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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


भवसागर से अच्छा होगा

उम्र बढ़ी या घटी न जानूँ
अभिलाषा घर जाने की
अच्छे बुरे किये जैसे भी
कर्मों का फल पाने की।

चंचल मन विषयों को पकड़े
बुद्धि तामस ग्रस्त रहे
अधिकारों की लिप्सा मोहे
कर्तव्यों से दूर रहे

वस्त्र बदलना नहीं चाहती
सर्व शक्तिमान काया
अर्थ पारायण कर्म कराती
भ्रमित चित्त की माया।

स्वर्ग मिले या नर्क मिले
प्रभु के सभी विहार
भव सागर स अच्छा होगा
भव सागर के पार।


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