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ISSN 2292-9754

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08.01.2014


कर्ज़

माँ एक चादर
मेरे कंधे पर डाल दे
कि चलते राह डगर में
तेरे आँचल का प्यार
मुझे मिलता रहे
कि रहे अहसास मुझे
तेरे अंक उष्मा का
और रहे आभास मुझे
मेरे कंधे पर आए बोझ का
और इसी धुन में हो सकूँ उऋण
राष्ट्र व माँ तेरे क़र्ज़ से


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