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बारह वर्ष की थी
कक्षा में विषय मिला बादल
कविता लिखनी थी सभी को
कुछ ने रुई के फाहों से सफ़ेद बादलों को चुना
मुझे उमड़ते-घुमड़ते काले बादल मन भाए
आज भी बड़े मित्रवत लगते हैं
बचपन से जानती हूँ इन्हें
जहाँ भी जाऊँ साथ हो लेते हैं
पहाड़ों की कोख में जन्मी
प्रकृति प्रेम सहज था
आसान जान पड़ा लिखना
गाहे-बगाहे शायद लिखा कुछ
तुकबंदी ही कविता होती हैं
ऐसा कुछ भ्रम था
सुंदर तुक मिलान की भरपूर कोशिश
बन गई सहज सरल पहली कविता
पु्रस्कार स्वरूप मिला
प्रशस्ती पत्र, कलम व
प्रधानाचार्य के स्नेहिल शब्द
मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं
"कलम प्रिय सखी साबित होगी लिखते रहना!"
खुशी के क्षण बाँटना आसान है
दुख के पलों में लिखना भाता है मुझे
चाहे वो निरीह प्राणी के क्रंदन का हो
आज बादलों के देश से दूर
मीठी यादों को संजो
जब कुछ लिखना चाहती हूँ
अनायास ही होंठ बुदबुदा उठते हैं
"कलम परम मित्र प्रिया सखी मेरी!"
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