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05.31.2008
 
काश हृदय पत्थर का होता
कुसुम सिन्हा

पाकर चोट न झरते आँसू
नहीं हृदय से आह निकलती
प्यार और विश्वास में छ्ल पा
दिल का शीशा चूर न होता

हृदय बनाकर यदि वो ईश्वर
कठिन प्यार की चाह न देता
तो फिर जीना शायद इतना
पीड़ा से बोझिल न होता

निर्विकार सह लेता सुख दुख
हास अश्रु औ’ प्यार न होता
नहीं हृदय टूटा करता तब
नहीं कोई मर मरकर जीता

पीड़ा का अभिशाप दिया जो
मन तो फूलों सा न बनाता
क्रूर नियति से चोटें खा खा
दो दिन में ना मुरझा जाता

विरहन चकई की चीखें सुन
चाँद कभी आँसू ना रोता
शब्द बाण फिर हृदय चीरकर
सारा लहू न अश्रु बनाता

काश हृदय पत्थर का होता ....

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