अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
08.05.2007
 
हर बार ज़िंदगी जीत गई!
लावण्या शाह

किसने किया किस का इन्तज़ार?

क्या पेड़ ने फल फूल का?
फल ने किया क्या बीज का?
बीज ने फिर किया पेड़ का ?
हर बार, ज़िंदगी जीत गई!

प्रेमी ने पाई परछाईं,
अपने मस्ताने यौवन की
पिया की कजरारी आँखों में,
शिशु मुस्कान चमकती सी
और उस बार भी ज़िंदगी जीत गई!

हर पल परिवर्तित परिदृश्यों मे
उगते रवि के फिर ढलने में,
चन्दा के चँचल चलने में
भूपाली के उठते स्पंदन में
रात, यमन तरंगों में,
हर बार ज़िंदगी जीत गई!

साधक की विशुद्ध साधना में
तापस की अटल तपस्या में
मौनी की मौन अवस्था में,
नि:सीम की निशब्द क्रियाओं में
मुखरित, हर बार ज़िंदगी जीत गई!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें