वे दिन कुछ और थे, धुँआ उड़ाकर दुनिया को भूल जाता था, कोई कुछ कहता भी, तो सपनो में खो जाता था। आज धुँआ उड़ा, गाड़ी पीछे ली तो कोई सिर फट गया, शायद मर गया वह, मैंने देखा नहीं। आज ही एक नेता के सिर पर इनाम देखा, अब सोचता हूँ उसका सिर उतार लूँ शायाद मशहूर हो जाऊँ, और फ़िर, धुँआ उड़ाकर, सब भूलना न पड़े।