अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.13.2016


रंगीन रातों का देश पटाया (थाईलैंड)

दिसंबर माह में सप्ताह भर के लिए थाईलैंड (बैंकोक, पटाया) जाने का अवसर मिला था। थाईलैंड जाने का यह मेरा पहला अवसर था। वहाँ पर कहाँ घूमना है, और क्या-क्या देखना है - यात्रा करने से पहले मैंने इसकी कुछ जानकारी मित्रों से, कुछ नेट और पुस्तकों से प्राप्त कर ली थी। वहाँ पर बोली जाने वाली "थाई" भाषा के कुछ रोज़मर्रा में बोले जाने वाले शब्द याद किए। पिछली तमाम विदेश यात्राओं के अनुभवों से एक बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि जहाँ भी जाएँ यदि उस स्थान को अच्छी तरह से समझना हो तो वहाँ के गाँवों के बारे में जानना और वहाँ के मूल निवासियों से बातचीत करना उत्तम तरीक़ा होता है। टूरिज़्म की दृष्टि से भी यह सफ़र बहुत आनंददायक रहा।

थाईलैंड को पहले सियाम के नाम से भी जाना जाता था। थाईलैंड भारतीय संस्कृति और धर्म से प्रभावित दीखता है। स्तूप और ब्द्ध की प्रतिमाएँ, मॉनेस्ट्री आदि जगह-जगह पर बनी हुईं हैं। बौद्ध धर्म को मानने वाले दुनिया में सबसे अधिक थाईलैंड में हैं। हाथी यहाँ पर बहुतायत से पाये जाते हैं जो देश का राष्ट्रीय चिन्ह भी है। हाथियों को प्रशिक्षित करके उनसे मनोरंजन करवाया जाता है। वे अद्भुत शो करते हैं। इसी तरह शेर, मगरमच्छ आदि से भी ख़ूब मनोरंजन किया जाता है। सैलानियों को आकर्षित करने के न जाने कितने तरीक़े अपनाये जाते हैं। मूँगे के द्वीप (कोरल आइलैंड), विशाल मछलीघर, पानी के अंदर की दुनिया (अंडर वॉटर वर्ल्ड) डाइविंग आदि बहुत कुछ।

आज भी थाईलैंड का राजा देश का सर्वोसर्वा है। पाँच दिसम्बर को राजा के जन्मदिन को मनाने की तैयारी थी। यह दिन थाईलैंड के लोगों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता है। इसलिए चार तारीख से ही शहर को ख़ूब सजाया जा रहा था। हमें पाँच तारीख की सुबह पटाया शहर के दर्शनीय स्थल देखते हुए बैंकोक को निकालना था, इसलिए शाम को होने वाले समारोह हम नहीं देख सके।

थाईलैंड में शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य है। सत्रह वर्ष की उम्र तक के बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा का प्रावधान है। इसलिए देश में साक्षरता दर करीब ९३.५% है। वहाँ पर चावल की बहुत पैदावार होती है, जिसे बाहर के देशों में निर्यात भी किया जाता है। बैंकोक, थाईलैंड की राजधानी है। थाईलैंड बेहद घनी जनसंख्या वाला और विश्व का इक्यानवा बड़ा देश है। बैंकोक व्यवसाय और कारखानों का सबसे बड़ा शहर माना जाता है। तापमान ४० डिग्री सेल्सियस तक भी पहुँच जाता है इसलिए पर्यटन की दृष्टि से नवंबर से फरवरी तक का समय ख़ुशनुमा होता है। वहाँ की मुद्रा को भात कहते हैं। वैसे थाईलैंड पर अपराध कम होते हैं परन्तु जेबकतरे, पर्स झपटने वाले, क्रेडिट कार्ड चोरी आदि मामलों के प्रति सतर्क रहना चाहिए।

थाईलैंड कोई बहुत समृद्ध देश तो है नहीं फिर भी मैंने वहाँ (पटाया, बैंकोक) पर किसी को भीख माँगते नहीं देखा। 'There is no free meal' को सार्थक करते हुए पैसा कमाने के लिए सभी कुछ न कुछ काम करते हैं। एक बालक सड़क पर पसीना-पसीना होता दर्शकों का मनोरंजन कर रहा था। वह बेहद मन से और ऊर्जावान होकर एक अंग्रेज़ी फ़िल्म के गीत पर बहुत लयात्मक तरीक़े से नृत्य करने में मगन था। सैलानी उससे बहुत प्रसन्न दीख रहे थे। उसके सामने रखी पेटी में लोग टिप के रूप में कुछ न कुछ स्वयं ही रख रहे थे। इतनी मेहनत और सुन्दर कला को देखकर शायद ही कोई हो जो टिप नहीं दे रहा हो।

जो बात थोड़ा मन को जँची नहीं वह यह थी कि....इतना बड़ा "टूरिस्ट हब" जहाँ देश-विदेश के लाखों सैलानी हमेशा घूमते रहतें हैं; अच्छे होटल हों या बाज़ार, मॉल हों या फिर मनोरंजन की अन्य दर्शनीय स्थल, सभी जगह भाषा एक अवरोध बनी रही। हिन्दी न सही परन्तु अंग्रेज़ी जो लगभग कई देशों में बोली जाती है, यहाँ उसका ज्ञान भी कम ही था।

मैं तो एक काग़ज़ पर रोज़ के काम में आने वाले कुछ थाई-हिन्दी शब्द और वाक्यों को लिख कर और सीख कर गई थी। मेरी टूटी-फूटी थाई और उनकी टूटी-फूटी अंगरेज़ी का ज्ञान बघारते दोनों ही पक्ष अपनी बात रखते, समझते ख़ूब हँसते-बतियाते थे। अपना काम चल ही गया। वैसे वहाँ पर लोग बड़े मिलनसार, मज़ाकिया, हँसमुख और भाषा के अवरोध के बावजूद भी बतियाने को हमेशा तैयार रहते हैं। आत्मीयता और आपस में संस्कृतियों, रीति-रिवाज़ों और जानकारियों का आदान-प्रदान किसी जगह विशेष को बेहद आकर्षक बना देता है।

बैंकोक में हमने आख़िरी दो दिन बिताये। शहर घूम कर फिर ख़रीददारी की। ख़ूब किफ़ायती और सुंदर परिधान ख़रीदे। बहुत से सैलानी टीवी, कैमरा आदि भी ले रहे थे। वहाँ पर यह इलेक्ट्रॉनिक सामान भारत के मुक़ाबले काफ़ी कम दाम पर मिल जाता है। भारत पहुँचाने का ख़र्चा और नियम सभी कुछ शायद बहुत आसान और ठीक होगा तभी ख़रीदार कई-कई सेट ले रहे थे। उनका कहना था कि वे बेचने के हिसाब से ले जा रहें थे। वे इस तरह की ख़रीदारी करने के लिए वहाँ आते रहतें थे। बैंकोक से ही अगले दिन स्वर्णभूमि एयरपोर्ट पहुँचकर वहाँ से दिल्ली के लिए वापसी का जहाज़ पकड़ना था। वैसे थाईलैंड में प्रवेश करते समय भी उसी एयरपोर्ट पर उतरते हैं परन्तु हमें सीधे पटाया जाना था, इसलिए एयरपोर्ट से ही टैक्सी बिना बैंकोक घुमाये हमें पटाया ले गई थी।

मुझे पूरे पटाया शहर में समुद्र और मछली की गंध आ रही थी। समुद्र के इर्द-गिर्द घूमने जैसा सुन्दर अहसास। शाम होते ही वहाँ पर रौनकें छाने लगतीं थीं। दिन भर फ़्ली बाजार, गोम्पा, आदि दर्शनीय स्थल घूमो और शाम को वहाँ की सड़कों पर लगे बाजार का आनंद उठाओ। स्ट्रीट फ़ूड के खाने का भी अपना स्वाद होता है। विभिन्न तरह के थाई व्यंजन खा-खा कर ख़ूब आनंद आया। चिकन और मछली के व्यंजन ज़्यादा थे। शाकाहारी व्यक्तियों के लिए कुछ दिक्कत रही हो किन्तु हमने ख़ूब खाया। गीत-संगीत से सजे कुछ जुलूस भी निकले थे, जिनमें वहाँ के स्थानीय निवासी मुखौटा पहने हुए या अपने चेहरे को रंगे हुए थे। कहीं पर कान-फोड़ू संगीत के मंच भी सजे थे।

पटाया के एक मशहूर शो अल्क्ज़ार के बारे में बहुत सुना हुआ था। रात की जगमगाती रोशनी में होने वाला शो। कुछ मित्रों ने यह कह कर मना किया था कि इसे परिवार व बच्चों के साथ बिलकुल नहीं देखा जा सकता है। परन्तु इतना मशहूर शो और क़ीमती टिकिट होने के बाद यह फालतू का शो कैसे हो सकता है ये सोच कर मैंने इसे देखा।

यह करीब एक घंटा बीस मिनिट का शो था। जगमगाते, जीवंत, आलीशान, भव्य सेट और चमचमाते परिधानों में सजी परियों सी ख़ूबसूरत बालाएँ (या ladyboys) गीत की धुनों पर मस्त नृत्य कर रहीं थीं। पूरे शो में अलग-अलग देशों का प्रतिनिधित्व करते शानदार सेट होते थे। एक देश का नृत्य समाप्त होते ही दूसरे नृत्य के लिए सारा सेट बदल दिया जाता था। हैरानी होती थी कि पलक झपकते ही सब कैसे बदल जाता था। यहाँ तक कि स्टेज पर ही पानी के फव्वारे और झरनों का दृश्य भी होता था। वहाँ की पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार, गीतों, नृत्यों और लोक कहानियों से सजा रंग-रंगीला संसार देख कर मन अति प्रसन्न हो गया था। भारत देश की सुन्दर प्रस्तुति भी "देवदास फ़िल्म" के एक गीत के साथ हुई थी। वहाँ के कलाकारों को भारतीय गीत पर मगन होकर नृत्य करते देख कर मन गदगद हो गया था। हॉल तालियों से गूँज उठा था।

अंत तक मैं समझ नहीं पाई कि इस शो में ऐसा क्या था जिसके लिए इसे देखने की मनाही थी... क्या मात्र उन सुंदरियों की उघड़ी हुई टाँगें और उनके चमचमाते परिधानों से झाँकते वक्षों को देख कर मान लिया जाय कि शो वाहियात है? इतनी तंग सोच? खैर नजरिया अपना-अपना। इसका एक अलग तरह का अनुभव था। वहाँ जाने पर सभी को देखना चाहिए… जरूर! शो के बाद वे कलाकार स्टेज के पीछे से उतर कर बाहर आ गए थे। तब दर्शकों में रोमांच और हलचल बढ़ गई। उनके साथ फोटो खिंचवाते, हँसते, मज़ा करते लोग निहाल हुए जा रहे थे।

पटाया की रातें बहुत ज़िंदा और मस्ती भरी होतीं हैं... छह बजे शाम से "वाकिंग स्ट्रीट" नामक सड़क पर वाहनों की आवाजाही दो बजे रात तक बंद हो जाती है... । ढेरों रेस्त्रां, बार, नाईट क्लब्स, डिस्कोथिक आदि से देर रात तक सड़कों और वाकिंग स्ट्रीट पर जगमगाती रोशनी से नहाई हुई सड़क, शोर-गुल, नाचना, गाना, संगीत, घूमना, खाना-पीना और आवारागर्दी करना चलता रहता है.....कहीं पर कुछ नशे की मदहोशी के आलम में एक-दूसरे से सटते और चूमते हुए जोड़े भी दीख जातें हैं। मस्त अपनी अलग ही दुनिया में खोये हुए लोग। कुल मिलाकर जीवन में एक बार तो मस्त पटाया ज़रूर देखना चाहिए।

सफ़र की समाप्ति पर दुनिया भर में मशहूर, थकान उतारने वाली और बदन को राहत देती थाई "मसाज" ज़रूर करवानी चाहिए। मदमाती इत्रों, क्रीम और औषधीय लेपों से मदहोश करती हुई ख़ुश्बू और महकते वातावरण में अपनी मनमोहक मुस्कान, सुगढ़, मज़बूत और नरम हाथों से मालिश करती सुन्दर बालिकाएँ पहलवानों से दाँव पेंच लगाती मालिश करतीं हैं। वे सभी की निस्संकोच भाव से मालिश करतीं थी। स्त्रियाँ, पुरुष, उनके लिए सभी ग्राहक थे। मुझे अपने सकुचाते, सहमते परन्तु अति प्रसन्न भारतीय पुरुषों को उन सजी-सँवरी महिलाओं से मालिश करवाते देख कर बेहद आनंद आ रहा था। क्या पंछी, क्या मानव, स्वतंत्रता सभी को पसंद होती है। साथ में बैठी अपनी टाँगों की मालिश कराती उनकी पत्नियाँ कुढ़ती हुई तिरछी निगाहों से अपने पतियों को घूर देती थीं। अगले दिन कई पति चाह कर भी वहाँ मालिश करवाने नहीं आ सके। वजह सभी समझ रहे थे। बाद में उनकी ख़ूब टाँग-खिंचाई हुई।

वे लड़कियाँ एक्यूप्रेशर, नाड़ी तंत्र के दबावों, योग आदि से शरीर के सारे अंगों को 180 के कोण तक तोड़-मरोड़ कर ऐसे घुमा रहीं थीं मानो अन्त में घर जाते समय अलविदा कहती हुई हमारी सारी हड्डी-पसली हाथ में थमा देंगी। परन्तु हम जब पार्लर से बाहर निकले तो इतना स्वस्थ और तरोताज़ा महसूस कर रहे थे....चाहे तो कोई मैराथन दौड़ा ले।....वैसे भी वापस दिल्ली आकर दौड़ना ही था... ज़िंदगी की भागम-भाग किसी मैराथन से कम थोड़े ही है। हँसते, खिलखिलाते, सीखते, समझते और सभी कुछ अपने कैमरे में, अपने दिल और यादों में क़ैद करते सफर करना लाजवाब होता है। बैंकोक-पटाया बेहद किफायती परन्तु आनंददायक ट्रिप है। दुबारा थाईलैंड का बाकी का हिस्सा देखने जाना जरूर बनता है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें