| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 01.16.2009 |
| कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ कवि कुलवंत सिंह |
|
छा रहे निराशा के बादल,
अंधियारा बढ़ रहा प्रतिपल । घुट-घुट कर जी रहा आदमी आदमी नचा रहा आदमी । आशा के कुछ गीत सजा तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । मानवता लहू लुहान पड़ी, बुद्धि चेतना से बनी बड़ी । रक्त पिपाशा है पशु समान, हेय मनुज अन्य, निज अभिमान । सुन धरती का यह रोना तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । कर्म क्रूर, पाखण्ड, धूर्तता, विध्वंस, वासना, दानवता । लुप्त मानव का जन से प्यार, निज स्वार्थ वश करता संहार । जागरण के अब गीत गा तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । भोग में है खॊया इंसान, भूल गया है स्नेह, बलिदान । उन्माद, शोषण, कुमति विचार, बना यही मानव व्यवहार । पथ मानव को उचित बता तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । है जेबें भर रहे कुशासक, जनता पिस रही क्यों नाहक । सुविधाओं की खस्ता हालत, पग-पग, पल-पल जीवन आहत। उनींदी आँखे खोल अब तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । अर्थ सभी कृत्यों का तल है, ज्ञान, तेज, तप सब निर्बल है । विस्मित सभ्यता, मौन आघात, कैसे मिटे यह काली रात ? ज्योति पुंज कोई बिखरा तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । वाणी - अमृत, अंतर - विष है, जीवन बना छल साजिश है । धमनी रक्त श्वेत हुआ है, प्रस्तर मानव हृदय हुआ है । प्राणों में नव रुधिर बहा तूँ, कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ । |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|