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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


 "नृत्य और नाटक का प्रस्तुति पक्ष"

न तत्ज्ञानम् न ततशिल्पम न सा विद्या न सा कला
न सौयोगो न तत्कर्मम नाट्येअस्मिन यन्नदृश्यते ।

भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र से उद्धृत उपर्युक्त श्लोकानुसार हम कह सकते हैं कि नाटक में सभी कुछ समाहित है। इस ‘सब’ में सभी प्रकार का ज्ञान, शिल्प, तमाम विधायें व कलायें सहज ही समाहित हो जाती हैं। नाट्यशास्त्र भारतीय कलाओं पर लिखा गया प्रथम और एकमात्र मौलिक भारतीय सैद्धांतिक ग्रन्थ कहा जा सकता है, जो प्रमुख रूप से नाटक और नृत्य के संबंध में विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है तथा दुनिया के किसी अन्य ग्रन्थ से इसकी तुलना यदि की भी जाय तो अरस्तू का ‘पोयटिक्स’ ही इसके समीप ठहरता है, जो स्वयं में पाश्चात्य काव्यचिंतन का प्रथम मौलिक प्रमाण है। "भरतमुनि एक प्राचीन भारतीय लेखक हुये हैं जिन्हें नाट्यशास्त्र के प्रणेता के रूप में जाना जाता है। नाट्यशास्त्र भारतीय प्रस्तुतिपरक कलाओं के संबंध में एक सैद्धांतिक आधार ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में रंगमंच, नृत्य, अभिनय और संगीत का वर्णन है जिसकी तुलना अरस्तू के पोयटिक्स नामक ग्रन्थ से की जाती है।"1

नृत्यकला जिसका हम विधिवत प्रशिक्षण गुरु अथवा संस्थान से प्राप्त करते हैं, हमें एक विशेष प्रकार की शैली का हिस्सा बनाता है। जैसे: कत्थक, भरतनाट्यम, ओडिसी, कुचिपुड़ी आदि-आदि जबकि नाटक या रंगमंच में कोई एक शैली नहीं है। किसी शैली विशेष में सीमित हो जाने के फ़ायदे भी हैं और नुकसान भी। नृत्य का किसी शैली विशेष में सिमट जाना किसी विशेष घराने तक सिमट जाना भी है। इस रूप में एक सीमा अवश्य बनती है और एक विशेष दर्शक वर्ग के सम्मुख नृत्य की प्रस्तुति का मार्ग प्रशस्त करती है। नृत्य मनुष्य का भावनात्मक उच्छवास है और अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर, किसी विशेष प्रकार के वातावरण में प्रायः प्रत्येक मन-मयूर गतिमय और आंदोलित हो उठता है और हस्त-पाद-कटि संचालन से निर्मित होनी वाली जीवंत व तिर्यक गतियों से सुसज्जित सम्पूर्ण अभिव्यक्ति को नृत्य कहा जा सकता है। नृत्य और नाटक में अनेकों समानतायें हैं। नृत्य भावाश्रित है, नाटक रसाश्रित है। नृत्य का अंतिम हेतु उपस्थित दर्शकों के सम्मुख भावों को प्रदर्शित करना है जबकि नाटक का अंतिम लक्ष्य रस-निष्पत्ति है। नर्तक का प्रमुख संसाधन उसके चेहरे पर आने वाले भाव हैं। यहाँ चेहरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। नाटक को प्रस्तुत करते समय अभिनेता के पास संवाद हैं जिन्हें वह वाणी से नहीं अपितु ‘समग्र शरीर से’ बोलता है। यह समग्र शरीर से बोलना जितना पुष्ट होगा अभिनय भी उतना ही जीवंत, आकर्षक, सार्थक और प्रभावी होगा। यदि हम चारित्रिक प्रस्तुतीकरण की बात करें तो पायेंगे कि किसी विशेष चरित्र को प्रस्तुत करने हेतु विशिष्ट वेशभूषा, मुखसज्जा, गति, प्रेरणा, द्वन्द्व आदि का आग्रह नृत्य के सन्दर्भ में उतना नहीं होता है जितना कि नाटक में। "नाट्य और नृत्य का आधारभूत अन्तर यह है कि नाट्य तो होता है रसाश्रित, जबकि नृत्य भावाश्रित होता है। नृत्य में सात्विक अभिनय के स्थान पर आंगिक अभिनय की प्रधानता रहती है।"2

प्रारम्भ से ही नारी-जाति को मनोरंजन का साधन और उपभोग्या माना जाता रहा और दुखद ही है कि आज भी स्थितियाँ चिंताजनक बनी हुई हैं। यह भी सच है कि पूर्व में समाज का स्वरूप मातृ-सत्तात्मक रहा है तथा लोक में भले ही यह किसी भी प्रकार के जातीय विद्वेष के बगैर सतत विकसित होता रहा, लेकिन अभिजात्य स्वरूप में इसने नारी-जाति को अपमानित ही किया है और लगातार बढ़ते अपराधों और शोषण के पीछे कला-प्रस्तुतियों में भी नारी-जाति को उपहासात्मक स्वरूप में प्रस्तुत करना, एक कारण कहा जा सकता है। "प्राचीन काल में और आज भी अप्रौढ़ जन मंचों पर पुरुष अभिनेताओं द्वारा नारी पात्रों के अभिनय का प्रमाण प्राप्त होता है। ठीक इसके विपरीत शिक्षण-संस्थाओं के अविकसित मंचों पर अभिनेत्रियों द्वारा पुरुष पात्रों का अभिनय भी संपन्न किया जाता है।"3

मानवीय विकास-क्रम में कलायें विकसित हुई हैं लेकिन इसमें भी अभिनय पहले आया होगा या नृत्य, कहा नहीं जा सकता है। भारतीय सन्दर्भ में भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र को यद्यपि ‘नाट्य’ का मूल ग्रन्थ कहा जाता है लेकिन ‘नृत्त’, ‘नृत्य’ आदि की भी प्रारम्भिक व्याख्या हमें नाट्यशास्त्र में ही प्राप्त होती है तथा अनेकानेक मुद्रायें व गतियों संबंधी नाट्यशास्त्र में उल्लिखित विवरण इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि ‘नृत्य’ भी नाट्यशास्त्र के पूर्व तांडव व लास्य स्वरूप में मौजूद था। इतना सब होते हुये भी हमें अभिनय को ही नृत्य से पूर्व का मानना होगा क्योंकि आदिम समाज में, जबकि मानव अपनी क्षुधा-तृप्ति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न था, तब स्वयं की जंगली जानवरों से सुरक्षा के कारण वह भयभीत रहा होगा और ऐसे में यदा-कदा शिकार मिल जाने पर उसके द्वारा शिकार करने की प्रक्रिया को ही सर्वप्रथम अपनी शारीरिक गतियों व आवाज़ आदि के माध्यम से अपने क़बीले के अन्य सदस्यों के सम्मुख प्रस्तुत किया गया होगा और डरते-डरते उसके द्वारा आपबीती को अन्य सदस्यों को ध्वनि व शारीरिक चेष्टाओं के माध्यम से बताया गया होगा, इस रूप में यह अभिनय का प्रारंभ रहा होगा। ऐसा मानने के पीछे पर्याप्त कारण नज़र नहीं आते हैं कि भूख से तड़प रहा आदिम मानव सर्वप्रथम ख़ुशी से झूम उठा होगा और उसने नृत्य जैसा कुछ किया होगा तथा उसके बाद ही उसने शिकार को भोजन के रूप में खाया होगा।

यदि यह कहा जाय कि नृत्य व नाट्य दोनों ही ताल-आधारित हैं तो ग़लत न होगा। फ़र्क बस इतना है कि नृत्य सुनायी दे रही ताल को आधार मानकर किया जाता है जबकि किसी नाट्य प्रस्तुति में ‘ताल’ संवादों, गतियों, भंगिमाओं व अन्य प्रस्तुतिपरक तत्वों मसलन प्रकाश आदि में अंतर्निहित रहती है। "अभिनय कला भी है और तकनीक भी, सच भी है और झूठ भी, यथार्थ भी है और उसका भ्रम भी।"4

नाटक की दुनिया में भी निर्देशकों को यह कहते सुना जाता है कि अमुक अभिनेता ‘बेताला’ है। संगीत में तो ताल की महत्ता है ही, अभिनेताओं के लिये भी ताल अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि नाटक में अनेकों स्थानों पर रंगसंगीत के रूप में ताल मौजूद रहती है, यदा-कदा नृत्य भी नाटय-प्रस्तुति का हिस्सा बन जाता है। नृत्य-नाटिका की प्रस्तुति में ये दोनों ही विधायें एक दूसरे में समाहित नज़र आती हैं। "बिना ताल के गायन, वादन और नृत्य की सत्ता नहीं रह जाती। संगीत में जहाँ तक रोचकता का प्रश्न है, वह ताल से ही उत्पन्न होती है।"5

यदि अभिनेता ताल में नहीं है तो इसका अभिप्राय यही है कि वह एकरसतापूर्ण अभिनय कर रहा है और घटित हो रहे दृश्य के अनुरूप उसकी क्रिया-विधि में किसी भी तरह के परिवर्तन नहीं हो रहे हैं। जिस प्रकार अभिनय में ‘सत्व’ की प्राप्ति अत्यंत कठिन है और दीर्घकालीन साधना के उपरान्त ही उसे प्राप्त किया जाता है ठीक उसी तरह नृत्य के संबंध में भी कहा जा सकता है।

प्रसाद जी के नाटकों के बारे में यह कहा जाता रहा कि उनके नाटक प्रस्तुतीकरण के उपयुक्त नहीं हैं अर्थात उनमें रंगमंचीयता का अभाव है और लम्बे समय तक उनके लिखे नाटकों का मंचन भी नहीं किया गया। डॉ. गोविन्ददास भी उनके नाटकों में मंचन की कम संभावनायें मानते हैं। प्रख्यात रंग-आलोचक नेमीचन्द्र जैन भी उल्लेख करते हैं कि नाटक वस्तुतः प्रस्तुतीकरण के लिये लिखे जाते हैं और नाटक की सार्थकता भी उनके प्रस्तुतीकरण में है न कि साहित्य की एक विधा के रूप में अध्ययन में। "जो नाटक रंगमंच पर नहीं लाये जा सकते और नाटक की टैकनिक के अनुसार लिखे जायें वे भी नाटक संज्ञा में आते हैं, परन्तु जो नाटक रंगमंच पर भी सफलतापूर्वक खेले जा सकते हैं वे ही सच्चे नाटक हैं। प्रसाद जी के कोई भी नाटक रंगमंच पर सफल नहीं हो पाये हैं।"6

नृत्य और नाटक, दोनों में ही अच्छी-ख़ासी मात्रा में कला व तकनीक का समायोजन है और ये दोनों ही ऐसे गुँथे हुये हैं कि इन्हें जानने-समझने और प्रस्तुतीकरण का हिस्सा बनाने के लिये इन कलाओं के साधकों को सजग अभ्यास करते हुये अपनी रचनात्मक यात्रा को अनवरत जारी रखने की आवश्यकता होती है। "किसी भी शब्द का अभिनय जब ताल और लय के साथ किया जाय, तो वह ‘नृत्य’ कहलाता है। कथक नृत्य में जब केवल पैरों का काम दिखाया जाता है, तो उस समय उसकी संज्ञा ‘नृत्त’ होती है और जब भिन्न-भिन्न भावों का प्रदर्शन किया जाता है, तो वह नृत्य कहलाता है। इस प्रकार कथक ‘नृत्त’ और ‘नृत्य’ दोनों का मिला हुआ रूप है।"7

नाटक अभिनेताओं द्वारा दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है और नाटक का अंतिम हेतु दर्शकों को रसानुभूति कराना है, यह बात भारतीय नाट्य-सिद्धांत के सम्बन्ध में उचित कही जा सकती है लेकिन ‘पृथक्करण सिद्धांत’ के प्रतिपादक ‘ब्रेख्त’ दर्शकों को रसानुभूति कराना नाटक का उद्देश्य स्वीकार नहीं करते हैं बल्कि इस रस-सिद्धि की प्रक्रिया को बार-बार अवरोधित करना चाहते हैं और वे चाहते हैं कि नाटक, दर्शकों के मनो-मस्तिष्क में प्रश्न खड़ा करे, उसे किसी भी प्रकार के चमत्कार में उलझाये नहीं, उसे सुलाये नहीं बल्कि उसमें चेतना का संचार करे। इस रूप में नाटक किसी नाट्यालेख में लिखित शब्दों-वाक्यों आदि को ही प्रस्तुत नहीं करता है बल्कि शब्दों में अन्तर्निहित अर्थों, चित्रों और बिम्बों को भी उद्घाटित करता है। "किसी वाक्य के अर्थ को अभिनय द्वारा प्रकट करके, जो रस उत्पन्न किया जाता है, उसे ‘नाट्य’ कहते हैं।"8

आत्मा के अजर-अमर होने और परमात्मा की सर्वत्र विद्यमानता संबंधी भारतीय दर्शन कलाओं में भी मुखरित हुआ है और हमारे यहाँ कलाओं को आत्मिक आनंदानुभूति –प्रदाता स्वरूप में स्वीकार किया गया है और ऐसा माना जाता है कि कलायें हमें परम आनंद प्रदान करती हैं। "अन्य कलायें बुद्धि के संयोग से भावों का उत्कर्ष कराने में सफल होती हैं, संगीत कला सीधे आत्मा को प्रभावित कर शांति, आनन्द और प्रेरणा प्रदान करती है।"9

भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का स्पष्ट प्रभाव दिखलायी देता है। कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी आदि नृत्यों में प्रयोग होनी वाली मुद्रायें व शारीरिक भंगिमायें नाट्यशास्त्र में वर्णित एकल व संयुक्त हस्त मुद्राओं का व्यावहारिक स्वरूप हैं यद्यपि इनमें आंशिक परिवर्तन भी हुआ है। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा पर पश्चिमी प्रभाव नहीं पड़ा है। तमाम पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भी इन शास्त्रीय कलाओं (नृत्यों) का अपने मूल स्वरूप में बने रहना इनकी सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है। "भारतीय नृत्य की सैद्धांतिकी व तकनीक में ही नाटक की धारणा या परिकल्पना निहित है और बिना इन अंतर्संबंधों को जाने इसे आसानी से नहीं समझा जा सकता है जिसे भरतमुनि द्वारा समुचित रूप में व्याख्यायित किया गया है।"10

न केवल भारतीय शास्त्रीय नृत्य व नाटकों में बल्कि जीवन के प्रति भी एक तरह का रागात्मक संबंध दिखलायी देता है। यह रागात्मकता भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य है तथा यह कला-साधना में भी अनुस्यूत है। यहाँ कला गहन साधना से अर्जित प्राप्ति है जिसे साधना तथा अनवरत परिश्रम द्वारा ही सदैव विकासमान बनाये रखा जा सकता है। भारतीय समाज का जीवन-दर्शन भाववादी जीवन-दर्शन है। यह भी सच है कि समय के प्रभाव में भावनाओं को भौतिकता (भौतिक संसाधनों) ने आच्छादित करने की भरपूर कोशिश की है। "भारतीय नृत्य कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ओर तो यह भावाश्रित है और दूसरी ओर लायाश्रित।"11

दर्शक नृत्य अथवा नाटक जैसी किसी भी प्रस्तुति से यह अपेक्षा करते हैं कि वे किसी गहन अनुभूति को प्रस्तुति में देखें, अनुभव करें और आत्मसात करें। आज की दौड़ा-भागी की ज़िन्दगी में यह अपेक्षा अत्यधिक बढ़ गयी है। इस प्रकार समग्र अथवा आंशिक रूप में कोई प्रस्तुति दर्शकों या दर्शक विशेष को आतंरिक आनंद प्रदान करती है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि दर्शक किसी नाट्य या नृत्य प्रस्तुति में ‘आत्मा’ देखना चाहता है जो वास्तव में देखी नहीं जा सकती है। वह दिखायी भी नहीं देती है। दरअसल किसी पात्र विशेष को मंच पर जीवंत कर देना ही उस आत्मा को मंच पर अवतरित कर देना भी है। "हमारी रंग परम्परा में पात्र की वेशभूषा, मुख सज्जा, रंग, अलंकार आदि सब कुछ पहले से निश्चित और रूढ़िबद्ध है। अतः उसे अलग से देखने में दर्शक की कोई रूचि नहीं, वह तो अभिनेता की कला के आन्तरिक पक्ष को देखने का इच्छुक है।"12

नाटक हमेशा द्वंद्वों में ही विकसित होता है और यह कहा जाय कि द्वन्द्व नाट्यकला का प्राण है तो संभवतः ग़लत न होगा । "नाटक में दो ही चीज़ें विचारणीय हैं एक यह कि नाटक द्वंद्वों के माध्यम से आगे बढ़ता है और दूसरा नाटक एक क्रिया है अथवा क्रिया-प्रतिक्रियाओं का समुच्चय।"13

नाटक के लिये प्रतिरोधी व्यक्ति व परिस्थितियाँ आवश्यक हैं और उनके बीच चलने वाला अनवरत संघर्ष कथा को गति देता है और आकर्षण बनाये रखता है। "जिस नाटक में जितना महान विचार होगा, जितना तीव्र संघर्ष होगा, जितनी संगठित एवं मनोरंजक कथा होगी, जितना विशद चरित्र-चित्रण होगा और जितनी स्वाभाविक कृति एवं कथोपकथन होंगे, वह उतना ही उत्तम तथा सफल होगा।"14

नाट्य प्रस्तुति की विभिन्न शैलियाँ इस तथ्य की गवाह हैं कि यह एक ऐसा कला-माध्यम है, जिसमें किसी भी कथानक को सिर्फ़ एक ही तरह से प्रस्तुत या मंचित नहीं किया जा सकता है अपितु आवश्यकतानुसार किसी भी शैली को चुना जा सकता है। यहाँ अभिजात्य व लोक का वैषम्य भी नहीं है और लोक के तत्वों को भी अभिजात्य नाट्य प्रस्तुति में प्रयोग किया जाता रहा है। किसी एक कथानक को एक ही तरह से प्रस्तुत किये जाने का भी कोई नियम नहीं है अपितु देखने में यह आता है कि कोई एक ही कथानक दो अलग-अलग निर्देशकों द्वारा प्रस्तुत किये जाने पर अलग-अलग प्रभाव छोड़ता है। "जीवन का निकटतम सम्बन्ध नाटक से है क्योंकि यह प्रभाव के कारण कला का श्रेष्ठतम प्रकार माना जाता है।"15

किसी भी प्रकार की सीमाओं में न बंधे रहना जहाँ नाटक जैसी विधा के लिये अनंत संभावनाओं के द्वार खोलता है वहीं असीम में कहीं खो जाने का खतरा नाटक के साथ हमेशा बना रहता है और आज हिन्दी रंगमंच की स्थिति ठीक वैसी ही है। सभी भारतीय शास्त्रीय नृत्य विधाओं का एक अनुशासन में निबद्ध होना उनकी सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है और आज के मौजूदा दौर में जहाँ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मानव-व्यवहार अनियंत्रित, निरर्थक व अमर्यादित होता चला जा रहा है ऐसे में भारतीय शास्त्रीय नृत्य विधाओं का अनुशासित स्वरूप अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है और कलाओं व जीवन में अनुशासन की महत्ता को रेखांकित करता है।

सन्दर्भ:

1. एवोल्यूशन ऑफ म्युज़िक, डांस एण्ड ड्रामा, दीपिका विश्वास, एबीडी पब्लिशर्स, इमलीवाला फाटक, जयपुर (राज.)- 302015, 2009 पृष्ठ..203
2. नाट्य कला मीमांसा, डॉ. गोविन्ददास, सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय, (शासन साहित्य परिषद्) मध्य प्रदेश,1961,पृष्ठ.97
3. नाट्यवृत्ति और सम्प्रेषण, ज्ञान सिंह मान, क्लासिकल पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली,1980,पृष्ठ 75
4. रंग कोलाज, देवेन्द्रराज अंकुर, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली,2000,पृष्ठ.20
5. संगीत निबन्ध माला, पं. जगदीश नारायण पाठक, पाठक पब्लिकेशन, इलाहाबाद, जून 1989,पृष्ठ.14
6.नाट्य कला मीमांसा, डॉ. गोविन्ददास, सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय, (शासन साहित्य परिषद्) मध्य प्रदेश,1961,पृष्ठ.57
7.कथक नृत्य, डॉ. लक्ष्मी नारायण गर्ग, संगीत कार्यालय, हाथरस, अगस्त 2006,पृष्ठ़35
8. कथक नृत्य, डॉ. लक्ष्मी नारायण गर्ग, संगीत कार्यालय, हाथरस, अगस्त 2006,पृष्ठ 34
9. सांगीतिक निबन्ध माला, डॉ. सीमा जौहरी, पीयूष प्रकाशन, दिल्ली, 2001,पृष्ठ 40
10. इंडियन क्लासिकल डांस, कपिला वात्स्यायन, पब्लिकेशन डिवीजन, भारत सरकार, दिसंबर1974,पृष्ठ. 6
11. कथक नृत्य शिक्षा (प्रथम भाग), डॉ. पुरु दाधीच, बिन्दु प्रकाशन, उज्जैन, 1981,पृष्ठ.7
12. रंग कोलाज, देवेन्द्रराज अंकुर, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2000,पृष्ठ.16
13. एवोल्यूशन ऑफ म्युज़िक, डांस एण्ड ड्रामा, दीपिका विश्वास, एबीडी पब्लिशर्स, इमलीवाला फाटक, जयपुर (राज.)- 302015, 2009 पृष्ठ..200
14. नाट्य कला मीमांसा, डॉ. गोविन्ददास, सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय, (शासन साहित्य परिषद्) मध्य प्रदेश,1961, पृष्ठ.33
15. सौन्दर्यबोध एवं ललित कलायें, डॉ. सरोज भार्गव, कला प्रकाशन, वाराणसी, 1999,पृष्ठ.92

डॉ. कुलिन कुमार जोशी
अतिथि व्याख्याता
डिपार्टमेंट ऑफ थियेटर
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय
खैरागढ़ (छ.ग.)
मो. 09406260830


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