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05.17.2009
 

ये किस कुसूर की सज़ा मुझे दी है तुमने
कुसुम सिन्हा


ये किस कुसूर की सज़ा मुझे दी है तुमने
मेरी आँखों में इक नदी छुपा दी है तुमने

हवा चले न चले हरदम दहकती रहती है
मेरे दिल में ये कैसी आग लगा दी है तुमने

आँखें झरती हैं तुम्हें याद करने से पहले
मेरे दिल में ये कैसी चाह जगा दी है तुमने

मौत के नाम से ही डर लगा करता था
मुझे हर साँस में मरने की सज़ा दी है तुमने


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