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01.16.2009
 
 सज़ा-ए-मौत दो
कवि कुलवंत सिंह

रात तन्हा थी न तुम दिन को सज़ा-ए-मौत दो
पास आ जाओ न तुम मुझको सज़ा-ए-मौत दो

इश्क में तेरी अदाओं ने मुझे कैदी किया
हुस्न-ए-जलवों से न तुम मुझको सज़ा-ए-मौत दो

हम तो तेरे थे सदा फिर चाल तूने क्या चली
दूर कर मुझसे न तुम सबको सज़ा-ए-मौत दो

रात काली छा गई हर ओर बरबादी हुई
है नहीं गलती न तुम उसको सज़ा-ए-मौत दो

दूरियां दिल में नहीं हैं, दूर हम क्यों फिर हुए
सुन मुझे रोता न तुम खुद को सज़ा-ए-मौत दो

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