| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 01.16.2009 |
| तप कर गमों की आग में कवि कुलवंत सिंह |
|
तप कर गमों की आग में कुंदन बने हैं हम
खुशबू उड़ा रहा दिल चंदन सने हैं हम रब का पयाम ले कर अंबर पे छा गए बिखरा रहे खुशी जग बादल घने हैं हम सच की पकड़ के बाँह ही चलते रहे सदा कितने बने रकीब हैं फ़िर भी तने हैं हम छुप कर करो न घात रे बाली नहीं हूँ मैं हमला करो कि अस्त्र बिना सामने हैं हम खोये किसी की याद में मदहोश है किया छेड़ो न साज़ दिल के हुए अनमने हैं हम |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|