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ISSN 2292-9754

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10.15.2016


मन का पंछी

मन का पंछी
मजबूरियों के पिजरे से उड़
मन का पंछी जब
ढूँढता है उम्मीदों का नया आसमान
ख़ुशी के नये पंख लगा कर
ऊपर ही ऊपर उड़ता जाता है
पर जल्दी ही उसे पता चलता है
कि इच्छाओं, उम्मीदों के इस आसमान का
तो कोई क्षितिज है ही नहीं
तो फिर वह ख़ुद को
मजबूरियों के उसी पिंजरे में
क़ैद पाता है।


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