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01.22.2009
 

ये हवा
कुसुम सिन्हा


पेड़ों को झकझोरती आँचल उड़ाती है हवा
जाने किसकी याद में बेचैन लगती है हवा

मन चली हिरणी सी वह भर भर कुलाचें हँस रही
जाने किससे मिलने को दैाड़ी ही जाती है हवा

किन गुलाबों को सहलाती सूँघती आई है यह
उनकी ख़ुशबू लेके फिर मदमस्त लगती है हवा

गुनगुनाती चल रही भँवरों तितलियों के संग
फिर नदी के जल में भी लहरें उठती है हवा

कितना भी रोको उसे पर रुक नहीं पाती है वह
जाने क्या संदेश ले उड़ती ही जाती है हवा

यादों के बादलों को जाने कहाँ उड़ा ले जाती है
पलभर को सही दिलों में पुलक भरती है हवा


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