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01.16.2009
 
प्रभु
कवि कुलवंत सिंह

अनंत सूर्य, ग्रह, तारागण
निस्सीम व्योम में विद्यमान;
शिरोधार्य कर आज्ञा सत्ता
निरंतर विचरण सस्मान ।

तरु, तृण, खग, नर, मीन, भृंग, चर
वर्धित सदा ईश वरदान;
बिखरी जगत अतुल विभव राशि
नित स्तुति अटल सत्य महान ।

दिव्य प्रभा जग सतत सुशोभित
मानव हृदय गहन भर भाव;
राग, विराग, अनुराग विनोद
सृष्टि विभूति जुगादि प्रभाव ।

आदि अनादि एक ही प्रभुता
सुंदर रहस्य का गुंजार;
मोहक, मधुर, मनोहर, माणिक
आधीर हृदय सुनता पुकार ।

शाश्चत एक बह्मांड में तू
चर अचर स्वीकारते मौन;
वरुण, मारुत, दिव, अर्क, मयंक
परम सत्ता से विलग कौन ?

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