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ISSN 2292-9754

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07.19.2014


दुल्हन

पथ तलाशती मार्ग बनाती
यूँ निशब्द मैं कहाँ चली
मन बोझिल था पैर शिथिल
बाँहें तलाशती वहाँ चली

नैनों में मोती झलकाती
प्रेम मगन हो कहाँ चली
कौन पथिक अब राह दिखाए
स्वप्न तलाशती वहाँ चली
मधु दिवस मधुमास मनाती
मस्त पवन सी कहाँ चली

लब पर पंखुड़ियाँ लिए
फूल खिलाती वहाँ चली
दूर किनारा मंज़िल भी थी
पंख लगा उड़ कहाँ चली
प्रियतम खड़ा आलिंगन को
लाजमयी मैं वहाँ चली


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