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ISSN 2292-9754

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07.19.2014


साथी वीराने का

खूबसूरत शाम थी हाथ मैं चाय का मग थामे बरामदे में फ़ाहों सी गिरती बर्फ को देर तक देखती रही।

अद्भुत नज़ारा प्रकृति का .. धवल संसार शांत होता वातावरण मेरा चित्त भी इसी के साथ शांत होता जा रहा था।

बदन मैं कंपकंपी ठण्ड का अहसास करा गई। भीतर जाकर गर्म शाल लपेट एक मग चाय का और बना लिया। पहाड़ों की ठण्ड भी पहाड़ों की ही तरह सुंदर होती है.. वो नश्तर सा नहीं चुभोती बस एक सिहरन का अहसास भर कराती है। कौसानी के उस गेस्ट हाउस में आलाव से गर्म होता कमरा तन और मन को सुकून प्रदान करने लगा।

विचारों के अथाह सागर में डूबती उतरती बंद खिड़की के शीशे से बाहर झाँक रही थी। यादों का अपना एक अद्भुत संसार होता है। कभी कोई मीठी याद का टुकड़ा होंठों पर मुस्कराहट दे जाता है, तो अगले ही पल कोई अप्रिय याद माथे की सिलवट का कारण बन जाती है।

अतीत की परतों को खोलती हुई अचानक बरामदे में मेरी नज़र फिर अटक गई।

आज भी वो दरवाजे पर टेक लगाये, बिना हिले, विचारमग्न सा खड़ा था। पिछले दो दिनों से मेरी उत्सुकता भी यथावत बनी थी। कौन होगा, खुश होगा दुखी होगा? मेरी सोच जिज्ञासावश लम्बी होती चली गई.. लोगों को पढ़ना मुझे थोड़ा रोमांचित कर जाता है और जब सही पढ़ने में सफल हो जाती हूँ वही एक नई कहानी सर उठाने लगती है।

लंबे कद का, थोड़ा दबा हुआ रंग, पतली काया पर कुरता पायजामा, अस्त व्यस्त सा शाल लपेटा था जिसका एक कोना ज़मीन को छू रहा था। अजीब आकर्षण था उसके व्यक्तित्य में ..अजीब शब्द ही कहना ठीक रहेगा।

अचानक लगी ठंड के अहसास से लगा आलाव की आग कम हो गई है। थोड़ा और लकड़ियाँ डाल कर आँच तेज़ होती देख में वहीं बगल में रखी आराम कुर्सी पर झूलने लगी। पेपर व पेन उठाकर कुछ लिखने की सोची।

बहुत दिनों से मन था कुछ लिखने को.. कलम लेने खिड़की के पास बनी दराज़ तक पहुँची, फिर एक बार अपने आप को बाहर झाँकते हुए पाया .. अब वो वहाँ नहीं था। थोड़ा धीरे कदमों से वापस आ कुर्सी पर बैठ पुनः झूलने लगी वो साथी मालूम हुआ उस वीराने का।

भावविहीन बन, बैठी रही कुछ देर ..फिर लिखने का मन नहीं बना। प्रेरणा स्रोत सूख गया हो जैसे और सोच ने भी साथ नहीं दिया।

खाना खाकर कुछ देर पढ़ती रही शायद बहुत देर। नींद से मेरा बैर है बचपन से ही किसी ने कभी कहा था मुझसे -  "शायद आपके पास काम ज्यादा है और वक़्त कम" ...हँस दी थी मैं .. हो सकता है यही सच हो ...।

अगले दिन प्रातः छ्ह बजे घंटी की आवाज के साथ चाय की ट्रे लिए दरवाज़े पर लड़का खड़ा था। दरवाज़ा खोलते समय नज़र सामने बरामदे में फिर चली गई.. ये नज़र भी आपनी द्रुत गति से कहाँ-कहाँ लपक लेती है ...ट्रे टेबल पर रखते हुवे वो बोला -"साहेब नाश्ता कहाँ करेंगे? आज बाहर अच्छी धूप खिली हुई है लॉन पर बैठकर चाय पीना आपको ज़रूर अच्छा लगेगा।"

"वो सामने वाले कमरे में कौन है?" अचानक पूछे गए प्रश्न से मैं स्वयं अचम्भित थी।

"जी वो साहेब तीन रोज़ से वहाँ पर हैं, कम बोलते हैं सो ज़्यादा मालूम नहीं", कहकर वो चला गया।

बर्फ गिरने के बाद उस पर पड़ती सुबह की कच्ची धूप मुझे आपार प्रसन्नता देती है। कुछ देर बाद साड़ी का पल्ला ठीक करते हुए, शाल लपेट, बाल थोड़ा गीले थे इसलिये खुले ही छोड़ लॉन पर चली गई। कौसानी में यदि आकाश स्वच्छ हो तो हिमाच्छादित शिखरों पर छिटकी हुई धूप मनोरम छटा बिखेरती है।

हवा मैं ठंडक थी लेकिन खूबसूरत धूप से स्वर्णिम होती वादियाँ देखने का लोभ मैं नहीं छोड़ पा रही थी। शाल को थोड़ा और कसकर लपेटा और स्मृतियों के अतुलित संसार मैं विचरण करने लगी....

सूख चुके बालों की लटें बार-बार हवा के साथ चेहरे पर बिखर रही थी। उनको समेट कर बाँधने की सोच हाथ ऊपर उठाये ही थे की सुनाई पड़ा ....

"लहराने दीजिये इन्हें, ऐसे ही उन्मुक्त ..इस बंधने बाँधने की फ़ितरत से कब उबरेगा इंसान..."
पलट कर देखा थोड़ा बड़ी हुई दाढ़ी, चेहरे पर लापरवाही का भाव शायद बंधन मुक्ति का भाव हो वो खड़ा था।

"बंधन में एक आलौकिक सुकून होता है अकेलेपन की पीड़ा का अहसास नहीं होने देता", मैंने थोड़ा सकुचा कर कहा

"स्त्रियाँ स्वच्छंद अपनी उड़ान क्यूँ नहीं भरना चाहतीं?"

'"शायद हमारी प्राचीन परम्परा की मानसिकता जिसमें हम पले बड़े हुए हैं, लेकिन आप ऐसा किस आधार पर कह रहें हैं?"

"क्या करती हैं आप?"

"थोड़ा बहुत लिख लेती हूँ, लेखन हम जैसे अल्पभाषी व संकोची स्वभाव के लोगों के लिए अपने आप को व्यक्त करने का सबसे सरल व सुंदर साधन है।"

"स्वतंत्र होकर लिखतीं हैं न?" चेहरे पर थोड़ा कटाक्ष व प्रश्नवाचक मुस्कराहट लिए उत्तर की प्रतीक्षारत वो आँखे एकटक मुझे देख रही थी। असहज हो उत्तर देने का मन नहीं हुआ।

"कब तक पुरूष नारी को असहाय समझने का दंभ पलता रहेगा? क्यूँ उसके अपनेपन को बंधन का रूप दे देता है वो" समझने की कोशिश करती हुई कुछ क्षण मौन रही।

मेरे इस तरह चुप हो जाने से वो थोड़ा विचलित जान पड़ा। स्त्रियों की चुप्पी में अद्भुत शक्ति होती है, ये अनुमान तो मैं लगा चुकी थी।

अगले ही पल थोड़ा मुस्करा कर बोला - "चलिए आप शायद ऐसा नहीं सोचतीं पर एक विशेष स्त्री वर्ग ऐसा ही है", सरल भाव से उसे अपने ही शब्दों को सहलाते देख मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी जिसमें फिर वो भी शामिल हो गया। सारा संवाद बड़ा सुंदर रहा तीन दिन के उस वीराने के साथी से।

अगली सुबह काशनी रंग की अपनी मनपसंद सिल्क की सारी पहन लॉन पर बिखरी गुनगुनाती धूप में नाश्ता करने उतरी तो वहाँ उसे इन्तज़ार करते हुए पाया ...

मुस्कुराते हुए बोली - "इस बंधने बाँधने की फ़ितरत से कब उबरेगा इंसान?"

उसके ठहाके के साथ ही.... मैंने कलाई पर बंधी घड़ी की ओर भी देखा -

मेरे जाने का समय जो हो रहा था.......


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