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ISSN 2292-9754

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07.19.2014


प्रेमजल !!!

पल पल पल्लवित
    उत्प्लावित प्रेमजल
       अश्रुधारा बन बहे निर्झर

बह जाए उनमें
   वह मधुर स्वप्न सिंचित
       बनाकर मुझे स्थूलजड़

वह विप्लवी अश्रु
   करे चित्त दृढ़तर
     नवीन उत्साह
         संचार कर !!


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