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| 01.16.2009 |
| वेदना कवि कुलवंत सिंह |
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अश्रुधार में हिमखंड को
आज पिघल जाने दो । अंतर्मन में दबी वेदना को आज तरल हो जाने दो । सजल नयन कोरों से अश्रु गाल ढुलकने दो । करुण क्रंदन से विषाद को आज द्रवित हो जाने दो । विकल प्राण दुख से विह्वल निरत व्यथा मिट जाने दो । मथ डालो इस तृष्णा को पूर्ण गरल बह जाने दो । सूनी आहों में सुस्मित अभिलाषा को करवट लेने दो । निस्तब्ध व्यथित पतझड़ में ऋतु बसंत छा जाने दो । नीरव निशा गहन तम में स्वर्ण किरण खिल जाने दो । अंधकार मय जीवन पथ पर ज्योति पुंज बिखर जाने दो । हृदय मरुस्थल जीवन को आज हरित हो जाने दो । पादप बंजर पर उगने को आज हल चल जाने दो । कुसुम कुंज खिल चुका बहुत मधुकर को अब गाने दो । स्वत: भार झुक चुका बहुत मकरंद मधु बन जाने दो । विरह तप्त इस गात पर मेघ बिंदु बरसाने दो । उद्वेलित हृदय उच्छवासों को सुधा मधुमय हो जाने दो । प्रेम सिंधु लेता हिलोरें लहरों को उन्मुक्त उछलने दो । मादकता बिखर रही अनंत प्रणय मिलन हो जाने दो । यौवन सरिता का रत्नाकर से निसर्ग मिलन हो जाने दो । रति और मनसिज सा पावन परिणय हो जाने दो । करुणा, विनय, माधुर्य का निर्जर संगम हो जाने दो । जीवन सौंदर्य अंबर तक बन उपवन महकाने दो । |
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