दुल्हन एम.ए. शर्मा ’सेहर’
पथ तलाशती मार्ग बनाती यूँ निशब्द मैं कहाँ चली मन बोझिल था पैर शिथिल बाँहें तलाशती वहाँ चली
नैनों में मोती झलकाती प्रेम मगन हो कहाँ चली कौन पथिक अब राह दिखाए स्वप्न तलाशती वहाँ चली
मधु दिवस मधुमास मनाती मस्त पवन सी कहाँ चली लब पर पंखुड़ियाँ लिए फूल खिलाती वहाँ चली
दूर किनारा मंज़िल भी थी पंख लगा उड़ कहाँ चली प्रियतम खड़ा आलिंगन को लाजमयी मैं वहाँ चली