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ISSN 2292-9754

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04.08.2016


एक थी कादम्बरी...

लम्बे-पतले फूस की डंडियों से बनी रंग-बिरंगी डलिया और तश्तरियाँ कितनी सुंदर लगती हैं। पीले-हरे ये फूस जिनको जिस रंग में रँग दो उसी रंग के हो जाते हैं। काश मन भी इन फूसों की तरह होता इसे जिस रंग में हम रँगना चाहते ये उसी रंग में रँग जाता। जिसका बनाना चाहते उसी का बन जाता मन में छिपे दुखद अहसासों के घाव और उनके निशान अगर रंगों में रँगकर ढक सकते तो कितना अच्छा होता... लेकिन ऐसा कहाँ होता है?

हँसती-खेलती कादंबरी के सातवीं के इम्तेहान अभी-अभी गुज़रे थे... आज दूसरा ही दिन था कि नानी आज इतवार के दिन घर आई थी। नानी जब भी आती थी... तो बाहर गेट के पास आते ही एक आवाज़ लगाती थी "बिटिया" जिसे सुनकर कादम्बरी के मन में उमंग की लहर दौड़ जाती थी और वो झट से माँ के पास जाकर कहती, "माँ उठो न! ...देखो नानी आई हैं...!" माँ उठकर सबसे पहले आईने में देखती... कहीं उसके होंठों पर लाली तो नहीं लगी या माथे पर बिंदी तो नहीं ..वो माथे की बिंदी उतारकर कही किसी दीवार पर चिपका देती या आईने के किसी छोर पर चंद्रमा का एक टीका लगा देती। कादम्बरी ने जब से होश सँभाला था माँ को ऐसा करते देखा था। कादम्बरी के पूछने पर माँ ने उसे एक दिन बताया था कि ऐसा इसलिए करते हैं क्यूँकि हमारे यहाँ बेटियाँ माँ-बाप के सामने शृंगार नहीं करतीं, ये भी एक संस्कार है। कादम्बरी के मन में सवाल आया... भला ये कैसा संस्कार है? माँ-बाप के सामने शृंगार नहीं कर सकते ये कोई जुर्म थोड़े ही है... माँ-बाप से भी छिपाकर कोई चीज़ की जाती है? ज़्यादा सवाल-जवाब कादम्बरी नहीं करती थी माँ से, माँ के ग़ुस्से के कारण। कादम्बरी ने माँ से कोई सवाल तो नहीं किया लेकिन ये सवाल एक कील की तरह कादम्बरी के मन की दीवार पर कहीं गड़ गया था, साथ ही एक भयानक अहसास की कील भी मन के किसी कोने में रह-रह कर कभी टीस दे जाती थी जिसको कादम्बरी ने मन से निकल तो दिया था, लेकिन घाव भरे नहीं थे। याद अभी मिटी नहीं थी...। उसके पास भी कुछ ऐसा था जो उसने चाह कर भी किसी से कहा नहीं था।

कादम्बरी की नानी यशोधरा और माँ शांति दोपहर की उबासी लेते हुए एक दूसरे से अपने मन की बातें कर रहीं थीं। तभी कादम्बरी मिठाई, चाय, नमकीन, पानी और खाने की और भी सब चीज़ें बड़ी सी ट्रे में रखकर ले आई। ट्रे देखकर माँ की भौंहें कुछ तन सी गईं जिसे कादम्बरी ने भाँप लिया था। लेकिन नानी प्रेम के आगे कादम्बरी ने माँ पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। बातें हुईं ख़ूब सारी बातें। नानी की गाय गौरी की बातें, उनके पट्टे पूत की बातें, नीम के पेड़ की बातें, नीम पर पड़े झूले की बातें, बातों के साथ-साथ कादम्बरी नानी के घर के सुनहरे दृश्य याद कर रही थी।

नानी ने माँ को बताया की इसी लगन में माँ की बुआ की बड़ी बेटी प्रीता की शादी है और नानी चाहती हैं कि माँ और कादम्बरी उनके साथ शादी में जायें। ...ये बात कादम्बरी ने नानी के लिए खाना लाते हुए पर्दों के ओट से सुनी और उसका का मन एक अनदेखे गाँव की कल्पना में खो गया। कल्पना से निकलकर जब कादम्बरी ने नानी के सामने खाने की थाली रखी और माँ का मुस्कुराता चेहरा देखा तो उसे यक़ीन हो गया कि हो न हो ये उसके शादी में जाने का इशारा था कादम्बरी ख़ुश थी कि वो एक ऐसे गाँव जा रही थी जिसके बारे में नानी से कई बार सुन चुकी थी ..अब बारी थी उस गाँव को देखने की..!

शाम हुई और नानी चली गईं। नानी का घर बहुत पास होने के कारण वो अक्सर ही कादम्बरी के घर आ जाया करती थी। कादम्बरी ने बचपन से अपनी माँ से ज़्यादा अपनी नानी के साथ समय बिताया था। जब भी गर्मियों में स्कूल की छुट्टियाँ होतीं ..कादम्बरी अपने घर की खाने की चीज़ों को छोटी-छोटी पोटलियों में भरना शुरू कर देती ताकि वो उन सब चीज़ों को अपने साथ नानी के घर ले जा सके। माँ को दीदी कहती थी और नानी को मम्मी ...नानी को कादम्बरी के मुँह से मम्मी सुनना अच्छा भी लगता था ..और लगे भी क्यूँ न इससे उनकी उम्र घटकर आधी जो हो जाती थी।

शहरी कालोनियों के बीच बसा था कादम्बरी की नानी का क़स्बेनुमा इलाक़ा "झाबुआपुर" जिसे गाँव की संज्ञा मात्र इसलिए नहीं दी जा सकती क्यूँकि वो सरकारी कालोनियों से घिरा था। वहाँ खेत नहीं थे, न गाँव जितने जानवर - लेकिन बाक़ी सब गाँव था। कादम्बरी का जन्म नानी के ही घर पर हुआ था तब उसके माँ–बाप यहीं उसकी नानी के घर पर मात्र 30 रुपये प्रतिमाह के किराए पर रहा करते थे। ..आमदनी बढ़ी और अपना घर बन गया कादम्बरी माँ–बाप और छोटे भाई के साथ अपने घर चली गई। ..घर बदल गया था लेकिन कादम्बरी के लिए माँ तो आज भी नानी ही थी ..और माँ दीदी।

लाल-हरी फूस की डलियों में चावल, आटा, दाल और शृंगार का सामान रखा गया। शादी में जाने की सारी तैयारियाँ पूरी हो गई॥ ..इस तरह नानी... माँ और कादम्बरी की तिकड़ी चल पड़ी सरायखेड़ा गाँव की ओर। वो गाँव जिसके बारे में अब तक कादम्बरी ने सिर्फ सुना था, देखा नहीं था। कादम्बरी ने नानी की बातों में कई बार रामपुर, मानेसर, पुनहेरा, जैसी तमाम जगहों के बारे में सुना था, जहाँ नानी के मायके और ससुराल वाले रहते थे। नानी के रिश्तेदारों के घरों के बीच दूरी बहुत कम थी उनके अनुसार। इस प्रकार कादम्बरी ने अंदाज़ा लगा लिया था कि अगर कोई जाना चाहे तो एक ही दिन में सबके घर का चाय-पानी पिया जा सकता है।

कादम्बरी को नानी की सब बातें अच्छी लगती थीं - एक बात को छोड़कर.. वो थी लड़कियों के बारे में गन्दा बोलना छींटाकशी करना। ..जैसे फलाने की लड़की फलाने के लड़के के साथ भाग गई, ..फलाने की लड़की का चक्कर फलाने के लड़के के साथ है, जैसी तमाम बातें थीं जो नानी और माँ के लिए सहज थीं लेकिन कादम्बरी के लिए "भद्दी टिप्पणीयाँ" थीं, क्यूँकि स्कूल में उसकी जितनी भी सहेलियाँ थीं, उनके घर का वातावरण इन सब बातों के बिलकुल विपरीत था।

नानी की बातों का अहम् हिस्सा रहा करती थीं ऐसी बातें जो कादम्बरी को अच्छी नहीं लगती थीं। लेकिन फिर भी उसको नानी पर बहुत अधिक ग़ुस्स नहीं आता था क्यूँकि वो अभी छोटी थी इन बातों से उसे कोई मतलब भी नहीं था। नानी की ऐसी फब्तियों और छींटाकशी भरी बातों में रास्ता कब कट गया पता ही नहीं चला और रास्ते में धूल भरी हवाओं के बीच में ही टेम्पो वाले ने हार्न बजाकर सबको उतार दिया।

शांति ने कपड़ों से भरा एक बैग पकड़ा था। यशोधरा ने एक बड़ी डलिया सर पर रखी थी और कादम्बरी ने एक छोटा बैग कंधे पर टाँग रखा था। आगे-आगे कादम्बरी, माँ और नानी पीछे थी। दोनों की बातें बदस्तूर ज़ारी थीं।

यशोधरा कह रही थी, "बिटिया बबलू बहुत अच्छा लड़का है, समझदार है, 8वीं पास है ..हमतो कहते हैं कि प्रीता के बियाह में टेम निकाल के बतिया लेना बुआ से। ..बात बन गई तो अगले साल लगन में कादम्बरी को भी निबटा दिया जायेगा। ...कादम्बरी भी अब सयानी हो रही है, अरे हम तो कहते हैं जब बिटिया जब 12 के पार हो जाये तो समझो कि बिटिया सयानी हो गयी और सयानी बेटी ज़्यादा दिन घर में अच्छी बात नहीं। ज़माना बड़ा ख़राब है और हम लोग ठहरे गाँव वाले, शहर में शहरी ज़मीन पर घर बना लेने से हम शहर के तो नहीं हो जायेंगे। हमको अपने संस्कार और मान-मर्यादा का ख़याल रखना होगा। बेटी बोझ बने, इससे पहले ही उसको विदा कर दो, इसी में सबकी भलाई है।"

नानी की ये बातें सुनकर जैसे कादम्बरी के पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस नानी को वो जान से ज़्यादा प्यार करती है और माँ से ज़्यादा माँ मानती है, आज वो माँ ही उसको बोझ, पराया और न जाने क्या-क्या कह गई।

कादम्बरी की आँखें डबडबा गईं और उसने आँसुओं की ओट में सामने दिख रहे धुंधले से गाँव को देखकर नानी से कहा, "अभी कितना सफ़र बाक़ी है?"

जवाब में नानी ने उसे बस एक कोस और कहकर दोपहरी की कड़ी धूप में ठंडी आह भरी। क्यूँकि उन्होंने अपनी सोच का पुलिंदा बेटी के सामने जो रख दिया था। बेटी ने भी उस पुलिंदे को सहेजकर अपने मन के किसी कोने में जगह दे दी थी और माँ की सोच पर हामी भरते हुए कुछ तनी सी भौहों को ढीला छोड़ दिया था।

नानी को थकान होने लगी थी उन्होंने अपने सर का बोझ से भरी डलिया कादम्बरी के सर पर रख दिया और हलकी हो गईं। लेकिन कादम्बरी का सर ऐसे बोझ से लद गया था जो उसकी उम्र और उसके वज़न से बहुत ज़्यादा था। कादम्बरी के दिमाग़ में एक ही नाम गूँज रहा था ....बबलू! ....ये कौन है, कैसा है? जो अचानक कादम्बरी का सबसे बड़ा दुश्मान बन गया था। ऐसा दुश्मन जिसे उसने कभी देखा नहीं था। कादम्बरी की गाँव देखने की सारी उत्सुकता समाप्त हो गई थी। वो अभी इसी वक़्त भाग जाना चाहती थी वहाँ से दूर, माँ से दूर, नानी से दूर उस गाँव से दूर बहुत दूर। ...लेकिन वो नहीं जा सकी। .....उसे रोक लिया था किसी चीज़ ने शायद वो चीज़ संस्कार रही होगी या कोई मज़बूरी ...बेबसी या लाचारी ....जिसे संस्कार का रूप देना उसने माँ और नानी से ही सीखा था।

आख़िरकार वो दहलीज़ भी क़रीब आ गई जिसे पार कर कादम्बरी को महसूस हुआ कि वो अचानक ही जवान हो गई, अपने लिए नहीं दूसरों के लिए। कुछ आँखें थीं और कुछ बातें जो कादम्बरी को एक नई दुनिया का अहसास करा रहीं थी। यहाँ बहुत लोग ऐसे थे जिनके लिए वो होने वाली बहू के रूप में देखी जा रही थी ।

कादम्बरी ने अपने उस दुश्मन को भी देखा जिसे वो रास्ते में गलियाँ देती हुई आ आयी थी। ...उसे देखकर कादम्बरी को लगा कि वो तो भोला-भाला, मासूम सा लड़का था, जैसा कि उसकी क्लास में पढ़ने वाला उसका दोस्त प्रभात, जो उसका बहुत अच्छा दोस्त है। न जाने क्यूँ आज कादम्बरी का दिल उस 16 साल के बबलू के सामने आकर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। सब लोग बार–बार कादम्बरी और बबलू को एक साथ किसी काम को करने को कहते लेकिन कभी कादम्बरी मना कर देती तो कभी बबलू। दो दिन बीत गये शादी में एक ही दिन बचा था। घर में मेहमानों का जमावड़ा बढ़ने लगा। वहाँ हर वो मेहमान आने लगा जिसे कादम्बरी ने नानी के घर में या तो मामा–मौसी की शादी में देखा था ....या किसी तीज त्यौहार में। ...इन मेहमानों में एक मेहमान ऐसा भी था जिसे देखकर कादम्बरी के अतीत के एक पन्ने की स्याही में गरमाहट सी आ गई और स्याह याद का एक टुकड़ा आँख की पुतली पर उभर आया। ...चन्दन, हाँ यही नाम था जिसे कादम्बरी कभी नहीं भूल सकी। यशोधरा के देवर का बेटा ...माँ की मौसी का बेटा। यानी कादम्बरी के रिश्ते से उसका मामा। ...चन्दन कादम्बरी से पाँच साल बड़ा था। बहुत शैतान उपद्रवी और चंचल, पैर कही टिकते ही नहीं थे। उसकी शैतानियों से तंग उसके माँ-बाप ने कादम्बरी की नानी यानी चन्दन के बड़े पापा, बड़ी मम्मी के पास भेज दिया ..जहाँ मिले कादम्बरी और चन्दन। ...कादम्बरी के स्कूल में गर्मी की छुटियाँ थीं। वो जब नानी के घर गई तो उसको चन्दन वहाँ मिला। ...अपने से 5 साल छोटी लड़की को बिटिया कहता था। ...कादम्बरी की उससे से हमेशा लड़ाई होती रहती थी। ..शरारत जो इतनी करता था। लेकिन कादम्बरी के साथ कोई खेलने वाला नहीं था, यही सोचकर कादम्बरी उसके साथ खेल लेती थी। कादम्बरी बचपन के घर-घर को चन्दन के साथ खेलती रही। हँसती रही। यही सोच कि जब उसकी छुट्टियाँ ख़त्म हो जाएँगी तो वो अपने घर चली जाएगी। ..उसको लौटना ही होगा अपनी स्कूल की दुनिया में, अपने माँ-बाप के पास, अपने स्कूल के दोस्तों के पास।

छुट्टियाँ बीत गई थीं, कादम्बरी अपने घर आ गयी। घर आकर कादम्बरी को चन्दन की कुछ ख़ास याद नहीं आती थी। बस याद आता था तो उसका मसखरापन मज़ाकिया अंदाज़ बोलने का और कपड़े पहनने का अटपटा सा ढंग, जिसे सोचकर अकेली बैठी कादम्बरी मुस्कुरा देती थी। ......जब उसे याद आता कि कैसे चन्दन कभी-कभी उसके साथ मज़ाक में कुछ ऐसा कर देता जो उसे हँसी नहीं ग़ुस्सा दिलाता। ...कादम्बरी मन ही मन खीज उठती थी। ..लेकिन अगले ही पल की उसकी कोई भोली शरारत उसके मुस्कुराने की वज़ह बन जाती थी।

समय बीतता गया ऐसे ही। ....सावन के दिनों में बरखा का पानी कब बरस जायेगा इसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। .....इन दिनों में बच्चों के तो ख़ूब मजे होते हैं। हफ़्ते में एक रविवार के अलावा भी कभी अगर थोड़ी देर के लिए ही बारिश की बूँदे तेज़ होतीं तो माँ-बाप स्कूल नहीं जाने देते या स्कूल ख़ुद ही सार्वजनिक छुट्टी कर देते और रैनी डे की ये अकस्मात् छुट्टी बन जाती फ़न डे। कुछ ऐसा ही हाल हुआ उस रोज़। ...चौथी में पढ़ने वाली कादम्बरी स्कूल से लौट आई थी। रास्ते में उसने घर जाकर ख़ुद के लिए कुछ फ़ुर्सत के पलों में अपनी ही अलग दुनिया के कुछ ग़ैर ज़रूरी कामों की लम्बी सी फ़ेहरिस्त तैयार कर ली थी, जिनको घर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मन ही मन दोहराया और सीधी किचेन में माँ के पास जाकर छुट्टी की सारी रामकहानी बता दी। माँ को चमचमाती चूड़ियों और नये कलफ की साड़ी में देखकर जब कादम्बरी ने वज़ह पूछी तो पता चला की माँ पिता जी के साथ नानी के घर जा रही है। नानी ने पूजा रखी है… इसलिए वहाँ पापा के साथ जा रही है। ...तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। माँ ने कादम्बरी को बाहर की सुध लेने भेजा तो पता चला, कादम्बरी के नाना आये हैं और साथ में चन्दन भी है, जो कादम्बरी की माँ को दीदी कहकर पुकारते हुए सीधे किचन में आ खड़ा हुआ। नाना ने आधी सुलग चुकी बीड़ी का कश मुँह से बाहर कर, बीड़ी को कनपुरिया टायर के चप्पलों से यूँ मसल दिया जैसे कोई अपनी किसी मात का बदला बेचारी निर्जीव सी चीज़ को ख़त्म कर, लेना चाहता हो। ...चाय की चुस्कियों के साथ ही बातें हुईं। बातों का सफ़र जब ख़त्म हुआ तो कादम्बरी के नाना, माँ और पिता जी नानी के घर जाने को तैयार थे और चन्दन का मन था रुकने का और जाने के लिए साधन भी नहीं था तो वो रुक गया।

घर पर कादम्बरी उसका छोटा भाई सुमित और चन्दन ही थे। कादम्बरी अपनी गुड़िया के कपड़े सिलती रही। ...छोटा भाई सुमित और चन्दन लूडो खेलते रहे। दोपहर की भीगी उबासी ने जब तीनों को थका दिया तो तीनों ने सोचा कुछ देर आराम कर लिया जाए। ...लेटे-लेटे कहानियों और किस्सों का दौर चला .....सुमित सो चुका था और कादम्बरी की आँखें भी मुँदने लगी थीं। बारिश शुरू हो चुकी थी। कादम्बरी को याद आया कि छत पर माँ ने कपड़े फैलाये थे जिनको उतारकर लाने को माँ कह गई थी। कादम्बरी उठी और कपड़े लेने चली गई। कपड़े लेकर आई ...उसने कपड़ों को अलमारी में तहाकर रख दिया। और उबासी की जम्हाई लेते हुए बिस्तर पर लेट गई। चन्दन सोया नहीं था वो शायद किसी इंतज़ार में था जो अब पूरा हुआ था। ...उसने कादम्बरी के क़रीब जाकर उसको कुछ इस अंदाज़ से छुआ जिससे आठ साल की कादम्बरी अनजान थी। ...लेकिन चन्दन सब जानता था। ...कादम्बरी को यूँ वो अहसास बुरा लगा कि उसका मन झुँझला गया लेकिन वो मन के अहसास ख़ुद में दबाये ही सिहर गयी और आँगन में जाकर बाहरी छज्जे पर टिक गयी। चन्दन किसी खेल में हारे सिपाही सा भीतर कमरे में पड़ा रहा।

बारिश की बूँदों की खनखन बंद हो चुकी थी, लेकिन कादम्बरी के मन में सवालों की घंटियाँ बज रहीं थीं। हौंडा गाड़ी का सायरन भी बज उठा। माँ और पिता आ गये। पीछे से नाना भी जो पूजा का ढेर सारा प्रसाद और खाने की चीज़ों से भरी एक बड़ी कांसे की डलिया लाये थे, जिस पर गुलाबी रंग की सूती धोती का टुकड़ा बँधा था। शायद नानी ने इस बार इस धोती को फाड़ कर टुकड़े कर दिए होंगे ताकि सबके घर जाने वाले सामान को कोई देख नहीं सके। नाना के साथ चन्दन भी चला गया। ...ऐसा कुछ था जो पहली बार हुआ था, जिसे वो ख़ुद नहीं समझ पाई थी ...और किसी से कुछ पूछ भी नहीं सकी थी।

छुट्टियाँ बीत गयीं ..और इसी तरह बीत गये बरस कई बरस ...लेकिन चन्दन कादम्बरी एक दूसरे से नहीं मिले।

एक रोज़ माँ के गाँव का चन्दन के साथ कोई आया था जो ये बता रहा था कि चन्दन की शादी तय हो गयी है। कादम्बरी चाय की ट्रे लेकर सामने खड़ी थी एक टक चन्दन को देखती हुई और चन्दन नज़र चुराए झूठी हँसी में अपनी दीदी से बातें कर रहा था अपनी शादी की बातें। दहेज़ की बातें। अपने मजदूरी के काम में मिलने वाली सौ रुपये दिहाड़ी की बातें। ...कादम्बरी की आँखों में चन्दन के साथ बिताया हर लम्हा तैर गया ...एक आवाज़ से लम्हों की रेल रुकी "बिटिया" ....चन्दन की आवाज़ थी। उसने कादम्बरी को पुकारा था …"बिटिया शादी में ज़रूर आना"। ...इस बुलावे को कादम्बरी ने सिरे से नकार कर कह दिया "नहीं आ पाऊँगी ...स्कूल छूट जायेगा"। ...कहने को बहुत कुछ था लेकिन कादम्बरी किसी से कुछ न कह सकी पता नहीं क्यूँ।

वक़्त ने नन्ही कादम्बरी के दिल पर कुछ ऐसा लिख दिया था जिसे कादम्बरी चाहकर भी मिटा नहीं पाती थी। ..बस कुछ सोचकर ख़ुद पर ही अकेले में हँस दिया करती थी और पलकें थरथराते होंठों के साथ भीग जाती थीं।

अचानक एक आवाज़ आई ..जिसने कादम्बरी को अतीत से वर्तमान की ज़मीन पर पटक दिया . सामने चन्दन था।

"कादम्बरी बिटिया कैसी हो?" कब आई? दो सवाल, दो… दो आँखें और दो इंसान। ...कादम्बरी अपने अंतर्मन की गहराई में जवाब खोज रही थी। पल भर के लिए सब धुँधला हो गया। आँखों से गिरी ओस ने सब हरा कर दिया...। .....साफ़ आँखों से जब कादम्बरी ने देखा तो चन्दन दूर किसी और से बात कर रहा था। कई सवाल थे पर कादम्बरी किससे पूछती? क्या पूछती?

कादम्बरी कहीं और जाने के लिए उठी तो कुछ औरतों ने रोक कर उससे पूछताछ शुरू कर दी। खाना बना लेती हो या नहीं? ये आता है वो आता है जैसे कई सवाल थे। बार-बार बबलू और कादम्बरी को साथ किसी काम को करने को कहा जाता।

रात की जगमगाहट में हर काली बात छिप गई। ..रात आई, बारात आई, शोर हुआ, मन का सन्नाटा थम गया। रस्में हुईं, फेरे हुए ...चन्दन के चेहरे पर एक अनजना सा डर था जिसको कादम्बरी ने भाँप लिया था। दो दिन की मुलाक़ात में वो कादम्बरी से दूर-दूर ही था। शादी... सजावट ...कई चेहरे और चहरों पर लटका एक नक़ली मुखौटा जिसे कादम्बरी ने क़रीब से महसूस कर लिया था...। कितनी औरतें, लड़कियाँ, बच्चियाँ ...ज़िंदा जिस्म, मुर्दा अहसास... बढ़ती उम्र, घटती ज़िंदगी, ...घुलते अरमान, घुटती साँसें... । हर चेहरे में कादम्बरी ने अपने उसी घाव का अहसास पाया जिसकी टीस वो अब भी अपने शरीर ही नहीं आत्मा पर भी महसूस किया करती है। उसको लाया गया था यहाँ इसी जमात से मिलाने... उसमें शामिल करने की बात पक्की करने।

बारात विदा हो गयी मेहमान जाने लगे। चन्दन कब गया कादम्बरी को पता नहीं चला। बीते चंद दिन कादम्बरी को बहुत कुछ ऐसा दे गये जिसकी परतों को वो अब अपने साथ ले जा रही थी सदा के लिए...। कादम्बरी वापस अपने घर जाने के लिए माँ और नानी के साथ वैसी ही धूल उड़ाने वाली एक जीप में बैठ गयी जिसमें आई थी। उसके साथ कुछ और लोग भी बैठे। नानी के ही रिश्तेदार थे उनको रास्ते में उतरना था। ..जीप चल पड़ी और प्रीता मौसी का घर पीछे कहीं दूर छूटता गया। ..साथ चल पड़ा यादों का कारवां। ....कादम्बरी की आँखों में उभर आये आँसुओं को देख नानी ने पूछा कि किसको याद करके रो रही हो बिटिया? कादम्बरी के पास कोई जवाब नहीं था। ये आँसू याद करके नहीं, कुछ भूलने की कोशिश में आ गये थे, कह देने की जो ज्वाला उसके मन में कभी-कभी जल उठती थी अब उसकी राख भर बची थी। मन और सुलगता धुआँ आँखें जला रहा था। कादम्बरी ने जिस सोच को भूलने के घूँट हलक़ से नीचे उतारे, वो बिलकुल पीसे हुए उन नीम की पतली डंडियों की तरह लग रहे थे जिनको रोज़ ही माँ को उसके पिताजी ये कहकर पीने को देते थे कि इससे शरीर के कई रोग मर जाते हैं। उस जूस को एक बार कादम्बरी ने मज़ाक में पीने की कोशिश की थी। उसका कसैलापन आज ज़ेहन में ताज़ा हो गया था ....इस घूँट के साथ। कादम्बरी सोच में डूब गयी ....काश कोई नीम होती जो मन के रोगों को मार देती। याद के उन क़तरों को मिटा देती ..जो अनायास ही आँखों से बरस पड़ते हैं बिना कुछ कहे ...और हम बहते उन आँसुओं को वैसे ही छिपा लेते हैं जैसे माँ नानी के आने पर अपनी बिंदी छिपा लिया करती हैं ......।


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