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05.24.2007
 
सुध तेरी भूले मग कैसे
कुमार आशीष

सुध तेरी भूले मग कैसे

जब हैं प्राण तुम्‍हें ही अर्पित
तन मन जीवन तुम्‍हें समर्पित
तब हे देव तुम्‍हें तज करके
खंगाले जग कैसे
सुध तेरी भूले मग कैसे

प्राणों की साधना तुम्‍हीं हो
जीवन-आराधना तुम्‍हीं हो
सम्‍प्रति-सम्‍भावना तुम्‍हीं हो
भटके फिर पग कैसे
सुध तेरी भूले मग कैसे

हर पल अपलक तुम्‍हें निहारूं
बाहर भीतर जहां बुहारूं
तेरी सत्‍ता झलके झलझल
हलचल हो रग कैसे
सुध तेरी भूले मग कैसे

---- कुमार आशीष

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