अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.17.2018


असहिष्णु बादल

अषाढ़, सावन भादों निकले
रिमझिम बरसे बादल।
अपना नाम लिखाती वर्षा
निकली झलका छागल।
हिनहिनाते घोड़े जैसे, बादल निकल गये।

जाने कब से बैर बाँचते
राजनीति के पिट्ठू।
खोज रहे थे अवसर बैठे
वाज दौड़ के टट्टू।
देख बिगड़ता मौसम घोड़े, तिल से ताड़ हुए।


गत वर्षों के चलते चलते
घटित हुआ कुछ ऐसा।..
अर्ध सत्य वे लिखकर गाकर
पाये आदर पैसा।
दाता का जब हुआ इशारा, वे बलिदान किये।


मानवता की परख पखरते
अर्ध सत्य उद्घोषक।
सहिष्णुत को गाली देकर
पक्के बने विदूषक।
जिनसे थी अपेक्षित समता, वे विग्रह दूत हुए।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें