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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


तुम और मैं

बैठे जब तुम पास पल दो पल
यही हुआ एहसास
सदियों से हो तुम
आस-पास…
मेरे आस-पास
वहम की दीबारें
जब ढह गईं
नफ़रत की झील
तब बह गई
अविश्वास के पहाड़
भी समतल हुए
फिर न कभी
हम अलग हुए।

जब भी झाकता हूँ अतीत में
सजीव हो उठते हो
तुम समृतियों में।
खिले फूलों की
भीनी सुगंध,
छा जाती है हर तरफ़।
सूरज की रोशनी
चाँनी बन
सितारों संग
तुम्हारी मखमली ओढ़नी
पर पड़ कर
मेरे मन की आकृतियों को ढक लेती है
फिर मैं समृतियों, आकृतियों में
खो कर तुम्हें हर साँस में
शामिल पाता हूँ।


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