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05.31.2008
 
बहके पाँव
कुसुम सिन्हा

भावना के ज़ोर से दरवाज़ा बन्द करने का कारण? कहीं वह गुस्से में तो नहीं है? बच्चे अपने कमरे में सो रहे थे। सुबह उठकर उन्हें स्कूल जाना होता था इसलिए जितेन्द्र उन्हें आठ बजते बजते सुला देते थे। भावना को ना बच्चों की चिन्ता करने की ज़रूरत महसूस होती ना वह इसे अपना दायित्व ही समझती थी। वह तो एक सपनों की दुनियाँ में रहती थी, जिसका वास्तविक दुनियाँ से कुछ लेना देना नहीं होता था। जब युवक उसकी तरफ मुस्कुराकर देखते वह खुशी से फूली न समाती थी। वह शादी-शुदा और दो बच्चों की माँ है किसी को कहाँ बताती थी? देर रात तक क्लबों में डाँस करना, नए-नए युवकों से दोस्ती करना और देर रात तक बाहर घूमना इन सब से उसे फ़ुर्सत ही कहाँ थी? जहाँ कहीं क्लब में कोई परिचित मिल जाता जो उसे या जितेन्द्र को जानता होता, वह उस क्लब में दूसरे ही दिन से जाना छोड़ देती। कोई लड़का जो अपार्टमेंट में अकेला रहता होता, उसके बुलावे पर उसके फ्लैट पर चली जाती। आधी रात को घर लौटती और चुपचाप सो जाती। जितेन्द्र ने उसे कहना छोड़ दिया था क्योंकि उसने उससे कहा था कि वह उन्हें तलाक देना चाहती है। वह नहीं चाहती कि कोई उसे विवाहित और दो बच्चों की माँ समझे। वैसे भी वह लगती नहीं थी कि वह तैंतीस वर्ष कि हो चुकी है। वह पच्चीस-छब्बीस वर्ष से ज्यादा कहाँ लगती थी। कपड़े भी वैसे ही पहनती और मेकअप वगैरह भी वैसे ही करती। नए से नए फैशन के कपड़े, खूब ऊँची एड़ी का सैंडिल और मन मोहक अदाएँ। उसके चाहने वाले अनेक थे। कभी-कभी वह जितेन्द्र को भी कहती – “देखो, तुम चाहो तो अपने लिए लड़की देख सकते हो। मैं बुरा नहीं मानूँगी, क्योंकि मैं तो अपने लिए लड़का ढूँढ ही रही हूँ, जैसे ही मुझे कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा, मैं तुम्हें छोड़ दूँगी”, और फिर कोई फ़िल्मी गाना गाने लगती। जितेन्द्र उसके हाव-भाव देख चकित रह जाते थे। कितना सस्तापन झलकता था उसके हाव-भाव में। लगता ही नहीं था कि वह इतने अच्छे परिवार की लड़की है और इतने अच्छे परिवार की बहू। बच्चे भी बड़े हो रहे थे, वे क्या सोचेंगे – इसकी भी चिन्ता उन्हें सताती। उल्टा जितेन्द्र ही सशंकित रहते कि लोग जानेंगे कि वह पराए पुरुषों के साथ रात-रात भर बाहर रहती है, तो वह लोग क्या कहेंगे? लेकिन वह कब सुननेवाली थी। समझाने की कोशिश करते तो कहती – “मेरी चिन्ता करने की तुम्हें कोई ज़रूरत नहीं है, तुम बस अपनी चिन्ता करो। जिस दिन मुझे कोई अच्छा जीवन-साथी मिल जाएगा, मैं तुम्हें छोड़ दूँगी। बच्चों की ज़िम्मेदारी भी तुम्हारी है। उसमें मैं पड़ने वाली नहीं हूँ।“ कभी-कभी बच्चे पूछते – मम्मी तुम इतनी देर कहाँ थी तो वह बड़ी सफ़ाई से कहती – “मैं पढ़ाई कर रही हूँ ना इसलिए लाईब्रेरी में पढ़ रही थी।“ वैसे बच्चों को माँ से लगाव नहीं के बराबर था, फिर भी वे चाहते थे कि औरों की तरह माँ कहानियाँ सुनाए, बातें करे और खाना बनाकर उन्हें खिलाए। सब कुछ तो जितेन्द्र ही करते थे। उन्हें तैयार करना, खाना खिलाना, टिफन देना और बाहर ले जाना। भावना को इनकी चिन्ता नहीं थी। सजने-सँवरने, घूमने, फ़िल्में देखने से उसे फ़ुर्सत कहाँ थी। बाकी समय में अपने पुरुष मित्रों को ई-मेल करना। इन सब से उसे समय मिलता तो सोचती। दो चार दिन किसी के साथ घूमती फिर किसी दूसरे के साथ घूमती नज़र आती। ऐसे मनचलों की कमी नहीं थी जो उसके रूप की प्रशंसा करते उसके इर्द-गिर्द भँवरों की तरह मँडराते। अपने रूप की प्रशंसा सुनना उसे बहुत पसन्द था। यहाँ तक कि उसकी प्रशंसा कर कोई भी उसे हासिल कर सकता था, उसे इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती थी।

तभी आया था क्लब में रवीन्द्र और उसके साथ ही आया था अतुल। अतुल तो यहीं न्यू यॉर्क में करीब दो वर्षों से था। लेकिन रवीन्द्र पहली बार आया था भारत से हाल ही में और आज अतुल उसे क्लब में ले आया था। रवीन्द्र ने उसे बताया कि जालंधर में उसके पिता का व्यवसाय है। लेकिन उसे व्यवसाय में रुचि नहीं थी, इसलिए उसने इन्जीनियरिंग की पढ़ाई की थी और यहाँ चला आया था। माँ बाप का बिल्कुल मन नहीं था कि वह अमेरिका जाए लेकिन उसकी ज़िद के आगे लोगों ने हथियार डाल दिए थे। आखिर वह उनका इकलौता बेटा था बेटियाँ दो थीं और दोनों की शादियाँ हो चुकी थीं। उन्होंने सुन रखा था कि वहाँ लोग खुद ही खाना बनाते हैं, कपड़े धोते हैं और गाड़ी भी खुद ही चलानी होती है। खुद ही बर्तन भी धोने पड़ते हैं और बहुत आराम से रहने की आदत थी रवीन्द्र की! एक आशा कभी कभी सर उठाती शायद रवीन्द्र जल्दी ही लौट आएगा क्योंकि उसे तो बहुत आराम में रहने की आदत थी। नौकर-चाकर हाथ बाँधे सामने खड़े रहते थे कैसे वहाँ रह पाएगा? एक गिलास पानी भी तो उसने खुद उठाकर नहीं पिया था। हरेन्द्र जी का इकलौता बेटा था वह।

उस दिन क्लब में रवीन्द्र से परिचय होने पर भावना ने जब डाँस करने के लिए रवीन्द्र की ओर हाथ बढ़ाया वह शर्म से लाल हो गया। भावना ने आगे बढ़कर उसका हाथ जब पकड़ा और कहा – चलो डाँस करते हैं तो उसने घबराकर भावना से कहा- “मुझे डाँस करना नहीं आता।“

भावना को यह युवक इतना अच्छा लगा कि वह उसके साथ के लिए बेचैन हो उठी। वह उसे अपने साथ खींचकर एक टेबल पर ले गई और बातें करने लगी। उसीने उसे खाना भी खिलाया और बियर भी पिलाई। आखिर यह अमेरिका है! सोच रही थी बातें भी कितनी अच्छी करता है। देखने में भी सुन्दर और कितना सरल लगता है। लेकिन रवीन्द्र को भावना की बेबाकी अजीब लग रही थी। पहली बार ही तो वे मिल रहे थे और वह उसके साथ डाँस करने को तैयार हो गई। जो कुछ भी उसने अमेरिका के बारे में सुन रखा था उससे तो डरना ज़रूरी ही लग रहा था। पता नहीं यह लड़की कैसी है? भावना भी पूरे मेकअप के साथ ही होती थी।

अब तो वे रोज़ ही मिलने लगे थे। हर शाम वह उसके अपार्टमेंट में पहुँच जाती और उसे नई-नई जगहों में ले जाती। दोनों ने अब तो सारी सीमाएँ तोड़ डाली थीं। भावना उसे बताया कि उसने अभी अभी ग्रेजुएशन किया था और नौकरी करनी शुरू की थी। कुछ ही दिनों के बाद वह छुट्टी लेकर योरूप घूमने जाने वाली थी। इस बीच छह महीने हो गए थे उसे भारत से आए। उसके मन में आया कि क्यों न वह भी साथ ही घूम आए? वह अभी सोच ही रहा था कि एक दिन फ़ोन आया और किसी ने बताया कि उसके पिताजी की मृत्यु हो गई है। वह फूट-फूट कर रो पड़ा था। उसके सारे सपने तो पिता के सहारे खड़े थे। नहीं तो व्यापार और घर गृहस्थी की देख-भाल कौन करता? फिर उसे याद आया कही ना कही उनकी मृत्य ा कारण वही है। कैसे उसके आने के समय वे फूट फूट कर रोने लगे थे। वैसे तो बड़े साहसी और सूझ-बूझ वाले व्यक्ि थे। अपने आँसू पोंछते हुए उन्होंने कहा था – “तुम्हारी इच्छा है तो जाओ लेकिन भविष्य अच्छा नहीं दीख पड़े या मन नहीं लगे तो लौट आना।“ सिर्फ़ उसका मन रखने के लिए ही उन्होंने उसे अमेरिका जाने की आज्ञा दी थी। संतान के लिए तो लोग त्याग करते ही हैं। पहले वे सोचते रहे थे कि बड़ा हो जाएगा तो व्यापार में मेरी सहायता करेगा। बेटियाँ तो ससुराल चली जाएँगी लेकिन यह मेरे सार काम संभाल लेगा। उसकी शादी करूँगा और उसके बच्चों के साथ दिन बिताऊँगा। उसने फिर सोचा उनकी मौत मेरे कारण ही हुई है। कितना प्यार करते थे वे उसे। उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। हो सकता है निराशा और असहायता के कारण वे टूट गए हों।

उसने टिकट कटाया और जालंधर के लिए निकल पड़ा। रास्ते में उसे भावना का फ़ोन आया – “देखो आज शाम क्रिसमिस की पार्टी है। तुम ज़रूर आना। उसी जेड क्लब में।“ तभी रवीन्द्र ने रोते-रोते उसे बताया कि उसके पिता की मृत्यु अचानक हो गई है और वह अभी भारत लौट रहा है। वह फिर रोने लगा था। भावना ने घबराकर कहा – “अरे हिम्मत रखो। ऐसे कोई रोता है? अच्छा वहाँ पहुँच कर मुझे फ़ोन करना।“ पापा को बहुत को बहुत प्यार करता था और उनकी मृत्यु उसके लिए बड़ी दुखद बात थी। बहुत मुश्किल से उसने अपने को संभाला था।

उसे भारत आए तीन महीने बीत चुके थे जब एक दिन उसे भावना का फ़ोन मिला – “रवीन्द्र कैसे हो?”
रवीन्द्र ने उदास स्वर में कहा – “ठीक ही है। सब ऐसे ही चल रहा है। कितना सोचा था कि अब वहीं रहूँगा पर वहाँ रहना मेरे भाग्य में ही नहीं था।“
लेकिन तभी भावना ने कहा- “मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकती या तो तुम आ जाओ या मैं ही आ जाती हूँ। वहीं शादी कर लेंगे।“
रवीन्द्र उल्लास से चहका – “देखो, घर में अगर सब राज़ी हैं तो तुम आ जाओ। तुम्हारे बिना मुझे भी कहाँ अच्छा लग रहा है। मुझे भी एक पल को भी तुम्हारे बिना चैन नहीं आया इतने दिनों तक। लेकिन अब मुझे यहीं रहना होगा। यहीं भारत में। व्यापार कौन देखेगा? घर कौन संभालेगा, माँ है, बहन है। सब की देखभाल मुझे ही करनी है और हाँ यहाँ आना तो साड़ी या सलवार में ही। छोटी जगह है ना यहाँ लोगों को जीन्स, स्कर्ट हज़म नहीं होगा।“

और पन्द्रह दिनों के अन्दर ही वह आ गई थी। एयरपोर्ट पर रवीन्द्र से लिपट कर वह फूट-फूट कर रो पड़ी। क्योंकि नाटक करने में भी तो तेज़ थी वह। रवीन्द्र इधर-उधर देख रहा था कि लोग क्या सोचते होंगे। रवीन्द्र उसे घर ले आया। जिस दिन भावना का फ़ोन आया था रवीन्द्र ने माँ को सारी बातें बता दी थीं। भावना उसके घर आई तो वहाँ के शानों-शौकत को देख वह चकित रह गई। तो इतना अमीर है रवीन्द्र। कुछ ही दिनों में वह इन सबकी मालकिन बन जाएगी। वह खुश हो गई। कमी तो किसी चीज़ की नहीं थी लेकिन इतने दिनों तक जो वह स्वच्छन्दता से घूमती रहती थी वह छूट जाएगा। क्लब जाना दोस्तों से मिलना मिलाना, फ़िल्में सब छूट जाएगा। एक पल को वह उदास हुई पर दूसरे ही पल उसने सोचा वह तो अब एक रानी है। धीरे-धीरे वह इसमें बदलाब तो ला ही सकती है। लेकिन फिर सोचा बन्धन चाहे वह किसी चीज़ का हो उसे असहनीय है। कैसे क्या करेगी कि रवीन्द्र की माँ ने कमरे में प्रवेश किया। भावना ने जल्दी से उठकर उनके पाँव छुए तो उनकी सारी आशंकाएँ जाती रहीं। लगती तो संस्कारों वाली है। अभी तक वे यही सोचती रही थीं कि अमेरिका में पली बढ़ी है तो पता नहीं उसका व्यवहार कैसा होगा? फिर तो भावना ने अपने व्यवहार से उन्हें मोह ही लिया था।

दो तीन दिनों के बाद ही एक दिन रवीन्द्र खाना खाने के बाद अपने कमरे की ओर जा रहा था कि उसकी नज़र भावना के कमरे पर पड़ी। दरवाज़ा खुला था और पलंग पर एक डायरी पड़ी थी। उसने उसे उठा लिया ओर यूँ ही पलटने लगा। तभी उसकी नज़र एक पन्ने पर पड़ी जिस पर बड़े बड़े अक्षरों में माँ लिखा था और उसके सामने एक नम्बर लिखा था। रवीन्द्र ने वह नम्बर नोट कर लिया और भावना की माँ के विचार जानने के लिए अपने कमरे में जाकर उन्हें फ़ोन किया। उधर से किसी स्त्री का स्वर आया। उसने उन्हें प्रणाम किया और बोला –

“मैं रवीन्द्र हूँ और मैंने आपका आशीर्वाद लेने के लिए ही फ़ोन किया है। मैं और भावना शादी करने वाले हैं।“

उस स्त्री ने हँसते हुए कहा – “वह तो पहले से ही शादी-शुदा है। उसके दो बच्चे भी हैं। तुम कौन हो और क्यों मजाक कर रहे हो? उसका बड़ा बेटा तो अबके दस वर्ष का हो जाएगा।“

तभी घबराकर रवीन्द्र ने फ़ोन रख दिया था। उसके मुँह से तो कोई आवाज़ ही नहीं निकली। वह वहीं कुछ देर तक खड़ा रह गया। यह कैसा मजाक है? वह उसे धोखा तो नहीं देना चाह रही थी? एक बार भी तो उसने नहीं कहा कि वह शादी-शुदा और दो बच्चों की माँ है। उसके पाँव लड़खड़ा रहे थे और वह पसीने पसीने हो गया था। तभी उसने अपने को काबू में किया और भावना से साफ-साफ बात करने का निश्चय करते हुए उसके कमरे की ओर बढ़ चला। भावना इन सबसे बेख़बर कोई गीत गुनगुनाती हुई अपने कपड़े समेट रही थी। बड़ी मुश्किल से रवीन्द्र ने उससे कहा-

“भावना मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।“

भावना हँसने लगी, हँसते हुए उसने कहा – “अब बोलो भी। बिना बात के सस्पेंस बनाते रहते हो।“ लेकिन जैसे उसकी ओर उसकी नज़रें गईं वह चौंक उठी- “क्या हुआ? क्यों ऐसे लग रहे हो? थोड़ा आराम कर लो ना। लगातार काम में लगे रहते हो।“

जब उसने उसकी आँखें आँसुओं से भरी देखी, वह एकदम घबरा गई। रवीन्द्र एकटक उसकी ओर नफ़रत और गुस्से से देख रहा था। सोच भी रहा था कितना नाटक यह कर सकती है। इतने दिनों साथ रही लेकिन एक बार भी नहीं कहा कि वह शादी-शुदा और दो बच्चों की माँ है। फिर सोचा शायद यह झूठ हो। लेकिन उसे नहीं लगा कि झूठ होगा। क्योंकि वह उसकी माँ थी, वह क्यों झूठ बोलेंगी? उसने भावना से पूछा-

“क्या तुम शादी-शुदा और दो बच्चों की माँ हो?”

वह भौचक्की सी उसकी ओर देखती रह गई। उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। क्रोध, अपमान और निराशा से वह पागल हो उठा। उसने चीखते हुए कहा –

“अपना सामान बाँधो और अभी के अभी यहाँ से निकल जाओ। मैं अब तुम्हारी सूरत भी नहीं देखना चाहता। कितना बड़ा धोखा देना चाह रही थी। अभी ही इतना धोखा देना चाह रही थी तो बाद में क्या करती?”- चीखने से उसका कण्ठ अवरुद्ध हो गया था और आँसू गिरने लगे थे, “यह तो भगवान ने मुझे बचा लिया नहीं तो मुसीबत में फँस जाता। ऐसे झूठों से मैं कोई संबंध नहीं रख सकता। ज़िन्दगी भर भटकने की चाह है तो भटको। ऐसे ही झूठ का मुखौटा पहने सबको धोखा देती रहना। जाओ चली जाओ। अभी के अभी।“

और उसी दिन रवीन्द्र ने उसके टिकट की व्यवस्था कि और उसे वापस भेज दिया, वहीं उसी जगह जहाँ से वह सबको छोड़कर आई थी।

यहाँ आने के पहले उसने जितेन्द्र के नाम पत्र लिखा था जिसमें उसने कहा था कि वह यह घर हमेशा के लिए छोड़कर जा रही है। फिर कभी लौटकर नहीं आएगी। घर पहुँची भावना तो जितेन्द्र चुपचाप बैठे कुछ सोच रहे थे। भावना को देखते ही उनके तन बदन में आग लग गई। वे चीखे –

“तुम अभी घर से निकल जाओ। मैं नहीं चाहता कि तुम फिर मेरे घर में आओ। यहाँ तुम्हारे जैसों के लिए कोई जगह नहीं है। छि:, कैसी बेशर्म बदचल और घटिया औरत हो। पति और बच्चों को छोड़कर एक लड़के के साथ भाग गई। मुझे तो तुम्हारा परिचय देने में भी शर्म आएगी। क्या कहूँगा जब लोग जानेंगे कि मैं तुम्हारा पति हूँ। कहाँ जाकर मुँह छुपाऊँगा तब? अरे! तुम्हें तो जीवन ें कभी चैन नहीं मिलेगा, यह मेरे दिल की आह है। मैं भी रोज़ नई-नई लड़कियों के साथ घूम सकता था। फिर इन मासूम च्चों का क्या होता? मारे-मारे फिरते ये। न माँ और ना बाप। वह तो मैं हूँ जो इन बच्चों को प्यार से पाल रहा हूँ। तुम तो माँ बनने लायक भी नहीं थी। उसके लिए त्याग की ज़रूरत होती है। तुम अभी के अभी जाओ और किसी और के साथ मुँह काला करो”, और फिर वे रोने लगे थे। वह चुपचाप दरवाज़े के पास ही खड़ी रह गई थी। अब उसने दौड़कर उसके पाँव पकड़ लिए-

“इतनी ज़ोर से मत बोलो। बच्चे जाग जाएँगे तो क्या समझेंगे?”

जितेन्द्र ने फिर कहा- “बच्चे जानते हैं कि नौकरी के सिलसिले में तुम बाहर हो। असलियत जान जाएँगे तो थूकेंगे भी नहीं तुम पर।“

भावना ने उनके होंठों पर अपने हाथ रख दिये और बोली –

“बस कुछ ही दिनों की मोहलत दे दो। मैं नौकरी भी करूँगी और अलग फ्लैट लेकर रहूँगी। बस कुछ ही दिनों की ओर मोहलत दे दो।“

जितेन्द्र भी रोने लगे थे। आखिर वह उनकी पत्नी थी और वे अपनी पत्नी ओर बच्चों को बहुत प्यार करते थे। अगर भावना को यह भ्रम नहीं हुआ होता कि वह बहुत सुन्दर है और कोई भी पुरुष उसे पसन्द कर सकता है तो वह इस तरह नही भटकती।

अब उसे समझ आ गई थी और रवीन्द्र ने भी उसे गहरी चोट लगाई थी। दो चार दिनों के बाद ही उसकी माँ ने फ़ोन पर बताया कि किसी ने फ़ोन किया था और उस व्यक्ति ने कहा कि वह और भावना शादी करने वाले हैं। मुझे बहुत हँसी आई मैंने उसे बताया कि वह तो शादी-शुदा और दो बच्चों की माँ है, तो वह तो इतना घबरा गया कि तुरंत ही फ़ोन रख दिया। अब ये बात तो है कि मेरी बेटी है ही इतनी सुन्दर, तुम्हें देखकर तुम्हारी उम्र का अन्दाज़ा तो कोई लगा ही नहीं सकता। पता नहीं कौन था और फिर हँसने लगी। अब भावना समझ गई कि वह फ़ोन रवीन्द्र ने ही लगाया होगा। भावना अब फिर जितेन्द्र के साथ रहने तो लगी थी पर वह अब एक दूसरी ही भावना थी। क्लब जाना और घूमना-घामना तो छोड़ ही दिया था। अब घर से बाहर भी कम ही निकलती। घर के काम तो वह करने लगी थी पर बिल्कुल निर्लिप्त सी रहती थी जैसे यह उसका घर है ही नहीं।

जो भी सपने उसने देखे थे वे सारे एक साथ ही टूट गए थे। उसने खुले आकाश में उड़ना बन्द कर दिया था। अजीब बात थी कि इतने वर्षों तक साथ रहने पर भी वह जितेन्द्र को प्यार नहीं कर पाई। लेकिन अपने को वह आज भी गलत नहीं समझती थी। सपने देखना या अपने मनपसन्द लोगों के साथ घूमना-फिरना अगर गलत हो तो भी वह अपने विचारों को ठीक ही मानती थी। अब ऐसे लोगों को क्या कहेंगे आप? वह कहती प्यार करने का अधिकार सबों को है।

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