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पूरब के नभ से धरती पर जब फैली सोने की चादर
किरणों में फिर नहा नहा फूलों को हँसते देखा है
हुई प्रस्फुटित जब कलिकाएँ मुस्काती जब फूल बनीं
प्यार हुआ तब उदित हृदय में तन मन रँगते देखा है
जब किसी शिशु को देखा मैंने फूलों से होठों से हँसते
अपने ही शैशव की छवि को उनमें प्रतिबिम्बित देखा है
भँवरे जब गुनगुन के स्वर में गीत प्रणय के गाते हैं
कलियों को तब चटक चटक फूलों में ढलते देखा है
बादल के पीछे मुस्काता आ जाता है चाँद गगन में
मन में सोए सपनों को तब रूप नए धरते देखा है
चली हवा जब मतवाली सी पेड़ों से टकराती सी
हाथ हिलाकर मुझे बुलाती कुछ-कुछ कहते देखा है
किसी शाम को कभी श्याम घन छा जाते हैं अंबर में
आँसू की बूँदों मे तेरी यादों को ढलते देखा है
वर्षा की बूँदे जब झर-झर तन मन सिहरा जाती हैं
मन के आँगन में फिर से चाह नई उगते देखा है
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