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पेड़ों को झकझोरती आँचल उड़ाती है हवा
जाने किसकी याद में बेचैन लगती है हवा
मन चली हिरणी सी वह भर भर कुलाचें हँस रही
जाने किससे मिलने को दैाड़ी ही जाती है हवा
किन गुलाबों को सहलाती सूँघती आई है यह
उनकी ख़ुशबू लेके फिर मदमस्त लगती है हवा
गुनगुनाती चल रही भँवरों तितलियों के संग
फिर नदी के जल में भी लहरें उठती है हवा
कितना भी रोको उसे पर रुक नहीं पाती है वह
जाने क्या संदेश ले उड़ती ही जाती है हवा
यादों के बादलों को जाने कहाँ उड़ा ले जाती है
पलभर को सही दिलों में पुलक भरती है हवा
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