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ISSN 2292-9754

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07.19.2014


बादलों के देश से

बारह वर्ष की थी
कक्षा में विषय मिला बादल
कविता लिखनी थी सभी को
कुछ ने रुई के फाहों से सफ़ेद बादलों को चुना
मुझे उमड़ते-घुमड़ते काले बादल मन भाए
आज भी बड़े मित्रवत लगते हैं
बचपन से जानती हूँ इन्हें
जहाँ भी जाऊँ साथ हो लेते हैं

पु्रस्कार स्वरूप मिला
प्रशस्ती पत्र, कलम व
प्रधानाचार्य के स्नेहिल शब्द
मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं
"कलम प्रिय सखी साबित होगी लिखते रहना!"
खुशी के क्षण बाँटना आसान है
दुख के पलों में लिखना भाता है मुझे
चाहे वो निरीह प्राणी के क्रंदन का हो

आज बादलों के देश से दूर
मीठी यादों को संजो
जब कुछ लिखना चाहती हूँ
अनायास ही होंठ बुदबुदा उठते हैं
"कलम परम मित्र प्रिया सखी मेरी!"


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