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08.05.2007
 
सौगात
लावण्या शाह

जिस दिन से चला था मैं,
वृन्दावन की सघन घनी
कुंज गलियों से,
राधे, सुनो, तुम मेरी मुरलिया
फिर, ना बजी!
किसी ने तान वंशी की
फिर ना सुनी!

वंशी की तान सुरीली,
तुम सी ही सुकुमार
सुमधुर, कली सी,
मेरे अन्तर में,
घुली - मिली सी,
निज प्राणों के कम्पन सी
अधर रस से पली पली सी!

तुम ने रथ रोका -- अहा! राधिके!
धूल भरी ब्रज की सीमा पर,
अश्रुरहित नयनों में थी
पीड़ा कितनी सदियों की!
सागर के मन्थन से
निपजी, भाव माधुरी
सौंप दिये सारे बीते क्षण
वह मधु-चंद्र - रजनी,
यमुना जल कण, सजनी!

भाव सुकोमल सारे अपने
भूत भव के सारे वे सपने
नीर छलकते हलके हलके
सावन की बूँदों का प्यासा
अंतर मन चातक पछताता
स्वाति बूँद तुम अम्बर पर
गिरी सीप में, मोती बन!

मुक्ता बन मुस्कातीं अविरल
सागर मंथन सा मथता मन
बरसता जल जैसे अम्बर से
मिल जाता दृग अँचल पर!
सौंप चला उपहार प्रणय का
मेरी मुरलिया, मेरा मन!
तुम पथ पर निस्पंद खड़ी,
तुम्हे देखता रहा मौन, शशी
मेरी आराध्या, प्राणप्रिये,
मन मोहन मैं, तुम मेरी सखी!

आज चला वृंदावन से---
नही सजेगी मुरली कर पे---
अब सुदर्शन चक्र होगा हाथों पे
मोर पँख की भेंट तुम्हारी,
सदा रहेगी मेरे मस्तक पे!


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