अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.17.2018


मैं ख़ुद को पढ़ रही

मैं ख़ुद को पढ़ रही
परीक्षक हूँ अपनी अंतरात्मा की
उसको टटोल रही
ख़ुद को मैं जान रही
भली भाँति पहचान रही!
मैं कितनी तहों के अंदर हूँ
अपने ऊपर पड़ी जिल्दों को गिन रही
कितनी अंदर हूँ या कितनी बाहर
आज मैं जानकर रहूँगी
इस पूर्णसत्य को!

रावण के दस मुख थे
दुर्गा के बारह हाथ
शिव के त्रिनेत्र
राक्षस बदलते कई मायवी रूप
फिर मेरे कितने चेहरे हैं
जो मैं रोज़ रोज़ बदलती हूँ
कभी तो पल में बदलती हूँ
और हम सभी
आओ आज खोल दें
ढके मन के खोलों को!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें