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05.31.2008
 
प्रिय तुम मेरी कविता हो
कुसुम सिन्हा

प्रिय तुम मेरी कविता हो

तेरे दो चंचल मुग्ध नयन
जब शर्मा कर झुक जाते हैं
मन के आँगन में सपनों के
तब फूल खिल जाते हैं

लगती उर्वशी या रंभा हो
प्रिय तुम मेरी कविता हो

लहराते आँचल को जब तुम
बाहों में बाँधकर चलती हो
तब इन्द्रधनुष भी संग तेरे
चलने को जैसे मचलता हो

मादक सी मस्त हवा हो तुम
प्रिय तुम मेरी कविता हो

बिखरी ज़ुल्फ़ों के बीच कभी
मुख चाँद सा तेरा दिखता है
लगता है घने बादलों से
कोई चाँद झाँकता है

तुम तो प्यार की भाषा हो
प्रिय तुम मेरी कविता हो

तेरे पायल की रुनझुन जब
मन के सितार पर बजती है
मन मतवाला हो उठता है
जब गीत कोई तुम गाती हो

प्यार का मीठा झरना हो
प्रिय तुम मेरी कविता हो

तन मन की सारी थकन प्रिय
बस पल में ही मिट जाती है
जब मुस्काकर कुछ शर्माकर
तुम प्यार की बातें करती हो

जीवन की प्रिय तुम आशा हो
प्रिय तुम मेरी कविता हो

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