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| 02.16.2009 |
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तुम सीता बनना |
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उन दिनों
रामलीला का एक अलग आनंद होता था चौपाइयों में संवाद होते थे, सभी
अपनी पंक्तियाँ कंठस्त करते थे और फिर मधुर स्वर में गाते थे। तब
मैं पाँच वर्ष की थी एक बार इजाज़त मिली रामलीला देखने की कुछ सहेलियों,
दादी और पारिवारिक सदस्यों के साथ। लक्ष्मण मूर्छा का दृश्य था। वो मूर्छित
पड़े थे नीचे और राम विलाप कर रहे थे.. उनके उस करुण विलाप से आँखों मैं
अश्रु भर आते थे ...।
तभी बड़ा
सा द्रोणगिरि पर्वत लिए भरमाये हुए विशालकाय हनुमान का प्रवेश हुआ। उनकी
लायी जड़ी-बूटियों से लक्ष्मण सचेत हो गए और सभी ने खुश हो कर खूब तालियाँ
बजाईं..!
तब से
हनुमान मेरे लिए दुनिया के सबसे बहादुर एवं आदर्श
पुरुष हो गए।
मैंने माँ
से आग्रह करके उनकी बहादुरी की कई और कहानियाँ सुनीं और फिर सहेलियों से
उनकी चर्चा करती कैसे उन्होंने इतना विशाल समुद्र लाँघ कर सीता को बचाया या
फिर अपनी पूँछ से अहंकारी रावण की सारी लंका को जलाया।
जब कभी
मुझसे कोई पूछता कि
“बड़े
होकर क्या बनोगी?"
तो
मेरा सहज और गर्वित उत्तर होता -"मैं हनुमान बनूँगी!"
सभी मेरी
इस बात पर खिलखिलाकर हँस देते और मैं रुआँसी होकर माँ से शिकायत करती..। वो
भी मेरी बात पर मुस्कराती और कहती - "लड़कियाँ हनुमान नहीं बनती सीता बनती
हैं इसलिए तुम सीता बनना!"
लड़कियों
को सीता का और लड़कों को राम का आचरण करना चाहिए इस बात पर उनका अटल
विश्वास था।
मेरी
मायूसी यथावत बनी रहती। पता नहीं क्यों; पर मैं सीता कभी नहीं बनना चाहती
थी। उनका वो रूप – शृंगार, चमकीले वस्त्र व गहने भी मुझे कभी आकर्षित नहीं
कर पाए। फिर कभी रामलीला जाने की इजाज़त तो नहीं मिली पर समय-समय पर रामायण
की कहानियाँ सुनती रही।
आज के
परिवेश में भी हनुमान बनना ही उचित जान पड़ता है। किसी को जीवन दान कर पायें
किसी भी रूप में,
किसी का दुख दूर करें,
बुराईयों व कुरीतियों का बहिष्कार कर पायें तो समझो जीना सार्थक हुआ।
सीता का
वन प्रस्थान,
रावण द्वारा हरण,
अग्नि परीक्षा व ऋषि बाल्मिकी के आश्रम में निष्कासन उस समय भी मेरे बाल
मनको उद्वेलित कर जाता था।
आज की
सीता पर समाज का निर्दयी प्रहार जो उसका कोख में आने मात्र से ही शुरू हो
जाता है देखकर मन अवसादित हो जाता है। दबाई गयी,
सताई गयी,
जलाई गयी,
दहेज़ प्रथा की कुरितियो से प्रताड़ित व भेद-भाव पूर्ण व्यवहार से कुंठित
सीता को देख कर मन द्रवित हो उठता है।
और माँ के
ये शब्द बड़े बेमाने लगने लगते हैं ....
"लड़कियाँ
हनुमान नहीं बनती सीता बनती हैं इसलिए तुम
सीता बनना....!" |
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