गर्भगृह — नीली दीवारें, ऊँची खिड़कियाँ, धूप — कभी सिन्दूरी तो कभी सुनहरी, पहुँच से परे।
एक बोतल में काँच की, पिघली हुई रोशनी भर तुम्हारे पास लानी है। शायद तब तुम देख पाओ — मकड़ी के जालों को, नागों को, नीली पड़ी उस लाश को, (हे राम!!)
शायद तब कुछ सीटें नहीं, कुछ और बदले!!