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ISSN 2292-9754

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03.04.2017


रोमांच और नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर किन्नौर
(सराहन, कल्पा, रिकांगपिओ, रारंग) - हिमाचल प्रदेश
मीना ए. शर्मा ’सेहर’

 यूँ तो हिमाचल के अलग-अलग हिस्सों को देख चुकी थी परन्तु किन्नौर ज़िले को देखने का बड़ा मन था। इस बार आठ दिन का अवकाश मिलते ही इस सफ़र की तरफ़ चल दी। दिल्ली से पाँच बजे सुबह चल कर पहले दिन शिमला में रुके। शाम को शिमला का आनंद लिया। दूसरे दिन सुबह नाश्ता करने के बाद हमने आगे सराहन के लिए प्रस्थान किया।

सराहन -हिमाचल प्रदेश का एक प्यारा सा गाँव है। अप्रैल से जुलाई तक वहाँ पर मौसम साधारणतया ख़ुशगवार रहता है (१०-३० डिग्री)। इसे "सराहन बुशहर" भी कहतें हैं। सराहन बुशहर गर्मियों की राजधानी हुआ करती थी जबकि रामपुर बुशहर जाड़ों में। नवंबर से मार्च तक वहाँ तापमान -७ डिग्री तक पहुँच जाता है। इतनी ठण्ड के रहते वहाँ पर काफ़ी हिमपात भी हो जाता है। वहाँ पर पहुँचने के लिए पुराने इण्डो-तिब्बती मार्ग से होकर गुज़रना भी रोचक अनुभव है। सराहन, शिमला से करीब १६० किमी पर स्थित है।

वहाँ पर स्थित भीमकाली मंदिर सराहन की ख़ूबसूरती है। यह प्राचीन मंदिर पत्थरों की मोटी दीवारों और लकड़ियों पर की गई बेहतरीन नक्काशी से बनी भव्य कलाकृति है। वह इण्डो-तिब्बती तरीके की वास्तुकला से बना हुआ मंदिर है, जहाँ भीमकाली देवी को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता रहा है। उस मंदिर की सदस्यता अब हिमाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री और उस रियासत के राजा वीरभद्र सिंह (बुशहर राज्य के राजा पदम सिंह के सुपुत्र) व उनकी पत्नी प्रतिभा देवी के पास है। मंदिर ५१ शक्तिपीठ में से एक है। हम दशहरे की सुबह वहाँ पर पहुँचे थे और उसी दिन वहाँ पर राजा वीरभद्र और उनके परिवार वालों की गाजे-बाजे के साथ स्वागत की शानदार तैयारियाँ चल रहीं थीं। हमें आगे जाना था इसलिए उनके स्वागत का दृश्य नहीं देख सके। आख़िर राज परिवार है। कमाल का ही स्वागत हुआ होगा।

सैलानियों के मंदिर परिसर में घूमने और फोटो खिंचवाने में कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु मंदिर के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करने से पहले अपने चप्पल, जूते बाहर ही उतारने थे। साथ में अपना कैमरा, मोबाईल और चमड़े से बने पर्स, चमड़े के स्ट्रैप वाली घड़ी, बेल्ट्स इत्यादि सभी कुछ बाहर बने हुए लॉकर में रखना था। जिसको ताला लगा कर उसकी चाबी अपने पास रख कर हम अपना सामान सुरक्षित रख सकते हैं।

उस दिन दशहरा होने की वजह से वहाँ पर काफ़ी भीड़ थी। भीमा काली बहुत बड़े राजमहल का सा आभास देता हुआ अनूठा मंदिर है। कई सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हम अलग-अलग तलों को पार करते हुए ऊपर मुख्य मंदिर में पहुँचे। अलग-अलग तलों में बने कमरों में भण्डार गृह, मुद्राकोष, गर्भ गुहा आदि लिखा हुआ था परन्तु वे सब बंद थे, मज़बूत तालों से सावधानी पूर्वक बंद किये हुए। मुख्य माँ के द्वार पर सभी पंक्तिबद्ध होकर अपनी बारी का इंतज़ार करते धीरे-धीरे आगे सरक रहे थे। वहाँ पर एक महिला कॉन्स्टेबल ड्यूटी पर तैनात थी। चौकस और सतर्क महिला ऑफ़िसर। भीतर काली माँ की भव्य और आकर्षक मूर्ति विराजमांन थी। दो पंडितजी भक्तों से चढ़ावे का सामान लेकर मंत्रोच्चारण के साथ माँ को अर्पित कर रहे थे। अपनी इच्छानुसार वहाँ जितनी देर पूजा करनी हो या ध्यान करना हो, बैठ सकते थे। कोई बाहर जाने को नहीं कहेगा जैसा कि वैष्णोदेवी या अन्य कुछ मंदिरों में होता है। मैं ऐसे मंदिरों में जाना पसंद नहीं करती। मुझे ऐसे धक्कम-धक्के वाले मंदिरों में कतई श्रद्धा नहीं रह जाती इसलिए उन जगहों पर दुबारा जाना नहीं हो पाता। भीमाकाली में जाना अतुलित आनंद देने वाला अनुभव रहा। अवसर मिला तो दुबारा फिर जाऊँगी।

परिसर में बाहर आने के बाद उसी के पास राजा का महल भी है परन्तु वह सैलानियों के देखने के लिए नहीं खोला जाता। घेराबंदी के बाहर से महल को देख सकते हैं व उसके इर्द-गिर्द बने सेभ आदि के बग़ीचों में घूम सकते हैं। सराहन में गेस्ट हॉउस व अच्छे होटल आदि में सुविधा से रहने की व्यवस्था आराम से हो जाती है। क़रीब हर मुख्य शहर और गाँव में प्रवेश के समय सड़क पर नक्काशीदार और रंगों से बने सुन्दर द्वार बने हैं। वक़्त के साथ कई द्वार अब अवशेष मात्र रह गए हैं परन्तु कई द्वारों को ठीक कराया गया है। सराहन को किन्नौर ज़िले के लिए मुख्य द्वार के रूप में देखा जाता है।

किन्नौर -

यह शिमला से २३५ किमी की दूरी पर स्थित है। इसके पूर्व से तिब्बत लगा हुआ है। इण्डो-तिब्बत सड़क से गुज़रते हुए सतलज नदी के किनारे-किनारे चलते हुए किन्नौर की ख़ूबसूरती से भावविह्वल हुआ जा सकता है। किन्नौर की केवल ख़ूबसूरती ही नहीं वरन इसके रीति-रिवाज़, रहन-सहन, हेरिटेज, ट्रेडिशन, कस्टम आदि में भी ख़ूब आकर्षण है। वहाँ के लोग बेहद हँसमुख, विनम्र, सहृदय और सत्कार पसंद होते हैं। उन्हें किन्नौरा भी कहा जाता है। वहाँ पर हिन्दू और बुद्ध दोनों तरह के धर्मों को मानने वाले लोग हैं। इसीलिए वहाँ के निवासियों के नामों में दोनों तरह के प्रचलित नाम सुने जा सकतें हैं।

वहीं ऊपर पहाड़ी पर बनी एक हज़ारों वर्ष पुरानी मॉनेस्ट्री भी है। उन लोगों का मानना है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव वहाँ पर स्थित करमु (बुशहर राज्य की राजधानी) गाँव में रहे थे। इसलिए आज भी वहाँ पर द्रौपदी की तरह ही बहुपति प्रथा को स्वीकृति मिली हुई है। अब नई पीढ़ी शिक्षित होकर इस प्रथा को नकारने लगी है परन्तु कुछ जगहों पर बहुपति प्रथा (पॉलीगैमी) आज भी देखी जाती है। इसका कारण वहाँ के एक सम्मानीय बुजुर्ग व्यक्ति ने कुछ इस तरह बताया।

"इसके पीछे का सत्य शायद यह रहा हो कि तब उपजाऊ ज़मीन कम होती थी इसलिए बँटवारे से बचने लिए और भोजन की समस्या को सुलझाने के हिसाब से इस प्रथा ने जन्म लिया हो। धीरे-धीरे शिक्षा की जागरूकता से अब यह कम होती जा रही है।" जनसँख्या के हिसाब से किन्नौर भारत की सबसे कम आबादी वाला ज़िला है। ख़ुशगवार मौसम के अलावा अक्टूबर से मई तक वहाँ पर लम्बी सर्दियाँ रहती हैं। अपर किन्नौर में कम वर्षा होती है। वहाँ अमूमन तिब्बत की तरह का मौसम रहता है। हमें भी शाम होते ही शॉल और कोट की ज़रूरत महसूस होने लगी थी। वैसे क्या पुरुष और क्या महिला स्वेटर और किन्नौरी टोपी हर किसी ने पहनी हुई थी। प्यारे लाल किन्नौरी सेब से गालों वाले बड़े और बच्चे लुभावने लगते हैं।

पूरे किन्नौर जिले में साक्षरता दर ८१ प्रतिशत है। इतने पिछड़े हुए से इलाक़े में शिक्षा के प्रति इतनी जागरूता देख कर बेहद ख़ुशी हुई। शिक्षा के प्रति जागरूक होते हुए वे अपने आने वाली पीढ़ी को अच्छी शिक्षा देने के लिए शिमला, चंडीगढ़, दिल्ली आदि बड़े शहरों में निसंकोच भेजने लगे हैं। वहाँ का पर्यावरण सेब की पैदावार के लिए उत्तम है। इसलिए वहाँ रॉयल, गोल्डन आदि कई तरह के सेब की पैदावार की जाती है। इन्ही सेब की उपज से अक्सर व्यक्ति समृद्ध हैं। हर वर्ष सेब की पैदावार तैयार होते ही उसे बाहर से आए ठेकेदारों को ठेके पर दे दिए जाते हैं। आगे यही किन्नौरी सेब बड़े शहरों में ख़ूब अच्छे दामों पर बेचा जाता है। वहाँ काम के हिसाब से तीन तरह की जातियाँ होती हैं। जो खेती करते हैं वे नेगी उपनाम लगाते हैं। अन्य अलग जाति में शिल्पकार, बुनकर व लुहार भी होते हैं। अमूमन किन्नौर जिले में हिन्दी ही बोली जाती है और गाँवों में किन्नौरी भाषा बोलने का आम चलन है।

सेब के अलावा वहाँ चिलगोजे, ओग्ला, फाफरा, राजमां, गेहूँ, चौलाई, चूली आदि की अच्छी पैदावार होती है। वहीं के एक निवासी ने प्रसन्नता से बताया, "पहले ठेकेदार हमें सरल ग्रामीण समझ कर औने-पौने दाम में हमारी फसल का ठेका कर लेते थे और बड़े शहरों में बेच कर ख़ूब पैसा कमाते थे। लेकिन अब हम अपनी उन्नत और महँगी पैदावार के प्रति जागरूक हो गए हैं और ठेकेदारों से अच्छी क़ीमत वसूलना सीख गए हैं। तभी बच्चे पढ़ा पा रहे हैं...हैं ना जी...."

किसी भी समारोह, विवाह आदि में चिलगोजे की मालाएँ पहनाकर स्वागत करने का चलन है। वही चिलगोजा जो हमें बाज़ार में अमूमन १५००/किलो की क़ीमत पर मिलता है। वहाँ अभी चिलगोजा खरीदने वाले ठेकेदार कम ही हैं। इसलिए लोग ज़्यादा उगाते नहीं हैं। इसके बनस्पति "फाफरा" अब बहुतायत में उगाना शुरू कर दिया है। ये छोटे से तिकोने, भूरे रंग का बीज होते हैं। इसका उपयोग मधुमेह में बेहद सफल माना जा रहा है इसलिए अब इसका बाहर के देशों में निर्यात भी होने लगा है। चूली, बादाम की एक प्रजाति है जिसका तेल बनाया जाता है और उसके छिलके से घरेलू शराब बनाई जाती है जिसका औषधीय उपयोग भी होता है।

किन्नौरी गीत, संगीत और नृत्य के बेहद शौकीन और रंगीन मिज़ाज़ के लोग होते हैं। अक्सर ये साफ़ रंगत के और सुगढ़ नैन नक्श के होते हैं। गुलाबी आभा लिए लड़कियाँ व महिलाएँ सुन्दर दिखतीं हैं। जब कभी कोई त्यौहार होता है तब ये अपने रंग-बिरंगे परिधानों और मुख्यतः चाँदी के ज़ेवरों से सजते हैं। वर्ष भर कई त्यौहार उल्लास के साथ मनाये जाते हैं।

कल्पा -

यह किन्नौर जिले का सबसे बड़ा और बेहद सुन्दर गाँव है। यह रिकांगपिओ से ऊपर की तरफ़ बसा है। सतलज नदी की घाटियों में बसा हरियाली से दमकता हुआ। वहाँ पर अव्वल तो मौसम ख़ुशगवार रहता है परन्तु अक्टूबर से मई तक लंबी सर्दियों का मौसम रहता है। तब नीचे का तापमान -२० डिग्री तक गिर जाता है। उन दिनों वहाँ पर ख़ूब बर्फ गिरती है। करीब ५-७ फ़ीट तक। वहाँ छोटा परन्तु रोज़ की जरूरतों के सामान वाला एक अच्छा बाज़ार भी था, जिसमें हर तरह का सामान मिल रहा था। आस-पास के गाँव वाले अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के फल-सब्जी, कपड़े, राशन आदि का सामान लेने और खरीददारी करने वही जाते हैं। वहाँ पर एटीएम और पैट्रोल पम्प भी थे और स्कूल, कॉलेज भी। आस-पास गाँव के समृद्ध घरों के बच्चे आगे पढ़ने के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार रामपुर, शिमला, चंडीगढ़ या फिर दिल्ली निकल आते हैं।

वहाँ पर हिन्दू और बुद्ध दोनों संप्रदायों को मानने वाले लोग बसे हैं। इसीलिए मंदिर दोनों ही तरह के देवी-देवताओं से सजे होते हैं। कल्पा शहर शिमला से २६५ किमी की दूरी पर है। यह किन्नर कैलाश पहाड़ी की बर्फीली चोटी की तलहटी पर बना है। किन्नर कैलाश का हिमाचल में विशेष स्थान है, जो तिब्बती सीमा पर है। कहा जाता है जब असुर भस्मासुर (जिसे वरदान मिल गया था कि वह जिसके सर पर हाथ रख देगा वह भस्म हो जाएगा) शिवजी के पीछे दौड़ने लगा था तब उस दौरान शिव कुछ समय के लिए यहीं पर समाधी लीन हो गए थे। पहाड़ी पर बने शिवलिंग रूपी शिव की परिक्रमा का बहुत महत्त्व है। किन्नर कैलाश २०,००० की उँचाई पर स्थित है। हर वर्ष वहाँ इसकी परिक्रमा करती हुई पदयात्रा का विशेष प्रबंध होता है और उसकी बहुत मान्यता भी है। अच्छे ज़ूम लेंस वाले कैमरे से इसे बख़ूबी देखा जा सकता है। किन्नर कैलाश का शिवलिंग बेहद रोमांच पैदा करता है। साक्षात शिव के कैलाश दर्शन सा। वहाँ भी सेब, देवदार और चिलगोजे के पेड़ों की बहुतायत है।

हमें शहर से ज़रा हट कर जंगल की तरफ़ बने सर्किट हॉउस में रहना था। जहाँ बाहर चारों तरफ़ अद्भुत हरियाली थी। एक तरफ़ नीचे को कल्पा गाँव की तरफ़ जाता हुआ रास्ता था। जिस पर सेब और नाशपाती के पेड़ों की भरमार थी। दूसरी तरफ़ देवदार आदि के पेड़ों का घना झुरमुट। सर्किट हॉउस शायद नया बना है इसलिए शानदार बना हुआ था। होटल की तरह साफ़-सुथरा और सुविधा संपन्न। ख़ूब बड़े कमरे और स्नानघर। कमरे की बड़ी सी खिड़की से सामने का विहंगम दृश्य देख कर हम अपनी सारी थकान भूल गए थे। सामने हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाएँ। अद्भुत आनंद से मैं सिहर उठी थी। लगता है हाथ बढ़ा का छू लो। यहाँ से जंस्कार, हिमालय और धौलाधार पहाड़ियों का अद्भुत नज़ारा दीखता है। हमें वहाँ पहुँचने में शाम हो गई थी। मौसम ठंडा होने लगा था। वहाँ का अटेंडेंट भी बेहद चुस्त और नेक व्यक्ति था। उसने झटपट सामान कमरे में पहुँचाया और हीटर ऑन कर दिया। जल्द ही गरमा गर्म अदरख की चाय और आलू-गोभी के पकौड़े हाज़िर हो गए। ऐसे दिव्य और मनोरम जगहों पर पहुँच कर असीम सुख मिल जाता है। तब लगता है आजीवन वहीं पर बस जाओ। उस भौतिक जीवन में वापस नहीं आना होता तो कितना अच्छा होता।

१९५१ में हुए पहले चुनाव में श्याम शरण नेगी जी (जन्म १९१७ - ९८ वर्ष) जो सबसे पहले वोटर थे इसी कल्पा गाँव में रहते हैं। वे सेवानिवृत अध्यापक हैं। अब वे रुग्णावस्था में शैय्यारत हैं और अपनी पहचानने की शक्ति लगभग खो चुके हैं। उनसे मिलने का सौभाग्य नहीं मिल सका।

रिकांगपिओ -

यह शिमला से २२० किमी पर स्थित है और कल्पा से मात्र ८ किमी। आम लोगों के द्वारा सिर्फ़ पिओ भी कहा जाता है। वह किन्नौर का ज़िला कार्यालय (हेडक्वॉटर) है। वहाँ पर रोज़ की ज़रूरतों को पूरा करने वाला छोटा सा बाजार भी है। खाने-पीने के रेस्त्रां, ए टी एम, कपड़े, फल, सब्जियाँ, पैट्रोल पम्प आदि मिल जातें है। कल्पा व रारंग वालों को रोज़ की ज़रूरतों के सामान लिए रामपुर या पिओ ही आना होता है।

वहाँ से तीन किमी दूर कोठी का मशहूर चण्डिका मंदिर है। इसके भीतर देवी की स्वर्ण प्रतिमा विराजमांन है। मंदिर की काष्ठ कला और नक्काशी अद्भुत है। माँ चण्डिका दुर्गा का ही रूप माना जाता है। कहा यह भी जाता है कि वह असुर वाणासुर जिसका उस समय किन्नौर में प्रादुर्भाव था उसकी पुत्री थीं। वहाँ के निवासियों में उनकी ख़ूब मान्यता है। वहाँ भी भीमाकाली या अन्य किन्नौर के मंदिरों की तरह चमड़े के बैल्ट, पर्स आदि व कैमरे का प्रवेश निषेध है। वहाँ पर रखी हुईं किन्नौरी टोपी या अन्य टोपी से सर ढकना स्त्री या पुरुष सभी के लिए अनिवार्य है।

रारंग गाँव -

रिकांगपिओ से करीब २५ किमी दूर यह एक छोटा सा गाँव है। बेशक कल्पा से रारंग गाँव तक जाने की सड़क बहुत ख़राब थी। जगह-जगह पहाड़ टूटने से सड़कों तक गिरे उनके मलबे और मिट्टी से हालत बदतर थे। हमारी स्कोर्पियो जैसी मज़बूत गाड़ी थी इसलिए सफ़र में कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं हुई। वहीं के कुछ परिचित मित्रों के बताने पर हमने स्कोर्पियो को साथी बनाया था। छोटी गाड़ियों से ये जटिल, खस्ता हाल और सख्त पहाड़ी रास्ते तय नहीं किये जा सकते थे। नीचे एक तरफ़ गाड़ी लगा कर फिर ऊपर गाँव में पहुँचने के लिए आधा किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़नी थी। उस गाँव के लोगों के लिए यह रोज़ की बात थी। ज़्यादातर पुरानी शिल्पकला के मकान थे परन्तु अब पक्के मकान भी बनने लगे हैं। रारंग में भी ख़ूब सेब, चिलगोजे, फाफरा आदि उगाया जाता है। हमें इस गाँव के एक घर में अतिथि बनने का सौभाग्य मिला था। सुबह का समय था इसलिए पहुँचने पर अखरोट, खुबानी और लस्सी से स्वागत हुआ। तत्पश्चात नाश्ते में फाफरे के चिल्टे, घर पर लगे मधुमक्खी के छत्ते का शुद्ध शहद, गाय के दूध से बना ख़ुशबूदार घी और नींबू आदि की चटनी के साथ ओग्ला के ख़ूब स्वादिष्ट चिल्टे भी थे। उनसे बातचीत करते हुए हम उनके गाँव और आस-पास के इलाके के रीति -रिवाज आदि जानते रहे। दोपहर के स्वादु भोजन के उपरांत वहाँ के जनजीवन और संस्कृति को समझते हुए तीन घंटे बीत गए। अच्छा साथ और बातचीत करने को मिले तो समय जैसे उड़ता है। बहुत कुछ और समझना जानना था परन्तु वक़्त इज़ाज़त नहीं दे रहा था। अँधेरा होने से पहले सर्किट हॉउस लौटना था।

विदा होने से पहले नमकीन और मक्खन वाली गुड़गुड़ चाय पीने में अति आनंद आ गया। मैंने इस चाय के बारे में सिर्फ़ सुना था। पीने का अवसर पहली बार मिला था। तीन कप चाय पी। वैसे भी एक बार खाना कोई न दे परन्तु चाय ज़रूर मिलनी चाहिए।

स्वागत कमाल का था और विदाई अविस्मरणीय। घर के मुखिया ने सम्मान देने हेतु सबसे पहले किन्नौरी टोपी पहनाई। उस पर लगे सूखे रंगबिरंगे फूलों की अलग ही शोभा होती है। फिर चिलगोजे की माला पहनाई और उपहार स्वरूप ख़ूबसूरत हाथ से बनी लेस वाला शॉल दिया। इसके अतिरिक्त सेब की पेटियाँ, चिलगोजे, खुबानी, फाफरा, राजमां आदि न जाने क्या-क्या और कब नीचे खड़ी हमारी गाड़ी में रखवा दिया गया था कि पता भी नहीं चला। स्नेह, प्रेम और आदर के इस रूप से अभिभूत होकर हमने उनसे विदा ली। ढेरों सुखद यादों और इस वादे के साथ कि जल्द ही दुबारा अन्य मित्रों के साथ हम ज़रूर आएँगे। अब हमें सर्किट हॉउस वापस पहुँचना था। अगली सुबह नारकंडा के लिए निकालना था। वहाँ से अगले दिन हिमाचल की ढेरों यादें लिए वापसी का सफ़र चंडीगढ़ होते हुए फिर दिल्ली की तरफ़ था।

अंततः कहना ही होगा कि हिमाचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक विरासत, नैसर्गिक सौंदर्य, रीति-रिवाजों और मित्रवत व्यवहार कुशलता के चलते बेहद समृद्ध है। अभी हिमाचल का बहुत सा हिस्सा देखने से रह गया है इसलिए एक बार फिर जाउँगी उन अनदेखी ख़ूबसूरत वादियों, पहाड़ियों को देखने, जीने....


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