प्रेमोनमादिनी है अवश्य बंधु तुमीं से आमार प्राण’ (कवीन्द्र रवीन्द्र), परन्तु व्याकुल होते हुए भी वह है गंभीर। लेकिन राधा के चरित्र और व्यक्तित्व का जैसा क्रमिक विकास महाकवि सूरदास के सागर में हो पाया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। शैशव के आँगन से वह यौवन के द्वार तक आती है: आती ही नहीं, यौवन के द्वार पर आकर वह ठहर जाती है : और ठहरती भी उस पोज में है की मन को छू जाती है। राधा का चित्रण करने वाले ये कवि धन्य हैं और धन्य है वह बाल किशोरी - वह लाल की बतरस लालच से मुरली छुपा देने वाली आँख मिचौली के बदनाम, बरसाने की छबीली, बृषभानु की लली- जो राधा है, बालिका है, किशोरी है, बृजरानी है।

राधा बरसाने की है, जो दूध दही बेचने नंद गाँव, मथुरा और वृंदावन तक जाती है। परन्तु यह क्या ? रास्ते में ही उसकी मुठभेड़ हो गई एक सांवले बदन के ग्वाले से, जिसने उसका प्रथम इंटरव्यू लिया - तुम कौन हो, कहाँ रहती हो, किसकी बेटी हो खैर पूरी चतुराई से राधा जवाब देकर चली ही गई। दूध दही छीनने से ही कन्हैया का मन नहीं माना। वह तो चाहते थे कि राधा के साथ रास रचायें, होली खेलें, फाग खिलायें। लेकिन यह सब कैसे संभव हो ? गाय चराने गये तो यमुना के तट पर कदम्ब के पेड़ पर जाकर बैठकर बांसुरी बजाने लगे। बांसुरी का जादू, कि सुधबुध खो बैठी राधा, पागल सी हो गई राधा। साथ-साथ खेलते-कूदते राधा और कृष्ण के हृदय में उस भावना का स्वाभाविक प्रादुर्भाव हो गया, जिसे प्रेम की संज्ञा दी जाती है। जब होली के दिन निकट आते गये तो राधा का मन भी उत्सुक हो उठा- कृष्ण के साथ होली खेलने का, रंग-गुलाल के वातावरण का। और कुछ नहीं, तो राधा निमंत्रण ही दे गई कृष्ण कन्हैया को बरसाने आने का, अपने घर आने का। अपना पूरा अता-पता भी वह बता गई-

कान्हा बरसाने में आ जइयो, बुलाय गई राधा प्यारी

ज्यों कान्हा तू गैल न जाने, पूछत-पूछत आ जाइयो

बृषभानु की पोरी आ जइयो बुला गई राधा प्यारी।

निमंत्रण तो दे आई राधा परन्तु उसका दिल धड़कने लगा। वह घबराने लगी- अगर कहीं कृष्ण आ गये तो ? तो क्या, वह तो आएँगे ही और तुम्हें होली खेलनी पड़ेगी उनके साथ। नहीं-नहीं, मैं उनसे होली नहीं खेल सकती, वह तो पिचकारी भरके मुझे सराबोर कर देंगे, यह सब अच्छा नहीं लगेगा। पिचकारी के अलावा वह मुझे पकड़ भी तो लेंगे और मेरे मुँह पर मसल-मसल कर गुलाल लगायेंगे, मुँह में रंग भर देंगे-

मैं रंग में कैसे होरी खेलूंगी या सांवरिया के संग

कोरे-कोरे कलश भराये, जिनमें घोरा रंग

भर पिचकारी मुख पर मारी, तो साड़ी जाएगी रंग,

और मेरी चोली होगी तंग,

मैं कैसे होरी खेलूंगी या सांवरिया के संग

पकड़, गुलाल मलय माथे में, मुँह में भर दे वो रंग

देखने बारे कहा कहरंगे, रह जाएँगे दंग

रंग में कैसे होरी खेलूंगी या सांवरिया के संग।

 

परन्तु यह सब सोचने और डरने से क्या होता है। कृष्ण को तो निमंत्रण मिल गया था उनके मन की मुराद पूरी होने को थी, वह कैसे रुक जाते । मौके की तलाश में ही थे वह तो। अपने सभी ग्वाल साथियों को लेकर वह चल दिये बरसाने की ओर- बृषभानु की पोरी की ओर। यदि राधा होरी खेलने नहीं भी आएँगी तो कृष्ण उसे स्वयं पकड़कर बाहर ले आएँगें होली खेलने के लिये। रास्ते भर गोपियों पर रंग डालते और रसिया गाते जा रहे हैं भगवान कृष्ण और उनके सखा गोपाल-

आज बिरज में होली रे रसिया

होरी रे रसिया, पर-जोरी रे रसिया

उड़त गुलाल लाल भयो अंबर,

धरती की छवि प्यारी रे रसिया

अपने-अपने घर ते निकसीं,

कोई कारी, कोई गोरी रे रसिया,

कोई छोटी, कोई मोटी रे रसिया

नाक चुनी नकबेसर सोहै,

बिंदिया की छवि न्यारी रे रसिया

आज बिरज में होरी रे रसिया।

 

कृष्ण तो स्वयं ही रसिया बन गये थे। केवल एक ही धुन थी दिल और दिमाग में- राधा के साथ होली खेलें और उसे अपने रंग में ऐसी रंग दें कि वह भी याद करती रहे उसे। परन्तु यह क्या, कृष्ण की टोली जैसे ही बरसाने में पहुँची, राधा उपर जा चढ़ी। अब कृष्ण क्या करें, वह तो रह गये टापते ही। इशारे से राधा को उन्होंने बुलाया तो राधा ने आँखे मटका दी। हाथ जोड़कर विनती की तो राधा ने उत्तर में जीभ निकाल दी। कृष्ण अब चिढ़ गये थे। उनके पास कोई रास्ता भी नहीं था। परन्तु राधा से वे हार मानने वाले नहीं थे। कृष्ण ने राधा के देखते-देखते बरसाने की एक दूसरी गोपी को पकड़ लिया और लगे उस पर पिचकारी मारने। कृष्ण तो राधा के हैं तथा किसी और पर वह रंग कैसे डाल सकते हैं ? किसी और के साथ होली कैसे खेल सकते हैं ? बेचारी गोपी कृष्ण से मनुहार करती है-

कान्हा तुम मत मारो पिचकारी

मोहे राधा देगी गारी

रे बनवारी तुम मत मारो पिचकारी

यह सब राधा से नहीं देखा गया। राधा के होते हुए, राधा के सामने कृष्ण किसी अन्य गोपी से होली खेलें यह राधा को बर्दाश्त नहीं हुआ। राधा उतर कर नीचे आ गई। कृष्ण तो जानते ही थे। आँखों में गुस्सा भरे राधा जैसे ही आँगन में आई, कृष्ण ने धर पकड़ा राधा को और लगे गुलाल मलने, मुँह में रंग भरने, पिचकारी मारने, राधा कृष्ण होली खेलते खेलते कुंज गलियों तक आ गये। रंग ही रंग फैल गया चारों ओर-

होरी खेल रहे नंदलाल मथुरा की कुंज गलिन में

भर पिचकारी मारी, बाकी साड़ी सुरख बिगारी,

और अंखियन में भरा गुलाल, मथुरा की कुंज गली में।



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