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| 01.16.2009 |
| प्रभात कवि कुलवंत सिंह |
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जाग जाग है प्रात हुई,
सकुची, लिपटी, शरमाई । अष्ट अश्व रथ हो सवार रक्तिम छटा प्राची निखार अरुण उदय ले अनुपम आभा किरण ज्योति दस दिशा बिखार । सृष्टि ले रही अँगड़ाई, जाग जाग है प्रात हुई । कण - कण में जीवन स्पंदन दिव्य रश्मियों से आलिंगन सुखद अरुणिम ऊषा अनुराग भर रही मधु, मंगल चेतन मधुर रागिनी सजी हुई जाग जाग है प्रात हुई । अंशु-प्रभा पा द्रुम दल दर्पित धरती अंचल रंजित शोभित भृंग - दल गुंजन कुसुम - वृंद पादप, पर्ण, प्रसून, प्रफुल्लित । उनींदी आँखे अलसाई जाग जाग है प्रात हुई । रमणीय भव्य सुंदर गान प्रकृति ने छेड़ी मद्धिम तान शीतल झरनों सा संगीत बिखरते सुर अलौकिक भान । छोड़ो तंद्रा प्रात हुई जाग जाग है प्रात हुई । उषा धूप से दूब पिरोती ओस की बूँदों को सँजोती मद्धम बहती शीतल बयार विहग चहकना मन भिगोती । देख धरा है जाग गई जाग जाग है प्रात हुई । |
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