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| 01.16.2009 |
| झंकृत कवि कुलवंत सिंह |
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झन - झन झंकृत हृदय आज है
वपु में बजते सभी साज हैं । पी आने का मिला भास है मिटेगा चिर विछोह त्रास है । मंद - मंद मादक बयार है खिल प्रकृति ने किया शृंगार है । आनन सरोज अति विलास है कानन कुसुम मधु उल्लास है । अंग - अंग आतप शुमार है देह नहीं उर कि पुकार है । दंभ, मान, धन सब विकार है प्रेम ही जीवन आधार है । रोम - रोम रस, रुधिर राग है मिला जो तेरा अनुराग है । मन सुरभित, तन नित निखार है नभ - मुक्त, तल नव विस्तार है । घन - घन घोर घटा अपार है संग तुम मेरा अभिसार है । अनंत चेतना का निधान है मिलन हमारा प्रभु विधान है । |
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