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01.16.2009
 
प्रियतम
कुलवंत सिंह

रातभर सोई नही
सपनों में खोई रही,
निर्निमेष प्रियतम के
ख्यालों संग मै खोई रही।

लावण्य मोहित रूप को
पल पल निरखती रही,
सरल, सहज, सलोने मीत
को अर्पित होती रही।

मधु यौवन रस
मदिरा सा पिलाते रहे,
प्राण - हृदय मेरे
मुझे नींद से जगाते रहे।

मनभावन प्रियतम
सपनों मे आते रहे,
पलकों से सौंदर्य मद
नयनों का पिलाते रहे।

कपोलों की लालिमा
चुंबनों से चुराते रहे,
अधरों पर अरुणाई
अधरों से सजाते रहे।

उद्वेलित यौवन भार
आलिंगन में बल खाते रहे,
पावन स्निग्ध मधुर प्यार
सारी रात छलकाते रहे।

तन पर मेरे चाँदनी से
सोलह सिंगार करते रहे,
मनभावन प्रियतम
सपनों में आते रहे।

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