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05.18.2009
 

आज फिर
कुसुम सिन्हा


आज फिर तेज हवाओं ने
नन्हें नन्हें मेघ खंडों को दूर उड़ा दिया
आज फिर उस फूलों भरी शाख को
बारिश ने तोड़ तोड़ कर ज़मीन पर फैला दिया
आज फिर ना जाने कौन सी यादें
मुझे रुला रुला गईं
आज फिर पलकों की बाँध तोड़ आँसू
मेरा आँचल भिगो गए
आज फिर उस झोंपड़ी में रहनेवाले नन्हें नन्हें बालक
भूखे ही सोने को विवश हो गए
आज फिर किसी ने किसी का कलेजा
अपने कठोर शब्दों से बींध डाला
आज फिर किसी ने थोड़े से लालच में
अपना ईमान बेच डाला
आज फिर किसीने प्यार भरे दिल के
पैरों के नीचे से विश्वास की ज़मीन खींच ली
आज फिर किसी ने सपनों की मीठी नींद से जगा
मुझे कठोर यथार्थ की ज़मीन पर पटक दिया
आज फिर ईमान धर्म और प्यार की
धज्जियाँ उड़ा कोई उसकी व्यर्थता समझा गया
आज फिर धरती को प्रकाश से चमकाते
चाँद को ग्रहण लग गया
आज फिर किसी ने एक दृष्टि निक्षेप से
किसी हीर किसी लैला औ’ किसी सोहनी को
बीच नदी में ड़ुबो दिया
आज फिर वर्षा का रिम झिम
मेरे मन को तरसा गया
आज फिर मेरे आँसुओं ने
मेरी पीड़ा लोगों को बता दी


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