सुध तेरी भूले मग कैसे जब हैं प्राण तुम्हें ही अर्पित तन मन जीवन तुम्हें समर्पित तब हे देव तुम्हें तज करके खंगाले जग कैसे सुध तेरी भूले मग कैसे प्राणों की साधना तुम्हीं हो जीवन-आराधना तुम्हीं हो सम्प्रति-सम्भावना तुम्हीं हो भटके फिर पग कैसे सुध तेरी भूले मग कैसे हर पल अपलक तुम्हें निहारूं बाहर भीतर जहां बुहारूं तेरी सत्ता झलके झलझल हलचल हो रग कैसे सुध तेरी भूले मग कैसे
---- कुमार आशीष