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01.16.2009
 
यौवन
कुलवंत सिंह

सोने की थाली में यदि
मैं चांदनी भर पाऊँ,
प्रेम रूप पर गोरी तेरे
भर भर हाथ लुटाऊँ।

हवा में घुल पाऊँ यदि
तेरी साँसो मे बस जाऊँ,
धड़कन हृदय की
वक्ष के स्पंदन मैं बन जाऊँ।

अलसाया सा यौवन तेरा
अंग अंग में तरुणाई,
भर लूँ मैं बाहें फैला
बन कर तेरी ही अंगड़ाई।

चंदन बन यदि तन से लिपटूँ
महकूँ कुंआरे बदन सा,
मदिरा बन मैं छलकूँ
अलसाये नयनों से प्रीत सा।

स्वछंद-सुवासित-अलकों में
वेणी बन गुंध जाऊँ,
बन नागिन सी लहराती चोटी
कटि स्पर्श सुख पाऊँ।

अरुण अधर कोमल कपोल
बन चंद्र किरन चूम पाऊँ,
सेज मखमली बन
तेरे तन से लिपट जाऊँ।

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